RTI के 21 साल पूरे, 28 सूचना आयोगों में 3.85 लाख मामले लंबित, कुछ राज्यों में सुनवाई के लिए 19 साल तक इंतजार
पारदर्शिता कार्यकर्ता और सेवानिवृत्त कमोडोर लोकेश बत्रा के अनुसार, केंद्रीय सूचना आयोग में एक जनवरी से 12 अक्टूबर 2026 के बीच लंबित मामलों की संख्या में 9,378 की वृद्धि हुई। यह आंकड़ा आयोग में लंबित मामलों के दबाव को लेकर चिंता बढ़ाता है।

नई दिल्ली : सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के 21 साल पूरे होने के बीच देश में सूचना पाने के लिए नागरिकों को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। पारदर्शिता के क्षेत्र में काम करने वाले संगठन सतर्क नागरिक संगठन (एसएनएस) की रिपोर्ट के मुताबिक, 30 जून 2026 तक देश के 28 सूचना आयोगों में करीब 3.85 लाख अपीलें और शिकायतें लंबित थीं। रिपोर्ट में मामलों के निपटारे में देरी के साथ-साथ बिना कोई आदेश पारित किए अपीलों और शिकायतों को लौटाए जाने पर भी चिंता जताई गई है। आंकड़े बताते हैं कि सूचना आयोगों में लंबित मामलों का दबाव नागरिकों के सूचना पाने के अधिकार के प्रभावी इस्तेमाल के सामने बड़ी चुनौती बना हुआ है।
एक साल में 37,701 मामले बिना आदेश लौटाए गए
एसएनएस की रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच नौ सूचना आयोगों ने कुल 37,701 अपीलें और शिकायतें बिना आदेश पारित किए वापस लौटा दीं। इनमें केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के 14,603 मामले, महाराष्ट्र के 14,140, बिहार के 4,417 और गुजरात के 3,276 मामले शामिल हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि पांच सूचना आयोगों ने लौटाई गई अपीलों और शिकायतों से संबंधित आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए। इससे इस प्रक्रिया की व्यापकता का आकलन करना कठिन हो जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, बिना आदेश के मामले लौटाए जाने से सूचना मांगने वाले नागरिकों को अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने में अतिरिक्त परेशानी उठानी पड़ सकती है।
छोटी तकनीकी कमियां भी बन रही हैं बाधा
सतर्क नागरिक संगठन की संस्थापक अंजलि भारद्वाज ने कहा कि निर्धारित प्रारूप का पालन नहीं करने या पृष्ठ संख्या जैसी छोटी कमियों के कारण भी अपीलें वापस की जा रही हैं। उनके अनुसार, सूचना आयोगों का मुख्य उद्देश्य नागरिकों को सूचना हासिल करने में मदद करना होना चाहिए, न कि अनावश्यक प्रशासनिक अड़चनें पैदा करना। आरटीआई कानून के तहत नागरिक सरकारी विभागों और सार्वजनिक प्राधिकरणों से सूचना मांग सकते हैं। यदि निर्धारित प्रक्रिया के बावजूद सूचना नहीं मिलती या आवेदन से जुड़ी शिकायत रहती है, तो संबंधित परिस्थितियों में प्रथम अपील और उसके बाद सूचना आयोग में दूसरी अपील या शिकायत का रास्ता उपलब्ध होता है। ऐसे में प्रक्रिया संबंधी कमियों के कारण मामलों का निस्तारण प्रभावित होना आवेदकों के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है।
गरीब और वंचित आवेदकों पर पड़ता है ज्यादा असर
एसएनएस से जुड़ी अमृता जोहरी ने कहा कि गरीब और वंचित समुदायों के अनेक लोग कानूनी सहायता के बिना अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते हैं। ऐसे आवेदकों के लिए तकनीकी नियमों और दस्तावेजों की जटिलताएं बड़ी बाधा बन सकती हैं। उन्होंने जोर दिया कि यदि आवेदन में जरूरी बुनियादी जानकारी उपलब्ध है, तो अपीलों की सुनवाई की जानी चाहिए। रिपोर्ट में उठाया गया यह मुद्दा बताता है कि सूचना का अधिकार केवल कानून में प्रावधान होने तक सीमित नहीं है। इसका लाभ नागरिकों तक पहुंचाने के लिए सरल प्रक्रिया, समयबद्ध सुनवाई और प्रभावी शिकायत निवारण भी जरूरी हैं।
केंद्रीय सूचना आयोग में भी बढ़ा लंबित मामलों का बोझ
पारदर्शिता कार्यकर्ता और सेवानिवृत्त कमोडोर लोकेश बत्रा के अनुसार, केंद्रीय सूचना आयोग में एक जनवरी से 12 अक्टूबर 2026 के बीच लंबित मामलों की संख्या में 9,378 की वृद्धि हुई। यह आंकड़ा आयोग में लंबित मामलों के दबाव को लेकर चिंता बढ़ाता है। हालांकि, लंबित मामलों की संख्या में बढ़ोतरी के पीछे नए मामलों की आमद, निपटारे की गति और अन्य प्रशासनिक कारणों की भूमिका को समझने के लिए विस्तृत आंकड़ों की जरूरत होगी। रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े इस बात की ओर संकेत करते हैं कि मामलों का समय पर निपटारा सुनिश्चित करना सूचना आयोगों के सामने बड़ी चुनौती है।
त्रिपुरा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सबसे लंबा इंतजार
रिपोर्ट के अनुसार, 14 सूचना आयोगों में लंबित मामलों के निपटारे में एक साल या उससे अधिक समय लग सकता है। अनुमानित प्रतीक्षा अवधि के मामले में त्रिपुरा सबसे आगे है, जहां इंतजार 19 साल आठ महीने बताया गया है। मध्य प्रदेश में यह अवधि 19 साल दो महीने और छत्तीसगढ़ में 18 साल आंकी गई है। इतनी लंबी अनुमानित प्रतीक्षा अवधि सूचना के अधिकार की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। यदि किसी नागरिक को मांगी गई सूचना से संबंधित विवाद के समाधान के लिए वर्षों इंतजार करना पड़े, तो सूचना की उपयोगिता भी प्रभावित हो सकती है।
पारदर्शिता व्यवस्था में सुधार की जरूरत
आरटीआई कानून का उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता बढ़ाना और नागरिकों को जवाबदेही सुनिश्चित करने का अधिकार देना है। एसएनएस की रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि लंबित मामलों को कम करने, तकनीकी आधार पर अपीलें लौटाने की प्रक्रिया की समीक्षा करने और सूचना आयोगों की कार्यक्षमता बढ़ाने की जरूरत है। समयबद्ध सुनवाई और आवेदकों के लिए सरल प्रक्रिया ही इस कानून के लाभ को आम नागरिकों तक पहुंचाने में मदद कर सकती है।


