स्वदेशी इंडस्ट्री के जरिए फाइटर जेट जगुआर के इंजन की समस्या का समाधान तलाशने में जुटी भारतीय वायुसेना
जगुआर लड़ाकू विमान ऑपरेट करने वाला भारत इकलौता देश बचा है। डीप पेनिट्रेशन स्ट्राइक में माहिर फाइटर जेट जैगुआर आज स्पेयर पार्ट्स की कमी से जूझ रहा है। वायुसेना को केवल इजेक्शन सीट से जुड़ी समस्याओं का ही सामना नहीं करना पड़ रहा है, बल्कि इंजन संबंधी चुनौतियां भी उसके सामने हैं।

नई दिल्ली। जगुआर लड़ाकू विमान ऑपरेट करने वाला भारत इकलौता देश बचा है। डीप पेनिट्रेशन स्ट्राइक में माहिर फाइटर जेट जैगुआर आज स्पेयर पार्ट्स की कमी से जूझ रहा है। वायुसेना को केवल इजेक्शन सीट से जुड़ी समस्याओं का ही सामना नहीं करना पड़ रहा है, बल्कि इंजन संबंधी चुनौतियां भी उसके सामने हैं।
वायुसेना के मुताबिक इंजन इस्तेमाल होने वाले प्लैटिनम-रोडियम कैटालिटिक इग्नाइटर अपने निर्धारित समय से पहले ही खराब हो रहे हैं। इसकी वजह से विमानों की सर्विसेबिलिटी प्रभावित हो रही है। इस समस्या के समाधान के लिए भारतीय वायुसेना अब देश की कंपनियों से ऐसे इग्नाइटरों के स्वदेशी विकास का अनुरोध कर रही है।
दरअसल, जगुआर लड़ाकू विमान के इंजन के मॉड्यूल-12 आफ्टरबर्नर असेंबली में लगे प्लैटिनम-रोडियम कैटालिटिक इग्नाइटरों के बार-बार फेल होने के चलते एयरक्राफ्ट की उपलब्धता और क्षमता प्रभावित हो रही है। ये इग्नाइटर अमूमन अपने निर्धारित ‘टाइम बिटवीन ओवरहॉल (टीबीओ)’ लाइफ साइकल का एक पूरा सायकिल भी पूरा नहीं कर पाते और उससे पहले ही खराब हो जाते हैं।
वायुसेना का मानना है कि इस समस्या के समाधान के लिए प्लैटिनम-रोडियम की जगह पर अन्य उपयुक्त सामग्रियों का इस्तेमाल करते हुए नए कैटालिटिक इग्नाइटरों का डिजाइन डेवलप करने की जरूरत है, जिससे इन बार-बार होने वाले फेलियर को कम किया जा सके।
मौजूदा समय में इस समस्या से निपटने के लिए इग्नाइटरों को बार-बार और महंगे तरीके से बदलना पड़ता है। इसलिए इस समस्या का स्थायी समाधान डेवलप करना जरूरी है, ताकि रिप्लेसमेंट की जरूरत कम हो और इंजन की विश्वसनीयता तथा प्रदर्शन में सुधार हो सके।
जगुआर के इजेक्शन सीटों में भी दिक्कतें आ रही हैं। कंपनी ने स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध कराने में असमर्थता पहले ही जता चुकी है, जिसके बाद से वायुसेना स्वदेशी समाधान तलाशने में जुट है।
भारतीय वायु सेना के फ्लीट में फिलहाल राफेल के 36 और तेजस के 38 एयरक्राफ्ट सबसे नए हैं। उसके बाद 270 सुखोई-30 हैं, यानी कुल मिलाकर 15 स्क्वाड्रन ही नए हैं। मौजूदा फाइटर स्क्वाड्रन की जरूरत 42 है, लेकिन काम सिर्फ 29 से ही चलाना पड़ रहा है, यानी अगले 2030 से 12 से ज्यादा स्क्वाड्रन फेज आउट हो जाएंगे।
अगर भारतीय वायुसेना के मौजूदा फ्लीट की स्थिति पर नजर डालें, तो मिग-21 के अलग-अलग वेरिएंट — मिग-21 बिस, मिग-21 टाइप-96, मिग-27 और मिग-21 बाइसन — पहले ही फेज आउट हो चुके हैं। मिग-29 भी 2030 से चरणबद्ध तरीके से सेवा से बाहर होना शुरू हो जाएंगे। इसके बाद मिराज-2000 के 3 स्क्वाड्रन और जैगुआर के 6 स्क्वाड्रन भी फेज आउट की प्रक्रिया में शामिल हो जाएंगे। यानी 2035 तक वायुसेना की पुरानी फाइटर फ्लीट लगभग पूरी तरह बाहर हो जाएगी।
इस कमी को पूरा करने के लिए एयरफोर्स स्वदेशी फाइटर जेट तेजस मार्क-1ए और 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट की खरीद पर भरोसा कर रही है। एचएएल के साथ कुल 220 तेजस फाइटर जेट की खरीद का कॉन्ट्रैक्ट किया जा चुका है। अब तक तेजस मार्क-1 के 38 जेट वायुसेना में शामिल किए जा चुके हैं, जबकि तेजस मार्क-1ए की डिलीवरी अभी तक शुरू नहीं हो सकी है।


