CEC नियुक्ति कानून पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती, रिकॉल अर्जी पर CJI सूर्यकांत ने कहा- विचार करेंगे
रिकॉल अर्जी का एक प्रमुख आधार सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि जस्टिस शर्मा के बेटे सिद्धार्थ शर्मा जुलाई 2024 से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनाव आयोग के स्टैंडिंग काउंसल के तौर पर पेश हो रहे हैं।

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून पर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के खिलाफ दाखिल रिकॉल अर्जी पर बुधवार को जल्द सुनवाई की मांग की गई। वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ के सामने इस मामले का उल्लेख किया। उन्होंने अदालत को बताया कि मामले में क्यूरेटिव याचिका भी दाखिल की जा चुकी है, लेकिन उससे पहले रिकॉल अर्जी पर विचार किया जाना जरूरी है। सीजेआई सूर्यकांत ने इस पर कहा कि अदालत मामले की जांच करेगी और इसके बाद आगे की कार्रवाई को लेकर फैसला लिया जाएगा। रिकॉल अर्जी में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर दोबारा विचार की मांग की गई है, जिसमें चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हुई थी।
#BREAKING Sr Adv Gopal S mentions before #SupremeCourt application filed seeking recall of the Court's 2-judge bench split verdict in #ElectionCommissionersAppointment case
Gopal S: We have filed an application for recall. I had mentioned before J Datta's bench, but matter has been released to your lordships on administrative side. I believe there's a curative also filed, but curative is to be preceded by a review
CJI: We will examine and then take a call.
— Live Law (@LiveLawIndia) October 7, 2026
जस्टिस शर्मा के बेटे के ECI से जुड़ाव का मुद्दा
रिकॉल अर्जी का एक प्रमुख आधार सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि जस्टिस शर्मा के बेटे सिद्धार्थ शर्मा जुलाई 2024 से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनाव आयोग के स्टैंडिंग काउंसल के तौर पर पेश हो रहे हैं। अर्जी में कहा गया है कि चुनाव आयोग से जस्टिस शर्मा के बेटे के पेशेवर जुड़ाव की जानकारी महत्वपूर्ण थी और इसे अदालत के सामने स्पष्ट किया जाना चाहिए था। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि यह जानकारी पहले सामने आती, तो संबंधित पक्ष जस्टिस शर्मा से मामले की सुनवाई से अलग होने यानी रिक्यूजल की मांग कर सकते थे।
दो जजों की पीठ में आया था अलग-अलग फैसला
दरअसल, 23 सितंबर को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की दो सदस्यीय पीठ ने 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अलग-अलग राय दी थी। दोनों न्यायाधीशों के बीच इस बात को लेकर मतभेद रहा कि मामले को संविधान पीठ के पास भेजने की जरूरत है या नहीं। जस्टिस दीपांकर दत्ता ने मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने की आवश्यकता से असहमति जताई थी। इसके विपरीत जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने माना था कि याचिकाओं में संविधान की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं। उनके मुताबिक इन सवालों पर कम से कम पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ को सुनवाई करनी चाहिए।
अब CJI को तय करना है अगला कदम
दोनों न्यायाधीशों की अलग-अलग राय के बाद मामले की फाइल CJI सूर्यकांत के पास भेजी गई। अब मुख्य न्यायाधीश को यह तय करना है कि इस विवाद पर संविधान पीठ गठित करने की जरूरत है या नहीं। बुधवार को वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण ने इसी प्रक्रिया के बीच रिकॉल अर्जी का मुद्दा CJI के सामने उठाया। उन्होंने बताया कि पहले उन्होंने जस्टिस दीपांकर दत्ता की अदालत में इस अर्जी का उल्लेख किया था, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर मामला वहां से रिलीज होने के बाद इसे अब मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा गया है। उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि मामले में क्यूरेटिव याचिका दाखिल हो चुकी है। हालांकि, उनका कहना था कि क्यूरेटिव याचिका पर आगे बढ़ने से पहले रिकॉल अर्जी में उठाए गए पहलू पर विचार किया जाना चाहिए। CJI सूर्यकांत ने इस पर मामले की जांच करने और उसके बाद निर्णय लेने की बात कही।
2023 के कानून में क्या बदला गया?
विवाद का केंद्र मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 है। इस कानून में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनाई गई चयन समिति की संरचना में बदलाव किया गया। नए कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। इससे पहले चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका को लेकर अलग व्यवस्था थी। याचिकाकर्ताओं ने इसी व्यवस्था को चुनौती देते हुए कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए हैं। अब रिकॉल अर्जी में न्यायिक प्रक्रिया और जस्टिस शर्मा से जुड़े कथित हितों के टकराव के मुद्दे को उठाया गया है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से मामले की जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि रिकॉल अर्जी पर सुनवाई कब और किस रूप में आगे बढ़ती है।


