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यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट ने की एनटीए को भंग करने की मांग, सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की याचिका

नई दिल्ली, 16 मई (आईएएनएस)। नीट पेपर लीक मामले में नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) को भंग करने की मांग की गई है और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है।

यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट ने की एनटीए को भंग करने की मांग, सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की याचिका
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नई दिल्ली। नीट पेपर लीक मामले में नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) को भंग करने की मांग की गई है और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। सुप्रीम कोर्ट में यह जनहित याचिका यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट की तरफ से दाखिल की गई है। याचिका में नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) को भंग करने की मांग की गई है।

याचिका में भारत सरकार को निर्देश देने की मांग की गई है कि वह संसद में एक कानून पेश करे, जिसके जरिए एक वैधानिक नेशनल टेस्टिंग बॉडी की स्थापना की जा सके। इस बॉडी के पास स्पष्ट कानूनी अधिकार हों, पारदर्शिता के नियम हों और वह सीधे तौर पर विधायिका के प्रति जवाबदेह हो।

याचिका में एक ऐसी समिति गठित करने के निर्देश मांगे गए हैं, जिसकी निगरानी अदालत करे। यह समिति आने वाली राष्ट्रीय परीक्षाओं के बदलाव की प्रक्रिया पर नजर रखेगी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ये परीक्षाएं शून्य-लीक की पूर्ण शुचिता के साथ आयोजित हों।

यह याचिका इस आरोप के साथ दायर की गई है कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी नीट-यूजी 2026 परीक्षा आयोजित करने में पूरी तरह से विफल रही है। याचिका में मांग की गई है कि एनटीए को एक पंजीकृत सोसाइटी से बदलकर संसद के एक अधिनियम द्वारा स्थापित एक वैधानिक निकाय का रूप दिया जाए, ताकि उसकी संवैधानिक और संसदीय जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की गई है, ताकि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) द्वारा नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (नीट-यूजी) के आयोजन में बार-बार हो रही प्रणालीगत और विनाशकारी विफलताओं को रोका जा सके।

याचिका में आगे कहा गया कि नीट-यूजी भारत में स्नातक चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश पाने का एकमात्र जरिया है। यह परीक्षा सीधे तौर पर 22.7 लाख से भी अधिक छात्रों के शैक्षणिक और पेशेवर भविष्य को निर्धारित करती है। इस परीक्षा की शुचिता के साथ बार-बार किया जाने वाला यह समझौता, संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत नागरिकों को प्राप्त समानता के अधिकार और जीवन-आजीविका के अधिकार की मूल गारंटियों पर एक सीधा हमला है।



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