भारतीय संसद को मिली पहली एलजीबीटीक्यू+ आवाज
पश्चिम बंगाल की मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि वह "समानता, भाईचारा और भेदभाव रहित समाज" के लिए काम करेंगी

पश्चिम बंगाल की मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि वह "समानता, भाईचारा और भेदभाव रहित समाज" के लिए काम करेंगी.
मेनका गुरुस्वामी के राज्यसभा सदस्य चुने जाने से भारतीय राजनीति में एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के प्रतिनिधित्व को एक नई दिशा मिली है. अपनी खुली क्वीयर पहचान के लिए जानी जाने वाली गुरुस्वामी का संसद के उच्च सदन तक पहुंचना देश की लोकतांत्रिक राजनीति में बढ़ती समानता और स्वीकार्यता को दर्शाता है.
गुरुस्वामी एक संवैधानिक वकील हैं, जिन्होंने अपनी शिक्षा ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, हार्वर्ड लॉ स्कूल और नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी जैसे प्रसिद्ध संस्थानों से प्राप्त की हैं. वह काफी समय से संविधान, लोकतांत्रिक सिद्धांतों और नागरिक अधिकारों का समर्थन करने वाली जानी-मानी आवाज रही हैं.
51 साल की गुरुस्वामी को तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने चुनावी मैदान में उतारा था. टीएमसी हमेशा से एक ऐसी पार्टी रही है जिसने राजनीति में महिला प्रतिनिधित्व पर जोर दिया है. टीएमसी के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने डीडब्ल्यू को बताया कि "गुरुस्वामी के चुने जाने के बाद राज्यसभा में पार्टी के कुल 13 में से पांच सदस्य अब महिलाएं हैं."
उन्होंने यह भी बताया कि गुरुस्वामी का चुनाव टीएमसी की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है. इस रणनीति के अनुसार वह पढ़े-लिखे और संविधान को समझने वाली आवाजों को उच्च सदन में भेजना चाहते हैं, ताकी वे देश भर में विपक्ष की दलीलें स्पष्ट रूप से रख सकें.
मालविका राजकोटिया एक भारतीय लेखक और फैमिली लॉ की विशेषज्ञ हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, "गुरुस्वामी के चुने जाने से दो बातें साफ होती हैं. पहला है एलजीबीटीक्यू दृष्टिकोण और दूसरा लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है टीएमसी का प्रतिनिधित्व करने वाली नारी शक्ति. वह निडर, बुद्धिमान और प्रेरणादायक हैं.”
साथ ही वह यह भी कहती हैं कि "यह नारी शक्ति उस जहरीली और अकड़ दिखाने वाली मर्दाना प्रवृत्ति का भी विरोध करती हैं, जो आज की राजनीति में आम बात है."
गुरुस्वामी ने कहा कि संविधान के 'समानता, भाईचारा और भेदभाव रहित व्यवहार' जैसे मूल्य उनके काम का आधार रहे हैं. उन्होंने कहा कि वह राज्यसभा में भी पश्चिम बंगाल के लोगों का प्रतिनिधित्व करते हुए इन्हीं आदर्शों को आगे बढ़ाना चाहती हैं.
राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार
भारत की विधानसभाओं में इससे पहले भी खुले तौर पर क्वीयर राजनेता रह चुके हैं. सार्वजनिक पद के लिए चुनी जाने वाली शबनम मौसी खुले तौर पहली ऐसी समलैंगिक व्यक्ति बनी, जब उन्होंने 1998 में मध्य प्रदेश के सोहागपुर से राज्य विधानसभा में एक सीट जीती.
इसके बाद छत्तीसगढ़ और दिल्ली में राज्य और स्थानीय स्तर पर भी ऐसी पहल देखी गई. इन्हें बड़ी उपलब्धि भी माना गया, लेकिन सामाजिक सोच में रुकावटों की वजह से यह बदलाव अब भी क्षेत्रीय स्तर तक ही सीमित है.
लैंगिक पहचान को सीमित करता भाषा का 'लिंग'
आज तक कोई भी समलैंगिक व्यक्ति किसी भी स्तर पर भारतीय संसद का हिस्सा नहीं बन पाया है. पर कुछ लोग हैं, जो लंबे राजनीतिक करियर बनाने में सफल हुए हैं. गुरुस्वामी के चुनाव ने इस बाधा को अब तोड़ तो दिया है, लेकिन वह राजनीति के इस संघर्ष से भलीभांति वाकिफ हैं.
गुरुस्वामी और उनकी साथी अरुंधती काटजू उस अहम मुकदमे का हिस्सा थे, जिसने सुप्रीम कोर्ट को 2018 में 158 साल पुराना कानून रद्द करने को राजी किया. यह कानून सहमति से बने समलैंगिक रिश्तों को अपराध बताता था. इस कानून का रद्द होना एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के लिए ऐतिहासिक जीत थी. एलजीबीटीक्यू अधिकार कार्यकर्ता विश्वा स्कूलवाला के मुताबिक गुरुस्वामी का चुना जाना एक अच्छा संकेत है.
गुरुस्वामी की चुनावी जीत क्या दर्शाती है?
स्कूलवाला ने डीडब्ल्यू को बताया कि "दशकों से एलजीबीटीक्यू समुदाय को लेकर अधिकार और गरिमा पर बातें होती रही हैं, लेकिन वह उन मंचों पर कम ही दिखाई देते हैं जहां उनसे जुड़े असल फैसले लिए जाते हैं." स्कूलवाला ने यह भी बताया कि गुरुस्वामी के चुनाव से कई लोगों को बड़े सामाजिक सुधार की उम्मीदें हैं. इन सुधारों में शामिल है भेदभाव के खिलाफ बेहतर सुरक्षा, सुरक्षित और समावेशी संस्थान और एलजीबीटीक्यू परिवारों के लिए अधिक सम्मान.
एलजीबीटीक्यू कार्यकर्ता प्रीति शर्मा ने डीडब्ल्यू से कहा, "एक खुली क्वीयर पहचान वाली सांसद के संसद में होने से एलजीबीटीक्यू अधिकारों पर खुलकर चर्चा होना आसान हो जाएगा और इससे राजनीतिक नजरिये में बदलाव आ सकता है."
एलजीबीटीक्यू कार्यकर्ता शरीफ रंगनेकर ने गुरुस्वामी के चुनाव का स्वागत करते हुए कहा, "यह एक बहुत ही मत्वपूर्ण क्षण है. इससे समलैंगिकों को अधिक पहचान मिलेगी." उन्होंने आगाह करते हुए यह भी कहा कि यह मान लेना ठीक नहीं होगा कि वह अपने आप ही इस समुदाय की आवाज बन जाएंगी. क्योंकि इस समुदाय में अलग-अलग पहचान, क्षेत्र और सामाजिक स्थिति वाले लोग शामिल हैं.
उनका यह भी कहना है कि "टीएमसी द्वारा गुरुस्वामी का चुना जाना पार्टी के राजनीतिक हितों का हिस्सा है. यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वह समलैंगिक समुदाय का प्रतिनिधित्व कर पाएंगी?" रंगनेकर ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि कार्यकर्ता संसद में हो रहे उनकी भूमिका के विकास पर काफी बारीकी से नजर रखेंगे. वह देखना चाहेंगे कि यह सार्थक प्रतिनिधित्व में तब्दील होती है या नहीं.
एलजीबीटीक्यू अधिकारों की अधूरी लड़ाई
समलैंगिक विवाह और उसकी समानता का मुद्दा अब भी समाधान की प्रतीक्षा में है. साल 2023 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वसम्मति से समलैंगिक विवाह को वैध मानने से इनकार कर दिया और इससे जुड़ी जिम्मेदारियां संसद को सौंप दी.
राज्य चाहें तो दे सकते हैं समलैंगिक शादी की इजाजत
न्यायालय के इस निर्णय से एलजीबीटीक्यू+ समुदाय की बढ़ती मौजूदगी और देश की कानूनी व्यवस्था के बीच स्पष्ट दूरी नजर आती है. हालांकि अदालत ने समलैंगिक नागरिकों के अधिकारों और गरिमा को स्वीकार किया है, लेकिन विवाह का अधिकार उन्हें अब भी प्राप्त नहीं है. इसी वजह से कार्यकर्ताओं को राजनीतिक प्रक्रिया की तरफ रुख करना पड़ रहा है.
एलजीबीटीक्यू अधिकार कार्यकर्ता विश्वा स्कूलवाला और उनके साथी ने अपने विवाह को कानूनी मान्यता दिलाने के भरपूर प्रयास किए हैं. उन्हें आशा है कि यह वैधता जल्द ही मिलेगी. वह कहते हैं, "हमारी इच्छा है कि भविष्य की पीढ़ियां सिर्फ समाज में स्वीकार किए जाने तक ही सीमित न रहें, बल्कि देश को दिशा देने की भी सोच रखें."
दुनिया के कई हिस्सों की राजनीति में एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के प्रतिनिधित्व में प्रभावशाली वृद्धि हुई है. ब्रिटेन के 2024 के आम चुनाव में रिकॉर्ड 75 एलजीबीटीक्यू+ सांसदों को संसद के लिए चुना गया. साथ ही, पश्चिमी यूरोप के कई देशों में खुले तौर पर समलैंगिक राजनेता मौजूद हैं.
कबसे हैं दुनिया में क्वीयर लोग
वहीं, दक्षिणी एशिया में यह प्रतिनिधित्व काफी सीमित दायरे में मौजूद है. साल 2008 में नेपाल ने एशिया का पहला खुले तौर पर एलजीबीटीक्यू सांसद चुना. लेकिन पास के पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों में आज भी कोई गे या लेस्बियन पहचान वाला विधायक नहीं है.
होटल व्यवसायी और एलजीबीटीक्यू कार्यकर्ता केशव सूरी कहते हैं कि गुरुस्वामी उस समुदाय की उम्मीदों और डर दोनों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो कई वर्षों से पहचान और न्याय के इंतजार में है. सूरी ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, "उनके चुने जाने से उम्मीद जगी है कि अब प्रगति का अगला चरण न्यायालयों द्वारा स्थापित संवैधानिक आधारों पर आगे बढ़ेगा और उस पर आधारित विधायी सुधार होंगे."


