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‘बीबीसी की भारतीय आवाज’ खामोश: दिग्गज पत्रकार सर मार्क टुली का 90 वर्ष की आयु में निधन

‘बीबीसी की भारतीय आवाज’ खामोश: दिग्गज पत्रकार सर मार्क टुली का 90 वर्ष की आयु में निधन
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नई दिल्ली। बीबीसी के पूर्व भारत ब्यूरो प्रमुख और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता के एक बड़े नाम सर मार्क टुली का 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वह लंबे समय से अस्वस्थ थे और दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। टुली दिल्ली के निजामुद्दीन वेस्ट इलाके में रहते थे। उनके निधन से भारतीय और वैश्विक पत्रकारिता जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। सहयोगियों और समकालीन पत्रकारों ने इसे पत्रकारिता की अपूरणीय क्षति बताया है।

मार्क टुली को दशकों तक भारत की राजनीति, समाज और संस्कृति की “नब्ज पहचानने वाले पत्रकार” के रूप में जाना जाता रहा। उनकी शांत, विश्वसनीय और गहराई से भरी रिपोर्टिंग ने उन्हें “बीबीसी की भारतीय आवाज” बना दिया था।

प्रधानमंत्री और नेताओं ने जताया शोक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सर मार्क टुली के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा, “सर मार्क टुली के निधन से दुख हुआ। वह पत्रकारिता की एक प्रभावशाली आवाज़ थे। भारत और यहां के लोगों से उनका जुड़ाव उनके काम में साफ़ दिखता था। उनकी रिपोर्टिंग और विचारों ने सार्वजनिक विमर्श पर स्थायी प्रभाव छोड़ा है।”

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि कोलकाता में जन्मे इस पत्रकार का भारत से गहरा लगाव था और देश उन्हें अपने ही लोगों में से एक मानता था। केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि कई पीढ़ियों तक उनकी शांत और पहचानी जाने वाली आवाज पूरे उपमहाद्वीप में ख़बरों का पर्याय रही।

कलकत्ता में जन्म, भारत से आजीवन रिश्ता

मार्क टुली का जन्म वर्ष 1935 में कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ था। उन्होंने ब्रिटेन के प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से इतिहास और धर्मशास्त्र की पढ़ाई की। औपचारिक रूप से ब्रिटिश नागरिक होने के बावजूद भारत उनके जीवन और कार्य का केंद्र रहा। दिल्ली के विदेशी पत्रकार समुदाय में वह उन गिने-चुने लोगों में शामिल थे जो धाराप्रवाह हिंदी बोलते थे। इसी कारण भारतीय पत्रकार और आम लोग उन्हें स्नेह से “टुली साहब” कहकर बुलाते थे। उनकी भाषा, उच्चारण और समझ में भारतीयता साफ झलकती थी।

दक्षिण एशिया की ऐतिहासिक घटनाओं के साक्षी

अपने लंबे पत्रकारिता करियर में मार्क टुली ने दक्षिण एशिया की कई युग-परिवर्तनकारी घटनाओं को कवर किया। इनमें पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की फांसी, 1984 का ऑपरेशन ब्लू स्टार, भोपाल गैस त्रासदी, भारत-पाक युद्ध, राजीव गांधी की हत्या और 1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वंस जैसी घटनाएं शामिल हैं।

बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौरान वह अयोध्या में मौजूद थे। उग्र भीड़ के हमले के बीच उन्हें एक कमरे में बंद कर दिया गया था, जहां से बाद में स्थानीय अधिकारियों ने उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला। आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें 24 घंटे के नोटिस पर भारत छोड़ने का आदेश दिया था, लेकिन आपातकाल समाप्त होते ही वे दोबारा भारत लौट आए।

सम्मान और पहचान

भारत सरकार ने उनके योगदान को देखते हुए उन्हें पद्म श्री और पद्म भूषण से सम्मानित किया। वर्ष 2002 में ब्रिटेन ने उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान के लिए ‘नाइटहुड’ प्रदान किया, जिसके बाद उनके नाम के साथ ‘सर’ जुड़ा। हालांकि वे ब्रिटिश नागरिक थे, लेकिन बाद में उन्होंने ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया (OCI) का दर्जा प्राप्त किया। वह अक्सर कहते थे कि वे खुद को दो देशों भारत और ब्रिटेन—का नागरिक मानते हैं, क्योंकि दोनों से उनका गहरा भावनात्मक रिश्ता है।

पत्रकारिता के शिक्षक थे टुली

लंबे समय तक उनके साथ काम करने वाले पत्रकार मधुकर उपाध्याय ने कहा कि मार्क टुली ऐसे पत्रकार थे, जिनसे देखकर ही पत्रकारिता सीखी जा सकती थी। उनके अनुसार, “वह कभी यह नहीं कहते थे कि क्या करना है या क्या नहीं करना है। उन्होंने अपने आचरण से पत्रकारिता के उच्च मानदंड स्थापित किए।” उपाध्याय ने एक रोचक किस्सा साझा करते हुए कहा कि टुली अक्सर हैरान होते थे कि लोग सैकड़ों पन्नों की किताबें कैसे लिख लेते हैं, क्योंकि वह खुद 200 शब्दों की खबर लिखने के बाद भी बहुत सोच-विचार करते थे। मूल रूप से वह एक रेडियो पत्रकार थे, लेकिन उन्होंने लेखन के क्षेत्र में भी अमिट छाप छोड़ी।

किताबों के जरिए भारत को समझने की कोशिश

मार्क टुली ने भारत पर कई महत्वपूर्ण और चर्चित पुस्तकें लिखीं। उनकी प्रमुख कृतियों में “द हार्ट ऑफ इंडिया”, “नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया”, और “इंडिया इन स्लो मोशन” शामिल हैं, जिनमें भारतीय समाज, राजनीति और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं का गहन विश्लेषण मिलता है।

इसके अलावा “नॉन-स्टॉप इंडिया” (शेखर गुप्ता के साथ), “द सिक्स्थ एस्टेट” और “अमृतसर: मिसेज गांधी’ज लास्ट बैटल” भी उनकी चर्चित रचनाओं में शामिल हैं। इन पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने भारत को पश्चिमी पाठकों के लिए समझने योग्य बनाया।

एक युग का अंत

सर मार्क टुली का निधन केवल एक पत्रकार का जाना नहीं है, बल्कि उस पीढ़ी का अंत है जिसने जमीन से जुड़ी, संतुलित और मानवीय पत्रकारिता को प्राथमिकता दी। उनकी आवाज़, उनकी दृष्टि और भारत के प्रति उनका स्नेह आने वाली पीढ़ियों के पत्रकारों के लिए प्रेरणा बना रहेगा। भारतीय पत्रकारिता में “टुली साहब” का नाम हमेशा सम्मान और विश्वसनीयता के साथ याद किया जाता रहेगा।


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