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एआइ को सुलभ और जवाबदेह बनाना जरूरी, वरना बढ़ेगी वैश्विक असमानता: अमिताभ कांत
अमिताभ कांत ने दावा किया कि ओपनएआइ के चैटजीपीटी को भारत अमेरिका की तुलना में लगभग 33 प्रतिशत अधिक डेटा उपलब्ध करा रहा है। उनका कहना था कि यदि भारत और अन्य विकासशील देश एआइ मॉडल्स के लिए महत्वपूर्ण डेटा स्रोत हैं, तो उन्हें इस तकनीक से उत्पन्न मूल्य और अवसरों का लाभ भी मिलना चाहिए।

नई दिल्ली: जी-20 शेरपा और पूर्व नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) को 21वीं सदी की सबसे परिवर्तनकारी तकनीक बताते हुए कहा है कि इसका प्रभाव जीवनशैली से लेकर शासन और अर्थव्यवस्था तक हर क्षेत्र में दिखाई देगा। हालांकि उन्होंने चेतावनी दी कि यदि एआइ को सुलभ, किफायती, जवाबदेह और बहुभाषी नहीं बनाया गया, तो यह वैश्विक असमानताओं को और गहरा कर सकता है। एआइ इंपैक्ट समिट में बोलते हुए कांत ने कहा कि भारत और ग्लोबल साउथ आज बड़े भाषा मॉडलों (एलएलएम) के लिए डेटा का प्रमुख स्रोत बन चुके हैं। ऐसे में जरूरी है कि एआइ से होने वाले लाभ का उचित हिस्सा इन देशों और उनके नागरिकों तक पहुंचे।
भारत से मिल रहा अधिक डेटा, लाभ भी मिलना चाहिए
अमिताभ कांत ने दावा किया कि ओपनएआइ के चैटजीपीटी को भारत अमेरिका की तुलना में लगभग 33 प्रतिशत अधिक डेटा उपलब्ध करा रहा है। उनका कहना था कि यदि भारत और अन्य विकासशील देश एआइ मॉडल्स के लिए महत्वपूर्ण डेटा स्रोत हैं, तो उन्हें इस तकनीक से उत्पन्न मूल्य और अवसरों का लाभ भी मिलना चाहिए। कांत ने संकेत दिया कि एआइ इकोसिस्टम में डेटा योगदान और आर्थिक लाभ के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। अन्यथा विकासशील देश केवल डेटा प्रदाता बनकर रह जाएंगे, जबकि वास्तविक आर्थिक लाभ विकसित देशों और बड़ी टेक कंपनियों को मिलता रहेगा।
“तकनीक तभी सार्थक जब अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे”
कांत ने जोर देकर कहा कि तकनीक का मूल्य तभी है जब वह समाज के सबसे कमजोर वर्गों तक पहुंचे। उन्होंने कहा कि एआइ को कम आय वाले लोगों, कम इंटरनेट स्पीड वाले क्षेत्रों, गैर-अंग्रेजी भाषी नागरिकों, महिलाओं, किसानों, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) और फ्रंटलाइन वर्कर्स के लिए उपयोगी बनाना होगा। उनका कहना था कि यदि एआइ केवल उच्च आय वर्ग या बड़ी कंपनियों तक सीमित रह गया, तो यह “उद्देश्यपूर्ण तकनीक” नहीं कहलाएगा। कांत ने कहा कि बहुभाषी एआइ समाधान विशेष रूप से भारत जैसे विविध भाषाई देश के लिए अनिवार्य हैं, जहां बड़ी आबादी अंग्रेजी से इतर भाषाओं में संवाद करती है।
डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल का हवाला
अमिताभ कांत ने भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआइ) मॉडल को एआइ विकास के लिए एक उदाहरण बताया। उन्होंने आधार, यूपीआई और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का जिक्र करते हुए कहा कि समावेशी और बड़े पैमाने पर उपयोग को ध्यान में रखकर बनाई गई तकनीक समाज में व्यापक बदलाव ला सकती है। उनके अनुसार, एआइ में भी “डिजिटल पब्लिक आइडेंटिटी” जैसी आधारभूत परत विकसित की जानी चाहिए, जिसके ऊपर निजी क्षेत्र नवाचार और प्रतिस्पर्धा कर सके। इससे एक संतुलित इकोसिस्टम बनेगा, जहां सार्वजनिक ढांचा और निजी नवाचार साथ-साथ काम करेंगे।
स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि में एआइ की भूमिका
कांत ने कहा कि एआइ का उपयोग केवल व्यावसायिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के लिए होना चाहिए। उन्होंने स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि जैसे जमीनी क्षेत्रों में एआइ के व्यापक उपयोग की आवश्यकता बताई। उनका मानना है कि एआइ आधारित समाधान ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में निदान को बेहतर बना सकते हैं, शिक्षा में व्यक्तिगत सीखने के अवसर प्रदान कर सकते हैं और कृषि में उत्पादकता बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि एआइ को सही दिशा में लागू किया जाए, तो यह विकासशील देशों के लिए “लीपफ्रॉग” अवसर बन सकता है यानी पारंपरिक विकास चरणों को पार करते हुए सीधे उन्नत तकनीकी समाधान अपनाने का मौका।
बेरोजगारी नहीं, नई नौकरियों का सृजन
एआइ के कारण बड़े पैमाने पर रोजगार संकट की आशंकाओं पर कांत ने संतुलित दृष्टिकोण रखा। उन्होंने कहा कि एआइ से लोगों के काम करने के तरीके में बदलाव जरूर आएगा, लेकिन इससे व्यापक बेरोजगारी नहीं होगी। उनके मुताबिक, एआइ नई तरह की नौकरियां और कौशल आधारित भूमिकाएं पैदा करेगा। विशेष रूप से डेटा साइंस, मशीन लर्निंग, एआइ मॉडल ट्रेनिंग और एथिकल एआइ जैसे क्षेत्रों में मांग तेजी से बढ़ेगी। कांत ने जोर दिया कि भारत को अपने शिक्षा और प्रशिक्षण ढांचे में बदलाव कर युवाओं को इन उभरते क्षेत्रों के लिए तैयार करना होगा।
भारत की युवा शक्ति और डेटा क्षमता
अमिताभ कांत ने भारत की युवा आबादी और तकनीकी प्रतिभा को वैश्विक एआइ प्रतिस्पर्धा में देश की सबसे बड़ी ताकत बताया। उन्होंने कहा कि भारत के पास विशाल डेटा संसाधन, कुशल इंजीनियर और तेजी से विकसित हो रहा डिजिटल इकोसिस्टम है। उनके अनुसार, यदि भारत सही नीतिगत ढांचा, समावेशी दृष्टिकोण और वैश्विक सहयोग सुनिश्चित करे, तो वह एआइ के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा सकता है।
समावेशी एआइ की दिशा में कदम जरूरी
एआइ इंपैक्ट समिट में अमिताभ कांत का संदेश स्पष्ट था- एआइ केवल तकनीकी क्रांति नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक बदलाव का साधन है। लेकिन यह बदलाव सकारात्मक तभी होगा जब एआइ सुलभ, किफायती, जवाबदेह और बहुभाषी हो। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि एआइ का लाभ कुछ देशों या कंपनियों तक सीमित रहा, तो वैश्विक असमानताएं बढ़ सकती हैं। वहीं, यदि इसे समावेशी मॉडल पर विकसित किया जाए, तो यह करोड़ों लोगों के जीवन में ठोस परिवर्तन ला सकता है। भारत के लिए यह अवसर है कि वह अपने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर अनुभव और युवा शक्ति के बल पर एआइ के भविष्य को न केवल अपने लिए, बल्कि पूरे ग्लोबल साउथ के लिए अधिक न्यायसंगत और समावेशी बनाए।
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