UGC Bill -2026 पर सियासी घमासान: सवर्ण असंतोष से घिरी भाजपा, कुमार विश्वास व राकेश टिकैत सहित कई ने पुनर्विचार की मांग
स्थिति यह है कि पंचायत चुनाव से पहले भाजपा में इस मुद्दे पर दो स्पष्ट ध्रुव उभर आए हैं, जिससे पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ गई है। एक ओर पार्टी के कई सवर्ण नेता विनियम को सवर्ण विरोधी करार दे रहे हैं, तो दूसरी ओर ओबीसी और सामाजिक न्याय से जुड़े नेता इसका खुलकर समर्थन कर रहे हैं।

लखनऊ। उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से लागू किए गए यूजीसी विनियम-2026 अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए एक गंभीर राजनीतिक चुनौती बनते जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में सवर्ण समाज के बढ़ते आक्रोश ने पार्टी के भीतर ही मतभेद उजागर कर दिए हैं। स्थिति यह है कि पंचायत चुनाव से पहले भाजपा में इस मुद्दे पर दो स्पष्ट ध्रुव उभर आए हैं, जिससे पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ गई है। एक ओर पार्टी के कई सवर्ण नेता विनियम को सवर्ण विरोधी करार दे रहे हैं, तो दूसरी ओर ओबीसी और सामाजिक न्याय से जुड़े नेता इसका खुलकर समर्थन कर रहे हैं। विपक्षी दल भी इस बहस में कूद पड़े हैं और अपने-अपने राजनीतिक हितों के मुताबिक मोर्चाबंदी शुरू हो गई है।
क्या है यूजीसी विनियम-2026?
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने 13 जनवरी 2026 को एक अधिसूचना जारी कर उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए नए विनियम लागू किए। इनका उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को रोकना और शिकायतों के निस्तारण के लिए जवाबदेही तय करना है। लेकिन जैसे-जैसे इन विनियमों पर सार्वजनिक चर्चा आगे बढ़ी, अगड़ी जातियों में असंतोष बढ़ता गया, जो अब खुले विरोध में बदल चुका है।
सवर्ण नेताओं का तीखा विरोध
भाजपा के गोंडा विधायक प्रतीक भूषण सिंह, जो पूर्व सांसद ब्रजभूषण सिंह के पुत्र हैं, ने इंटरनेट मीडिया पर पोस्ट कर यूजीसी विनियम को सवर्ण विरोधी करार दिया। उन्होंने इसे “इतिहास के दोहरे मापदंड” बताते हुए कहा कि एक वर्ग को लगातार ऐतिहासिक अपराधी के रूप में पेश किया जा रहा है।
गोरखपुर से भाजपा एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह ने 22 जनवरी को किए गए अपने पोस्ट में इस फैसले की तुलना रोलेट एक्ट से करते हुए इसे “हिटलरशाही से भी बदतर” बताया। उनका कहना था कि यूजीसी सामान्य वर्ग के छात्रों को पहले से ही शोषक मानकर चल रही है, यानी बिना पक्ष सुने ही उन्हें अपराधी ठहराया जा रहा है। विरोध केवल बयानों तक सीमित नहीं रहा। लखनऊ से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक भाजपा संगठन से जुड़े दो दर्जन से अधिक पदाधिकारियों ने त्यागपत्र दे दिए हैं, जिससे पार्टी संगठनात्मक स्तर पर भी दबाव में आ गई है।
विनय कटियार की चेतावनी
भाजपा के पूर्व सांसद विनय कटियार ने बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के साथ हुए व्यवहार को अनुचित बताते हुए पार्टी को परिस्थिति की गंभीरता समझने की नसीहत दी है। उन्होंने संकेतों में कहा कि ऐसे निर्णयों से समाज में टकराव बढ़ सकता है और इसका राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
साहित्यिक और सामाजिक जगत में भी हलचल
यूजीसी विनियम-2026 को लेकर प्रतिक्रिया केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। प्रसिद्ध कवि डॉ. कुमार विश्वास ने दिवंगत कवि रमेश रंजन की एक कविता के बहाने इस विनियम का विरोध करते हुए इसे वापस लेने की मांग की। कवयित्री अनामिका जैन अंबर ने भी अपनी कविता के माध्यम से विनियमों के खिलाफ तीखा स्वर अपनाया। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने इन विनियमों को अव्यवहारिक और सामाजिक टकराव बढ़ाने वाला बताया। वहीं मेरठ के सरधना क्षेत्र स्थित ठाकुर चौबीसी गांव के लोगों ने सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करने की घोषणा कर दी है।
समर्थन में भी मजबूत आवाजें
जहां एक ओर सवर्ण समाज का बड़ा हिस्सा विनियम के खिलाफ खड़ा है, वहीं दूसरी ओर ओबीसी और दलित संगठनों ने इसे सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम बताया है। योगी सरकार में मंत्री और भाजपा ओबीसी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र कश्यप ने इंटरनेट मीडिया पर पोस्ट कर विनियम का समर्थन किया। उन्होंने लिखा कि उच्च शिक्षा में भेदभाव रोकने के लिए यह जरूरी सुधार है और इसे जातिवाद से जोड़कर देखना गलत है। आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के प्रमुख संयोजक अवधेश वर्मा ने चेतावनी दी कि यदि भविष्य में आरक्षण या समान अवसर से जुड़े किसी भी प्रावधान को वापस लेने की कोशिश हुई, तो राज्यव्यापी आंदोलन छेड़ा जाएगा।
विपक्ष का रुख
यूजीसी विनियम-2026 को लेकर विपक्षी दलों ने भी समर्थन का रुख अपनाया है। समाजवादी पार्टी, आजाद समाज पार्टी और पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य समेत कई नेताओं ने इसे भेदभाव खत्म करने की दिशा में जरूरी कदम बताया है। विपक्ष इसे भाजपा के सवर्ण बनाम पिछड़ा वर्ग समीकरण में दरार के रूप में देख रहा है।
भाजपा की मुश्किल बढ़ी
विशेषज्ञों का मानना है कि पंचायत चुनाव से पहले यह विवाद भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो सकता है। उत्तर प्रदेश में सवर्ण और ओबीसी दोनों ही भाजपा के अहम वोट बैंक रहे हैं। ऐसे में किसी एक वर्ग का खुला असंतोष पार्टी को नुकसान पहुंचा सकता है। भाजपा हाईकमान के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह सामाजिक न्याय और सवर्ण असंतोष के बीच संतुलन कैसे साधे। यदि जल्द कोई स्पष्ट और संतुलित रुख नहीं अपनाया गया, तो यह विवाद आने वाले चुनावों में पार्टी के लिए भारी पड़ सकता है।
तूल पकड़ सकता है मामला
यूजीसी विनियम-2026 ने उच्च शिक्षा में समानता और सामाजिक न्याय की बहस को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। लेकिन इसके साथ ही इसने राजनीति में नई दरारें और समीकरण भी पैदा कर दिए हैं। भाजपा के भीतर उभरे दो ध्रुव और समाज के अलग-अलग वर्गों की तीखी प्रतिक्रियाएं संकेत देती हैं कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि सरकार और पार्टी नेतृत्व इस असंतोष को कैसे संभालते हैं और क्या विनियमों में कोई संशोधन या पुनर्विचार का रास्ता निकलता है या नहीं।


