वायरल 'CJP' कैंपेन पर चिंता जताने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस, जानें क्या मामला
याचिका में 15 मई को सुप्रीम कोर्ट में हुई एक सुनवाई का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता राजा चौधरी का दावा है कि उस सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कथित तौर पर फर्जी डिग्री के आधार पर कानूनी पेशे में आने वाले लोगों के संदर्भ में ‘परजीवी’ और ‘काकरोच जैसे युवा’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था।

नई दिल्ली: फर्जी वकीलों, कानून की कथित फर्जी डिग्रियों और ‘काकरोच जनता पार्टी’ (CJP) से जुड़े लोगों की गतिविधियों की जांच की मांग वाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सुनवाई की। मामले में कोर्ट ने केंद्र सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में न्यायिक कार्यवाही के दौरान की गई टिप्पणियों के इंटरनेट मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कथित व्यावसायिक इस्तेमाल को रोकने के लिए भी सुरक्षा उपाय लागू करने की मांग की गई है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए मामले की अगली सुनवाई के लिए 10 सितंबर की तारीख तय की है। अब केंद्र सरकार, BCI और CBI को याचिका में उठाए गए मुद्दों पर अपना पक्ष रखना होगा।
15 मई की सुनवाई के बाद शुरू हुआ विवाद
याचिका में 15 मई को सुप्रीम कोर्ट में हुई एक सुनवाई का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता राजा चौधरी का दावा है कि उस सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कथित तौर पर फर्जी डिग्री के आधार पर कानूनी पेशे में आने वाले लोगों के संदर्भ में ‘परजीवी’ और ‘काकरोच जैसे युवा’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था। इन कथित टिप्पणियों के बाद सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा शुरू हुई। इसी दौरान ‘काकरोच जनता पार्टी’ नाम का एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म सामने आया। याचिका में दावा किया गया है कि बाद में यह प्लेटफॉर्म तेजी से एक बड़े डिजिटल मूवमेंट, ऑनलाइन ब्रांड और राजनीतिक प्रतीक के रूप में विकसित हुआ।
न्यायिक टिप्पणियों के व्यावसायिक इस्तेमाल पर सवाल
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से न्यायिक कार्यवाही के दौरान की गई टिप्पणियों और संस्थागत अभिव्यक्तियों के कथित व्यावसायिक इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए उचित व्यवस्था बनाने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि सोशल मीडिया कैंपेन, डिजिटल कंटेंट और अन्य माध्यमों के जरिए न्यायिक टिप्पणियों का इस्तेमाल कर कमाई करने की गतिविधियों पर निगरानी जरूरी है। हालांकि, याचिका में निष्पक्ष आलोचना, लोकतांत्रिक असहमति और व्यंग्य को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा मानने की बात भी कही गई है। याचिकाकर्ता के मुताबिक, संवैधानिक व्यवस्था में न्यायपालिका की आलोचना और असहमति के लिए जगह है, लेकिन गंभीर न्यायिक कार्यवाही अथवा संस्थागत अभिव्यक्तियों का ऐसा व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं होना चाहिए, जिससे न्यायपालिका और न्याय प्रशासन में लोगों के विश्वास पर प्रतिकूल असर पड़े।
फर्जी वकीलों की स्वतंत्र जांच की मांग
जनहित याचिका में फर्जी वकीलों और कानून की कथित फर्जी डिग्रियों से जुड़े मामलों की स्वतंत्र जांच कराने की मांग भी की गई है। याचिकाकर्ता ने सुझाव दिया है कि इस मामले की जांच CBI या किसी अन्य स्वतंत्र जांच एजेंसी से कराई जा सकती है। याचिका में कहा गया है कि जांच का दायरा उन शिकायतों और चिंताओं तक होना चाहिए, जिनमें न्यायिक व्यवस्था में फर्जी या धोखाधड़ी करने वाले लोगों के मौजूद होने की बात सामने आई है। इसके लिए BCI और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की ओर से पहले व्यक्त की गई चिंताओं तथा संबंधित रिपोर्टों को भी आधार बनाने की मांग की गई है।
न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा मामला
याचिकाकर्ता का तर्क है कि फर्जी शैक्षणिक डिग्री के आधार पर किसी व्यक्ति का कानूनी पेशे में प्रवेश केवल संबंधित व्यक्ति तक सीमित समस्या नहीं है। इसका सीधा असर अदालतों में होने वाली कार्यवाही और न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर पड़ सकता है। इसी वजह से याचिका में फर्जी वकीलों की पहचान, उनकी डिग्रियों की जांच और जरूरत पड़ने पर स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग की गई है। साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर न्यायिक कार्यवाही की सामग्री के इस्तेमाल को लेकर भी स्पष्ट दिशानिर्देश बनाए जाने की मांग की गई है।
10 सितंबर को होगी अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद अब केंद्र सरकार, BCI और CBI का जवाब इस मामले में महत्वपूर्ण होगा। अगली सुनवाई 10 सितंबर को प्रस्तावित है। उस दौरान कोर्ट याचिका में उठाए गए मुद्दों, फर्जी वकीलों और कथित फर्जी डिग्रियों की जांच की मांग तथा न्यायिक टिप्पणियों के डिजिटल और व्यावसायिक इस्तेमाल से जुड़े पहलुओं पर आगे विचार कर सकता है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। याचिका में लगाए गए आरोप और मांगी गई जांच की जरूरत पर अंतिम निर्णय आगे की न्यायिक कार्यवाही में होगा।


