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Weather Update: फरवरी में बढ़ेगी गर्मी, घटेगी बारिश, हिमालयी क्षेत्र में शुष्क सर्दी से फसलों पर संकट
फरवरी में उत्तर-पश्चिमी भारत के अधिकांश हिस्सों में मासिक वर्षा सामान्य से कम रहेगी। इस क्षेत्र में पूर्वी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख शामिल हैं। दिसंबर और जनवरी के अधिकांश दिनों में पश्चिमी विक्षोभ की अनुपस्थिति के कारण पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में सर्दियों के दौरान शुष्क परिस्थितियां बनी रहीं। 20 जनवरी के बाद ही इस क्षेत्र में हिमपात दर्ज किया गया।

नई दिल्ली। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने फरवरी माह के लिए जारी अपने पूर्वानुमान में देशभर में सामान्य से अधिक तापमान और सामान्य से कम वर्षा की आशंका जताई है। विशेष रूप से पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में सर्दियों के दौरान शुष्क मौसम का रुझान देखा जा रहा है, जिसे विशेषज्ञ जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से जोड़ रहे हैं। आईएमडी के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्रा ने बताया कि जनवरी महीने में देशभर में सामान्य से 31.5 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई, जबकि तापमान सामान्य से अधिक रहा। फरवरी में भी न्यूनतम और अधिकतम तापमान सामान्य से ऊपर रहने का अनुमान है।
उत्तर-पश्चिम भारत में कम बारिश की संभावना
महापात्रा के अनुसार, फरवरी में उत्तर-पश्चिमी भारत के अधिकांश हिस्सों में मासिक वर्षा सामान्य से कम रहेगी। इस क्षेत्र में पूर्वी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख शामिल हैं। उन्होंने कहा कि दिसंबर और जनवरी के अधिकांश दिनों में पश्चिमी विक्षोभ की अनुपस्थिति के कारण पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में सर्दियों के दौरान शुष्क परिस्थितियां बनी रहीं। 20 जनवरी के बाद ही इस क्षेत्र में हिमपात दर्ज किया गया।
जलवायु परिवर्तन का असर?
आईएमडी प्रमुख ने बताया कि समय के साथ पश्चिमी हिमालय में वर्षा में कमी का रुझान स्पष्ट रूप से देखा गया है। विभिन्न अध्ययनों में इस बदलाव को जलवायु परिवर्तन से जोड़ा गया है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह बताना कठिन है कि जलवायु परिवर्तन का कौन-सा विशिष्ट पहलू वर्षा में कमी के लिए जिम्मेदार है। मौसम प्रणालियों की जटिलता के कारण किसी एक कारक को चिन्हित करना आसान नहीं है।
जनवरी में क्यों कम हुई बारिश?
जनवरी के दौरान दो पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय रहे, जिनके कारण देश के पश्चिमी हिस्सों में कुछ स्थानों पर वर्षा हुई। लेकिन बंगाल की खाड़ी में बने निम्न दबाव के क्षेत्र ने पूर्वोत्तर क्षेत्र को छोड़कर पूर्वी भारत के अधिकांश हिस्सों को बारिश से वंचित रखा। इसका परिणाम यह रहा कि देश के बड़े हिस्से में अपेक्षित शीतकालीन वर्षा नहीं हो सकी, जिससे नमी की कमी बनी रही।
फरवरी में तापमान रहेगा अधिक
आईएमडी के पूर्वानुमान के अनुसार, फरवरी में देश के अधिकांश हिस्सों में न्यूनतम तापमान सामान्य से अधिक रहेगा। केवल दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत के कुछ हिस्सों में न्यूनतम तापमान सामान्य रहने की संभावना है। इसी तरह अधिकतम तापमान भी देश के ज्यादातर हिस्सों में सामान्य से ऊपर रहने का अनुमान है। हालांकि मध्य भारत के कुछ दूरदराज के क्षेत्रों और दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत में अधिकतम तापमान सामान्य स्तर पर रह सकता है।
गेहूं और जौ की फसल पर खतरा
फरवरी में अधिक तापमान और कम वर्षा का सीधा असर रबी फसलों पर पड़ सकता है। विशेष रूप से गेहूं और जौ जैसी फसलें तापमान में अचानक वृद्धि के प्रति संवेदनशील होती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर तापमान समय से पहले बढ़ता है तो फसलें जल्दी पकने लगती हैं। इससे बालियों में दानों का विकास ठीक से नहीं हो पाता, दाने हल्के रह जाते हैं और पैदावार घट जाती है।
उत्तर-पश्चिम भारत देश का प्रमुख गेहूं उत्पादक क्षेत्र है। ऐसे में तापमान में बढ़ोतरी और वर्षा की कमी से उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिसका असर खाद्य आपूर्ति और कीमतों पर भी पड़ सकता है।
जल संसाधनों पर भी असर
पश्चिमी हिमालय में कम हिमपात का असर केवल कृषि तक सीमित नहीं रहेगा। हिमालयी क्षेत्र की बर्फ पिघलकर नदियों को जल प्रदान करती है। यदि सर्दियों में हिमपात कम होता है, तो गर्मियों में नदियों के जलस्तर पर असर पड़ सकता है। यह स्थिति सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और जलविद्युत उत्पादन पर भी प्रभाव डाल सकती है।
आगे की चुनौती
आईएमडी का यह पूर्वानुमान संकेत देता है कि देश को बदलते मौसम पैटर्न के साथ तालमेल बैठाने की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन के दीर्घकालिक प्रभावों को देखते हुए कृषि रणनीतियों, जल प्रबंधन और आपदा तैयारी में सुधार आवश्यक हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों को मौसम की जानकारी के आधार पर फसल प्रबंधन के उपाय अपनाने चाहिए, जैसे समय पर सिंचाई, उर्वरक प्रबंधन और तापमान-सहनशील किस्मों का चयन।
संकेत चिंताजनक
फरवरी में सामान्य से अधिक तापमान और कम वर्षा का अनुमान देश के लिए कई स्तरों पर चुनौती पेश कर सकता है। पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में शुष्क सर्दी जलवायु परिवर्तन के संकेतों में से एक हो सकती है। कृषि, जल संसाधन और पर्यावरण तीनों पर इसके प्रभाव को देखते हुए सतर्कता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना समय की मांग है। आने वाले हफ्तों में वास्तविक मौसम की स्थिति इस पूर्वानुमान की दिशा तय करेगी, लेकिन फिलहाल संकेत चिंताजनक हैं।
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