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हाईकोर्ट जजों के तबादलों पर जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की तीखी टिप्पणी: बोले-सरकार के खिलाफ फैसलों पर ‘सजा’ बना ट्रांसफर, तो न्यायपालिका की साख को खतरा
जस्टिस भुइयां ने अपने संबोधन में कहा कि तबादलों का उद्देश्य प्रशासनिक सुविधा या न्यायिक कार्यकुशलता होना चाहिए, न कि दबाव या दंड का औजार। उन्होंने पूछा, “अगर किसी जज को इसलिए स्थानांतरित किया जाता है क्योंकि उसने सरकार के खिलाफ कुछ आदेश दिए, तो इससे क्या संदेश जाता है?

पुणे। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने हाईकोर्ट जजों के तबादलों में कार्यपालिका (सरकार) के कथित दखल पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यदि जजों को सरकार के खिलाफ दिए गए फैसलों के कारण इधर-उधर किया जाता है, तो यह न केवल न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला होगा, बल्कि उसकी साख और विश्वसनीयता को भी गहरी चोट पहुंचेगी। पुणे के आइएलएस लॉ कॉलेज में एक व्याख्यान के दौरान जस्टिस भुइयां ने यह सवाल उठाया कि किसी न्यायाधीश को केवल इसलिए दूसरे हाईकोर्ट में क्यों भेजा जाना चाहिए, क्योंकि उसने सरकार के लिए “असुविधाजनक” आदेश पारित किए हैं। उनके अनुसार, इस तरह की प्रथाएं न्यायिक स्वायत्तता के मूल सिद्धांतों के विपरीत हैं।
“असुविधाजनक फैसलों” पर तबादले क्यों?
जस्टिस भुइयां ने अपने संबोधन में कहा कि तबादलों का उद्देश्य प्रशासनिक सुविधा या न्यायिक कार्यकुशलता होना चाहिए, न कि दबाव या दंड का औजार। उन्होंने पूछा, “अगर किसी जज को इसलिए स्थानांतरित किया जाता है क्योंकि उसने सरकार के खिलाफ कुछ आदेश दिए, तो इससे क्या संदेश जाता है? यह संदेश जाता है कि स्वतंत्र निर्णय की कीमत चुकानी पड़ेगी।” उनका कहना था कि ऐसी धारणा बनना ही न्यायपालिका के लिए खतरनाक है, क्योंकि इससे जजों पर अप्रत्यक्ष दबाव पैदा होता है और वे स्वतंत्र होकर फैसले देने से हिचक सकते हैं।
बिना नाम लिए किस मामले की ओर इशारा?
हालांकि जस्टिस भुइयां ने किसी जज या मामले का नाम नहीं लिया, लेकिन उनकी टिप्पणी को व्यापक रूप से अक्टूबर 2025 के उस घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है, जिसमें जस्टिस अतुल श्रीधरन का तबादला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट किया गया था। उस समय यह चर्चा तेज हुई थी कि जस्टिस श्रीधरन ने कुछ मामलों में सरकार के खिलाफ सख्त टिप्पणियां की थीं, जिसके बाद उनका स्थानांतरण हुआ। कानूनी हलकों में इस तबादले को लेकर पहले भी सवाल उठे थे और अब जस्टिस भुइयां की टिप्पणी ने उस बहस को एक बार फिर हवा दे दी है।
तबादलों में कार्यपालिका की भूमिका पर सवाल
जस्टिस भुइयां ने स्पष्ट रूप से कहा कि जजों की नियुक्ति और तबादलों में कार्यपालिका की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा, “तबादलों का इस्तेमाल जजों को ‘सजा’ देने के लिए नहीं किया जा सकता। यह पूरी प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष होनी चाहिए।” उन्होंने हाल के एक मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि जब कॉलेजियम किसी जज के तबादले के प्रस्ताव में केंद्र सरकार के अनुरोध को दर्ज करता है, तो यह दर्शाता है कि एक स्वतंत्र संवैधानिक प्रक्रिया में सरकार का दखल हो रहा है। उनके मुताबिक, इससे उस व्यवस्था की मूल भावना कमजोर होती है, जिसे राजनीति और बाहरी दबावों से दूर रखने के लिए बनाया गया था।
कॉलेजियम प्रणाली की भावना पर चोट
जस्टिस भुइयां ने कहा कि कॉलेजियम प्रणाली की स्थापना का उद्देश्य ही यह था कि न्यायपालिका को नियुक्तियों और तबादलों के मामलों में कार्यपालिका के प्रभाव से मुक्त रखा जाए। यदि सरकार की इच्छाएं या आपत्तियां प्रस्तावों का हिस्सा बनने लगें, तो यह व्यवस्था धीरे-धीरे खोखली हो सकती है। उन्होंने चेताया कि ऐसी स्थिति में न्यायपालिका की स्वतंत्रता केवल सैद्धांतिक रह जाएगी और व्यवहार में कमजोर पड़ जाएगी।
जजों से निर्भीक होकर काम करने की अपील
अपने व्याख्यान में जस्टिस भुइयां ने न्यायाधीशों से बिना डर और बिना किसी पक्षपात के काम करने की अपील की। उन्होंने कहा कि किसी भी न्यायाधीश की पहली और सबसे बड़ी जिम्मेदारी संविधान के प्रति होती है, न कि किसी सरकार, संस्था या दबाव समूह के प्रति। उनके शब्दों में, “न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की बुनियादी विशेषता है। इसकी रक्षा करना सिर्फ एक अधिकार नहीं, बल्कि हर जज का कर्तव्य है।”
क्यों अहम है यह टिप्पणी?
जस्टिस भुइयां की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब देश में न्यायपालिका और कार्यपालिका के संबंधों को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। कई वरिष्ठ वकील और पूर्व न्यायाधीश पहले भी यह चिंता जता चुके हैं कि यदि तबादलों का इस्तेमाल दबाव के साधन के रूप में होने लगे, तो इससे न्यायिक निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि जस्टिस भुइयां का बयान न केवल एक व्यक्तिगत राय है, बल्कि यह संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की दिशा में एक मजबूत संदेश भी है।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता जरूरी
हाईकोर्ट जजों के तबादलों पर जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की कड़ी टिप्पणी ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़ी बहस को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। उनका स्पष्ट संदेश है कि सरकार के खिलाफ फैसले देने वाले जजों को दंडित करने का कोई भी प्रयास न्याय व्यवस्था को कमजोर करेगा। अब देखना यह होगा कि इस बयान के बाद जजों के तबादलों की प्रक्रिया और उस पर उठते सवालों को लेकर नीति-निर्माता और संस्थाएं किस तरह प्रतिक्रिया देती हैं।
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