Top
Begin typing your search above and press return to search.

पाठ्यपुस्तकों से मुगलों को हटाना बेतुका, इतिहास निरंतर चलता रहना चाहिए : रोमिला थापर

रोमिला थापर ने विशेष रूप से मुगलों और अन्य मध्यकालीन इतिहास से जुड़े अध्यायों को हटाने की प्रवृत्ति पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, “जो कुछ हो रहा है—जैसे इतिहास के कुछ हिस्सों को पाठ्यक्रम से हटा देना या यह कहना कि हमें उन्हें पढ़ने की ज़रूरत नहीं है, वह पूरी तरह बेतुका है।”

पाठ्यपुस्तकों से मुगलों को हटाना बेतुका, इतिहास निरंतर चलता रहना चाहिए : रोमिला थापर
X
कोझिकोड : प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर ने इतिहास पढ़ाने के मौजूदा तरीकों और पाठ्यपुस्तकों में किए जा रहे बदलावों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। केरल साहित्य महोत्सव (केरल लिटरेचर फेस्टिवल) के नौवें संस्करण को ऑनलाइन संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि इतिहास एक सतत और जुड़ी हुई प्रक्रिया है, जिसे टुकड़ों में बांटकर या चुनिंदा हिस्सों को हटाकर नहीं पढ़ाया जा सकता। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है, जब राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा कक्षा सात की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में बड़े बदलाव किए जाने की चर्चा तेज है।

मुगल इतिहास हटाने को बताया ‘बेतुका’

रोमिला थापर ने विशेष रूप से मुगलों और अन्य मध्यकालीन इतिहास से जुड़े अध्यायों को हटाने की प्रवृत्ति पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, “जो कुछ हो रहा है, जैसे इतिहास के कुछ हिस्सों को पाठ्यक्रम से हटा देना या यह कहना कि हमें उन्हें पढ़ने की ज़रूरत नहीं है, वह पूरी तरह बेतुका है।” उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इतिहास को इस तरह खंडित करने से उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता। उनके अनुसार, किसी एक राजवंश या कालखंड को हटाकर इतिहास को समझना न तो अकादमिक रूप से सही है और न ही छात्रों के लिए उपयोगी।

इतिहास एक निरंतर प्रक्रिया

अपने संबोधन में थापर ने इस बात पर जोर दिया कि इतिहास किसी एक घटना, साम्राज्य या शासक तक सीमित नहीं होता। उन्होंने कहा, “इतिहास एक सतत प्रक्रिया है। यह निरंतरता इस आधार पर नहीं टूट सकती कि हम तय कर लें कि किसी एक राजवंश को पढ़ाएंगे और दूसरे को हटा देंगे।” उनके मुताबिक, अलग-अलग कालखंड एक-दूसरे से जुड़े होते हैं और किसी एक हिस्से को हटाने से पूरे ऐतिहासिक क्रम की समझ प्रभावित होती है। यही कारण है कि इतिहास को व्यापक परिप्रेक्ष्य में पढ़ाया जाना चाहिए।

एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक में बदलाव

एनसीईआरटी ने कथित तौर पर शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए कक्षा सात की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में संशोधन किया है। इन बदलावों के तहत दिल्ली सल्तनत और मुगल काल से जुड़े अध्यायों को हटा दिया गया है। नई पाठ्यपुस्तक में अब प्राचीन भारतीय इतिहास पर अधिक जोर दिया गया है। इसमें मौर्य, शुंग और सातवाहन जैसे राजवंशों के साथ-साथ विभिन्न धार्मिक परंपराओं, सांस्कृतिक धाराओं और पवित्र स्थलों को प्रमुखता से शामिल किया गया है।

अकादमिक हलकों में बहस तेज

पाठ्यक्रम में किए गए इन बदलावों को लेकर अकादमिक जगत में बहस तेज हो गई है। कई इतिहासकार और शिक्षाविद इसे इतिहास के चयनात्मक प्रस्तुतिकरण के रूप में देख रहे हैं। उनका तर्क है कि किसी एक कालखंड पर जोर देना और दूसरे को हटाना, छात्रों को संतुलित ऐतिहासिक दृष्टि विकसित करने से रोक सकता है। रोमिला थापर का मानना है कि इतिहास लेखन और शिक्षण का उद्देश्य केवल गौरवगाथा प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि समाज के विकास, संघर्षों और परिवर्तनों को समझाना होना चाहिए।

इतिहास और समकालीन राजनीति

अपने वक्तव्य में थापर ने अप्रत्यक्ष रूप से इतिहास और समकालीन राजनीति के रिश्ते की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा कि इतिहास को वर्तमान राजनीतिक जरूरतों के अनुसार ढालना खतरनाक हो सकता है। इससे न केवल अकादमिक स्वतंत्रता प्रभावित होती है, बल्कि समाज में विभाजन की प्रवृत्तियां भी बढ़ सकती हैं। उनके अनुसार, इतिहास का काम सवाल उठाना और जटिलताओं को सामने लाना है, न कि उन्हें सरल या सुविधाजनक बनाना।

छात्रों के लिए व्यापक दृष्टि जरूरी

थापर ने कहा कि स्कूली शिक्षा के स्तर पर छात्रों को इतिहास की व्यापक और समग्र समझ देना विशेष रूप से जरूरी है। इससे वे यह समझ पाते हैं कि समाज कैसे विकसित हुआ, विभिन्न संस्कृतियां कैसे एक-दूसरे से प्रभावित हुईं और सत्ता व सामाजिक संरचनाओं में समय के साथ कैसे बदलाव आए।उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इतिहास को चुनिंदा तथ्यों तक सीमित कर दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियों की ऐतिहासिक चेतना कमजोर हो सकती है।

पहले भी उठा चुकी हैं सवाल

यह पहली बार नहीं है जब रोमिला थापर ने पाठ्यक्रम में किए जा रहे बदलावों पर सवाल उठाए हों। इससे पहले भी वह इतिहास की आलोचनात्मक और समावेशी पढ़ाई की वकालत करती रही हैं। उनका मानना है कि किसी भी सभ्यता को समझने के लिए उसके सभी कालखंडों और प्रभावों का अध्ययन आवश्यक है।

बहस जारी रहने के संकेत

एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम में बदलाव और रोमिला थापर जैसे वरिष्ठ इतिहासकारों की प्रतिक्रियाएं यह संकेत देती हैं कि इतिहास शिक्षा को लेकर बहस आने वाले समय में और तेज हो सकती है। सवाल यह है कि क्या पाठ्यक्रम में संतुलन और अकादमिक दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी जाएगी या इतिहास को वैचारिक चश्मे से देखने की प्रवृत्ति मजबूत होगी। फिलहाल, रोमिला थापर की यह टिप्पणी इतिहास शिक्षण के भविष्य पर एक अहम विमर्श को जन्म देती है।


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it