कमजोर मानसून के बाद भारत में पानी और बिजली की किल्लत
भारत में 11 साल के सबसे कमजोर मानसून ने किसानों, जल आपूर्ति और बिजली उत्पादन पर दबाव बढ़ा दिया है. जलाशयों में पानी की कमी और बिजली संकट के बीच ग्रामीण आमदनी और खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी असर पड़ रहा है.

44 साल के रमेश रेड्डी ने जून में अपने साढ़े तीन एकड़ (करीब 1.4 हेक्टेयर) टमाटर के खेत में अपनी सारी जमा-पूंजी लगा दी. कर्नाटक के दक्षिणी हिस्से में कोलार जिले के रहने वाले इस किसान ने 3.2 लाख रुपये का निवेश किया. इसके लिए उन्होंने 2.5 लाख रुपये 24 फीसदी सालाना ब्याज पर उधार लिए और अपनी पत्नी के शादी के गहने गिरवी रख दिए.
फसल से उन्हें कर्ज चुकाने और बेटे की कॉलेज फीस का बकाया भरने की उम्मीद थी. लेकिन तभी खेत के सिंचाई कुएं का पानी सूख गया. तीन हफ्तों के भीतर टमाटर के पौधे भूरे पड़ गए और रेड्डी एक भी पेटी टमाटर नहीं बचा सके.
उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "मैंने जो कुछ भी लगाया था, सब खो दिया. अगली फसल के लिए मेरे पास पैसे नहीं बचे हैं और मुझे नहीं पता कि मैं कर्ज कैसे चुकाऊंगा.”
अब वह राज्य की राजधानी बेंगलुरु में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी के लिए बातचीत कर रहे हैं और अपनी खेती की जमीन पीछे छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं.
11 साल में सबसे कमजोर मानसून
भारत के लिए मानसून सिर्फ चार महीने चलने वाला बारिश का मौसम नहीं है. यह जलाशयों को फिर से भरता है, खेती को सहारा देता है और देश के बड़े हिस्से में पानी की आपूर्ति और बिजली उत्पादन बनाए रखने में मदद करता है.
भारत के करीब आधे कामगार अपनी आजीविका के लिए खेती पर निर्भर हैं. यह ऐसा काम है, जिसमें मेहनत बहुत लगती है और आर्थिक असुरक्षा भी बनी रहती है.
इस साल जून से सितंबर के बीच देश में 759.4 मिलीमीटर (करीब 30 इंच) बारिश हुई, जबकि लंबे समय का औसत 868.6 मिलीमीटर है. बारिश में 12.6 फीसदी की कमी के कारण यह 11 साल में देश का सबसे कमजोर मानसून रहा. इस सदी में इससे कम बारिश वाला यह चौथा मानसून था.
जलवायु वैज्ञानिक और भारत के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के पूर्व सचिव माधवन नायर राजीवन ने कहा कि कमजोर मानसून की मुख्य वजह अल नीनो की गंभीर स्थिति थी. उन्होंने पहले ही चेतावनी दी थी कि जलवायु की यह वैश्विक घटना बारिश के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है.
राजीवन ने डीडब्ल्यू से कहा, "जहां तक भारतीय मानसून का सवाल है, अल नीनो सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव डालने वाला कारक है, जिस पर हमें बहुत गंभीरता से विचार करना चाहिए.”
पानी और बिजली पर बढ़ता दबाव
कमजोर मानसून का असर अब भारत की जल और ऊर्जा व्यवस्था पर पड़ रहा है. मानसून खत्म होने तक देश के प्रमुख जलाशयों में सामान्य से कम पानी बचा था. इससे आने वाले महीनों में किसानों और बिजली क्षेत्र, दोनों के पास पानी की कमी से निपटने के लिए कम गुंजाइश रह गई है.
केंद्रीय जल आयोग की निगरानी वाले 178 जलाशयों में कुल जल भंडारण 132.7 अरब घन मीटर था, जो पिछले 10 वर्षों के औसत 151.1 अरब घन मीटर से कम है.
पानी की इस कमी का असर बिजली उत्पादन पर भी दिखने लगा है. ग्रिड इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में जलविद्युत उत्पादन पिछले साल के इसी महीने की तुलना में करीब 16 फीसदी गिर गया. इसी दौरान बिजली की कमी बढ़कर 560 मिलियन किलोवॉट-घंटे तक पहुंच गई, जो तीन साल से ज्यादा समय में किसी एक महीने की सबसे बड़ी कमी है. सूर्यास्त के बाद, जब सौर ऊर्जा का उत्पादन घट जाता है, तो बिजली की कमी पूरी करने के लिए ग्रिड के पास विकल्प भी कम रह जाते हैं.
ऐसे में कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों पर ज्यादा भार पड़ा है, लेकिन वहां भी एक समस्या है. केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के आंकड़ों से पता चला कि करीब 40 फीसदी कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में कोयले का भंडार बेहद कम था. उनके पास जरूरी मात्रा के एक-चौथाई से भी कम कोयला बचा था.
सरकार ने कुछ निजी औद्योगिक बिजली संयंत्रों को पूरी क्षमता से चलने और अतिरिक्त बिजली ग्रिड को देने का आदेश दिया है.
इसका दबाव अब विनिर्माण क्षेत्र पर भी दिखने लगा है. करीब 600 छोटे और मझोले निर्माताओं का प्रतिनिधित्व करने वाले मोहाली इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक गुप्ता ने कहा, "विनिर्माण इकाइयों के लिए बिजली की निर्बाध आपूर्ति बेहद जरूरी है, क्योंकि बिजली कटौती से उत्पादन का चक्र बाधित होता है.”
उन्होंने आगे कहा, "इस तरह की रुकावटों से न सिर्फ निर्माताओं को नुकसान होता है, बल्कि कच्चे माल की बर्बादी भी होती है.”
ग्रामीण आमदनी पर असर
कमजोर मानसून का आर्थिक असर खेती से कहीं आगे तक जा सकता है. कृषि उत्पादन घटने से ग्रामीण आमदनी, रोजगार और खपत पर असर पड़ सकता है. वहीं, खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें घरेलू बजट पर और दबाव डाल सकती हैं.
अर्थशास्त्र के सेवानिवृत्त प्रोफेसर अरुण कुमार ने कहा कि इसके प्रभाव अर्थव्यवस्था के प्रमुख आंकड़ों से कहीं ज्यादा व्यापक हो सकते हैं. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा औपचारिक क्षेत्र के बाहर काम करता है.
कुमार ने डीडब्ल्यू से कहा, "आर्थिक विकास का आकलन संकेतकों के एक व्यापक समूह के आधार पर किया जाना चाहिए.” उन्होंने कहा कि कृषि उत्पादन कमजोर होने से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं, जबकि आमदनी और खपत पर भी दबाव पड़ सकता है.
दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के विकास अर्थशास्त्री हिमांशु ने ग्रामीण परिवारों के लिए इस स्थिति को "दोहरी मार” बताया. उनके मुताबिक, एक तरफ खेती से होने वाली आमदनी घट रही है, तो दूसरी तरफ खाद्य पदार्थ महंगे हो रहे हैं.
उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "जब कृषि से होने वाली आमदनी घटती है और खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ती हैं, तो ग्रामीण परिवारों की खरीदने की क्षमता पर दोहरा दबाव पड़ता है.”
अर्थशास्त्री ने कहा कि बारिश का असमान वितरण इस समस्या को और गंभीर बना सकता है. कुछ कृषि क्षेत्रों में नुकसान राष्ट्रीय स्तर पर बारिश की कमी के आंकड़े से कहीं ज्यादा हो सकता है.
उन्होंने आगे कहा, "ग्रामीण खपत पर भी इसका काफी असर पड़ सकता है, क्योंकि कम आमदनी और खाने-पीने की बढ़ती लागत का सामना कर रहे परिवारों के पास दूसरी वस्तुओं और सेवाओं पर खर्च करने के लिए कम पैसे बचते हैं.”
जलवायु परिवर्तन के साथ भविष्य का अनुमान लगाना मुश्किल
इसका असर शहरी परिवारों पर भी पड़ रहा है. सितंबर में भारत के केंद्रीय बैंक के एक सर्वे में सामने आया कि परिवारों को महंगाई बढ़ने की आशंका है. इसकी वजह खाद्य पदार्थों और ईंधन की बढ़ती कीमतों का लोगों की आर्थिक धारणा पर पड़ता असर है.
नई दिल्ली में रहने वाली गृहिणी सुनीता शर्मा ने बताया कि उनकी रोजमर्रा की खरीदारी पर अब कुछ महीने पहले के मुकाबले सैकड़ों रुपये ज्यादा खर्च हो रहे हैं.
उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "रोजमर्रा का बुनियादी खाना खरीद पाने के लिए हमारे पास गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.”
हाल के दिनों में कुछ जरूरी खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है. उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के आधार पर ISignal के एक विश्लेषण के मुताबिक, सितंबर में प्याज की कीमतें एक साल पहले की तुलना में 93 फीसदी ज्यादा थीं. वहीं, चीनी की कीमतों में 28 फीसदी और चावल की कीमतों में करीब आठ फीसदी की बढ़ोतरी हुई.
अब अगली चुनौती रबी यानी सर्दियों की फसल होगी. किसान गेहूं, सरसों और चने की बुवाई की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन इसकी सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि कमजोर मानसून के बाद मिट्टी में कितनी नमी बची है.
राजीवन ने कहा कि जलवायु के गर्म होने के साथ भविष्य की परिस्थितियों का अनुमान लगाना भी लगातार मुश्किल होता जा रहा है.
उन्होंने कहा, "गर्म होती जलवायु में लंबे समय तक सूखा रहने और बारिश में अधिक उतार-चढ़ाव की संभावना है.” उन्होंने आगे कहा, "भविष्य में अल नीनो की घटनाओं के प्रभाव के अलावा हमें गर्म होती जलवायु के प्रभाव के लिए भी तैयार रहना चाहिए.”
कर्नाटक के किसान रेड्डी अब बेंगलुरु में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी मिलने के जवाब का इंतजार कर रहे हैं और अपनी खेती की जमीन छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं.


