आवारा कुत्तों के हमलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, राज्यों को भारी मुआवजे की चेतावनी
सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा, हर उस मामले में जहां कुत्तों के काटने से बच्चों या बुजुर्गों की मौत या चोट होती है, राज्य सरकार पर भारी मुआवजा लगाया जाएगा, क्योंकि सरकार ने कुछ नहीं किया।

सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा, “हर उस मामले में जहां कुत्तों के काटने से बच्चों या बुजुर्गों की मौत या चोट होती है, राज्य सरकार पर भारी मुआवजा लगाया जाएगा, क्योंकि सरकार ने कुछ नहीं किया।” उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ सरकार ही नहीं, बल्कि वे लोग और संगठन भी जवाबदेही से बच नहीं सकते जो सड़कों पर आवारा कुत्तों को खाना खिलाते हैं। जस्टिस नाथ ने दो टूक कहा, “अगर इतना ही शौक है तो कुत्तों को अपने घर ले जाइए। सड़क पर क्यों छोड़ा जा रहा है कि वे लोगों को डराएं और काटें?”
जस्टिस संदीप मेहता ने गुरुस्वामी की दलीलों पर टिप्पणी करते हुए कहा, “अभी तक तो भावनाएं सिर्फ कुत्तों के लिए दिख रही हैं।” इस पर मेनका गुरुस्वामी ने जवाब दिया, “ऐसा नहीं है, मैं इंसानों की भी उतनी ही चिंता करती हूं।” उन्होंने संसद में इस विषय पर हुई बहसों का हवाला देते हुए कहा कि आवारा कुत्तों को मारना समाधान नहीं हो सकता।
मेनका गुरुस्वामी द्वारा संसद की बहसों का जिक्र किए जाने पर जस्टिस संदीप मेहता ने तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “संसद एलीट क्लास है।” इस टिप्पणी को आम नागरिकों की रोजमर्रा की समस्याओं और जमीनी हकीकत से जोड़कर देखा जा रहा है।
कोर्ट ने इस दलील पर तीखी प्रतिक्रिया दी। जस्टिस विक्रम नाथ ने सवाल उठाया, “जब कुत्ते 9 साल के बच्चे पर हमला करते हैं, तो किसे जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए? क्या उस संगठन को जो उन्हें खाना खिला रहा है? क्या हम इस समस्या से आंखें मूंद लें?” कोर्ट ने साफ कहा कि आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वाले तथाकथित डॉग लवर्स अगर सच में जिम्मेदार हैं, तो उन्हें कुत्तों को अपने घर ले जाना चाहिए, न कि सार्वजनिक सड़कों पर छोड़ना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान एक और गंभीर पहलू की ओर ध्यान दिलाया। कोर्ट ने कहा कि कुत्तों में एक खास तरह का वायरस होता है, जिसका कोई इलाज नहीं है। अदालत ने रणथंभौर नेशनल पार्क का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां कुत्तों को काटने वाले बाघ एक लाइलाज बीमारी से संक्रमित पाए गए थे। यह टिप्पणी इस ओर इशारा करती है कि आवारा कुत्तों की समस्या सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है, बल्कि वन्यजीवों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी खतरा बन सकती है।
पीठ ने कहा कि सरकारों और समाज दोनों को यह समझना होगा कि इस समस्या से आंखें मूंद लेने से हालात और बिगड़ेंगे। कोर्ट ने दोहराया कि जिन लोगों या संगठनों का दावा है कि वे कुत्तों को खाना खिलाकर सेवा कर रहे हैं, उनकी भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी के बाद अब गेंद राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन के पाले में है। अदालत के संकेत साफ हैं—अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो न सिर्फ कानूनी कार्रवाई होगी, बल्कि भारी आर्थिक जिम्मेदारी भी तय की जाएगी। यह मामला आने वाले दिनों में आवारा कुत्तों की नीति, नसबंदी कार्यक्रमों और पशु-कल्याण बनाम सार्वजनिक सुरक्षा की बहस को नई दिशा दे सकता है।


