SC का फैसला: कोयला आवंटन केस में पूर्व PM मनमोहन सिंह को क्लीन चिट, ट्रायल कोर्ट का आदेश निरस्त
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि सीबीआई की ओर से दाखिल दोनों क्लोजर रिपोर्ट कानून के अनुरूप थीं। अदालत ने माना कि जांच एजेंसी ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उचित निष्कर्ष निकाला था और ट्रायल कोर्ट के पास इन रिपोर्टों को खारिज करने के लिए पर्याप्त और ठोस कारण नहीं थे।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को 2005 के तालाबीरा-II कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही समाप्त कर दी है। शीर्ष अदालत ने बुधवार को फैसला सुनाते हुए विशेष अदालत (स्पेशल कोर्ट) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें डॉ. सिंह समेत अन्य आरोपियों को समन जारी किया गया था। इसके साथ ही अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए स्पष्ट कर दिया कि मामले को आगे बढ़ाने का कोई कानूनी आधार नहीं बचता।
ट्रायल कोर्ट के आदेश को बताया असंगत
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि सीबीआई की ओर से दाखिल दोनों क्लोजर रिपोर्ट कानून के अनुरूप थीं। अदालत ने माना कि जांच एजेंसी ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उचित निष्कर्ष निकाला था और ट्रायल कोर्ट के पास इन रिपोर्टों को खारिज करने के लिए पर्याप्त और ठोस कारण नहीं थे। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी अदालत को जांच एजेंसी की रिपोर्ट को खारिज करने के लिए मजबूत कानूनी आधार प्रस्तुत करना आवश्यक होता है। इस मामले में ऐसा कोई आधार सामने नहीं आया, इसलिए विशेष अदालत द्वारा जारी समन आदेश टिक नहीं सकता।
क्या है तालाबीरा-II कोयला ब्लॉक मामला?
यह मामला वर्ष 2005 में ओडिशा स्थित तालाबीरा-II कोयला ब्लॉक के आवंटन से जुड़ा है। उस समय केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार थी और तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के पास कोयला मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी था। आरोप लगाया गया था कि कोयला ब्लॉक आवंटन की प्रक्रिया में अनियमितताएं हुईं और कुछ निजी कंपनियों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया। इस मामले में उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला, पूर्व कोयला सचिव पी.सी. पारख सहित अन्य लोगों के नाम भी जांच के दायरे में आए थे।
सीबीआई जांच में नहीं मिला आपराधिक साजिश का प्रमाण
मामले की जांच कर रही सीबीआई ने विस्तृत पड़ताल के बाद अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी। जांच एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि उपलब्ध दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर किसी भी आरोपी के खिलाफ आपराधिक साजिश या भ्रष्टाचार का मामला साबित नहीं होता। इसी आधार पर सीबीआई ने अदालत से मामले को बंद करने की अनुमति मांगी थी। हालांकि, स्पेशल कोर्ट ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करने से इनकार कर दिया और मार्च 2015 में डॉ. मनमोहन सिंह, कुमार मंगलम बिड़ला, पी.सी. पारख तथा तीन अन्य लोगों को आरोपी के रूप में तलब करने का आदेश जारी कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले लगाई थी रोक
स्पेशल कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। शीर्ष अदालत ने वर्ष 2015 में ही विशेष अदालत के समन आदेश पर रोक लगा दी थी। इसके बाद मामले की विस्तृत सुनवाई कई वर्षों तक चलती रही। अब अंतिम फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने न केवल स्पेशल कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया, बल्कि सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को भी पूरी तरह सही ठहराया। अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी की रिपोर्ट में कोई ऐसी खामी नहीं है, जिसके आधार पर मामले को आगे बढ़ाया जाए।
फैसले का कानूनी महत्व
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के खिलाफ तालाबीरा-II कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में सभी आपराधिक कार्यवाहियां समाप्त हो गई हैं। यह निर्णय इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब जांच एजेंसी पर्याप्त जांच के बाद क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करती है, तो उसे खारिज करने के लिए अदालत के पास ठोस और स्पष्ट कानूनी कारण होना आवश्यक है। इस फैसले से करीब एक दशक से अधिक समय से लंबित इस बहुचर्चित मामले का अंत हो गया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद डॉ. मनमोहन सिंह, उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला, पूर्व कोयला सचिव पी.सी. पारख और अन्य आरोपियों के खिलाफ इस मामले में अब कोई आपराधिक मुकदमा नहीं चलेगा।


