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सुप्रीम कोर्ट का आदेश, सभी स्कूलों में लड़कियों को उपलब्ध कराए जाएं मुफ्त सैनेटरी पैड, जानें क्या कहा
जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने जया ठाकुर की याचिका पर शुक्रवार को यह ऐतिहासिक फैसला दिया। 126 पेज के विस्तृत फैसले मे कोर्ट ने कई दिशा-निर्देश जारी किए हैं। फैसले में कोर्ट ने कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता उत्पादों की अनुपलब्धता लड़कियों की गरिमा को ठेस पहुंचाती है।

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल जाने वाली लड़कियों के मासिक धर्म स्वास्थ्य (मेंस्ट्रुअल हेल्थ) को जीवन के मौलिक अधिकार का अभिन्न हिस्सा मानते हुए देशभर के सरकारी और निजी स्कूलों में मुफ्त सैनेटरी पैड उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने यह भी आदेश दिया कि सभी स्कूलों में लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग शौचालय हों तथा उनमें साबुन और निरंतर पानी की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदेश का अनुपालन अनिवार्य होगा। निजी स्कूलों द्वारा आरटीई (शिक्षा का अधिकार) कानून के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर उनकी मान्यता रद्द की जा सकती है। सरकारी स्कूलों के मामले में संबंधित राज्य सरकारें जिम्मेदार होंगी। केंद्र और राज्य सरकारों को तीन महीने के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
126 पन्नों का विस्तृत फैसला
जस्टिस जे.बी. पारडीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने जया ठाकुर की याचिका पर शुक्रवार को 126 पन्नों का विस्तृत निर्णय सुनाया। फैसले में मासिक धर्म स्वास्थ्य को संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार), अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21ए (मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार) से जोड़ा गया है। पीठ ने कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता उत्पादों की अनुपलब्धता न केवल लड़कियों की शिक्षा में बाधा बनती है, बल्कि उनकी गरिमा और समान अवसर के अधिकार को भी प्रभावित करती है।
शिक्षा ‘मल्टीप्लायर राइट’, गरिमा से जुड़ा अधिकार
अदालत ने अपने फैसले में शिक्षा के अधिकार को ‘मल्टीप्लायर राइट’ करार दिया। कोर्ट ने कहा कि शिक्षा ऐसा अधिकार है, जो अन्य सभी मानवाधिकारों के प्रयोग की क्षमता प्रदान करता है। शिक्षा तक समान पहुंच के बिना जीवन और गरिमा के अधिकार को पूरी तरह हासिल नहीं किया जा सकता। पीठ ने कहा कि मासिक धर्म स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाओं की कमी के कारण कई लड़कियां स्कूल से अनुपस्थित रहती हैं या पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं। यह स्थिति उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन है।
गरिमा और निजता का सवाल
फैसले में कहा गया कि मासिक धर्म स्वच्छता उत्पादों की अनुपलब्धता से लड़कियों की गरिमा को ठेस पहुंचती है। गरिमा का अर्थ केवल शारीरिक अस्तित्व नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियों में जीवन जीना है जहां व्यक्ति अपमान, बहिष्कार या अनावश्यक पीड़ा का सामना न करे। कोर्ट ने निजता के अधिकार को भी गरिमा से अविभाज्य बताया। पीठ ने कहा कि राज्य का दायित्व है कि वह न केवल निजता का उल्लंघन करने से बचे, बल्कि उसकी रक्षा के लिए सकारात्मक कदम भी उठाए। मासिक धर्म से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं की अनुपस्थिति लड़कियों की निजता और आत्मसम्मान को प्रभावित करती है।
प्रजनन और यौन स्वास्थ्य का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में स्वस्थ प्रजनन स्वास्थ्य का अधिकार भी शामिल है। इसमें यौन एवं प्रजनन संबंधी जानकारी प्राप्त करने और सुरक्षित स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच का अधिकार भी निहित है। पीठ ने स्पष्ट किया कि स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन की कमी लड़कियों को समान शर्तों पर शिक्षा में भागीदारी से वंचित करती है। यह संविधान के समानता और शिक्षा के अधिकार के सिद्धांतों के विपरीत है।
स्कूलों के लिए अनिवार्य दिशा-निर्देश
अदालत ने सभी सरकारी और निजी स्कूलों के लिए निम्नलिखित निर्देश जारी किए—
लड़कियों को मुफ्त सैनेटरी पैड उपलब्ध कराए जाएं।
लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय हों।
शौचालयों में साफ-सफाई, साबुन और निरंतर पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएं।
कोर्ट ने कहा कि आरटीई कानून के तहत नि:शुल्क शिक्षा का अर्थ केवल फीस माफी नहीं है, बल्कि वे सभी खर्च भी इसमें शामिल हैं जो किसी बच्चे को प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने से रोक सकते हैं।
अनुपालन नहीं होने पर कड़ी कार्रवाई
फैसले में कहा गया कि निजी स्कूल यदि इन निर्देशों का पालन नहीं करते हैं तो उनकी मान्यता रद्द की जा सकती है और उन्हें कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा। सरकारी स्कूलों में कमी पाए जाने पर संबंधित राज्य सरकारें उत्तरदायी होंगी। केंद्र और राज्य सरकारों को तीन महीने के भीतर विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करनी होगी।
सामाजिक बदलाव की दिशा में बड़ा कदम
यह फैसला केवल स्वास्थ्य या शिक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने संकेत दिया कि मासिक धर्म जैसे प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया को लेकर समाज में व्याप्त संकोच और भेदभाव को समाप्त करना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय लड़कियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और गरिमा सुनिश्चित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है, जो स्कूलों में लैंगिक समानता को मजबूती देगा और लाखों छात्राओं के जीवन पर सकारात्मक
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