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भारत-पाकिस्तान की 117 प्रमुख हस्तियों ने मोदी-शहबाज को पत्र लिखा: बोले- दुश्मनी खत्म करें, बातचीत और रिश्ते फिर शुरू हों

पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने इस पहल का समर्थन करते हुए कहा कि भारत और पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर मुद्दे सहित सभी विवादों का समाधान बातचीत के जरिए निकालना चाहिए। उन्होंने कहा कि इससे पूरे दक्षिण एशिया में स्थायी शांति स्थापित हो सकती है।

भारत-पाकिस्तान की 117 प्रमुख हस्तियों ने मोदी-शहबाज को पत्र लिखा: बोले- दुश्मनी खत्म करें, बातचीत और रिश्ते फिर शुरू हों
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नई दिल्ली: ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के एक वर्ष बाद भारत और पाकिस्तान के 100 से अधिक प्रमुख नागरिकों ने दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों से शांति बहाली की अपील की है। इस संयुक्त पत्र में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से आग्रह किया गया है कि वे द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य करने और संवाद की प्रक्रिया फिर से शुरू करने की दिशा में कदम उठाएं। यह अपील सेंटर फॉर पीस एंड प्रोग्रेस द्वारा जारी की गई है, जिस पर कुल 117 लोगों ने हस्ताक्षर किए हैं, जिनमें भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के प्रमुख बुद्धिजीवी, राजनेता और विशेषज्ञ शामिल हैं।

कौन-कौन हैं हस्ताक्षरकर्ताओं में शामिल?

भारतीय हस्ताक्षरकर्ताओं में नेशनल कॉन्फ्रेंस प्रमुख फारूक अब्दुल्ला, पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती, और अलगाववादी नेता मीरवाइज उमर फारूक शामिल हैं। इसके अलावा राजद सांसद मनोज झा और पूर्व टीएमसी मंत्री व वर्तमान एजेयूपी नेता हुमायूं कबीर ने भी इस अपील पर हस्ताक्षर किए हैं। पाकिस्तान की ओर से हस्ताक्षर करने वालों में पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी, पूर्व राजनयिक अशरफ जहांगीर काजी, नेशनल असेंबली सदस्य इस्फान्यार भंडारा और परमाणु वैज्ञानिक परवेज हुदभोय प्रमुख हैं।

महबूबा मुफ्ती का बयान और आरएसएस संदर्भ

पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने इस पहल का समर्थन करते हुए कहा कि भारत और पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर मुद्दे सहित सभी विवादों का समाधान बातचीत के जरिए निकालना चाहिए। उन्होंने कहा कि इससे पूरे दक्षिण एशिया में स्थायी शांति स्थापित हो सकती है। महबूबा मुफ्ती ने आरएसएस के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों की हालिया टिप्पणियों का भी उल्लेख किया, जिनमें बातचीत के समर्थन की बात कही गई थी। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के उस कथन को भी दोहराया कि “आप पड़ोसी नहीं बदल सकते, केवल दोस्त बदल सकते हैं।”

पत्र में क्या प्रमुख सुझाव दिए गए हैं?

हस्ताक्षरकर्ताओं ने अपने संयुक्त पत्र में कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं, जिनमें दोनों देशों के बीच पूर्ण कूटनीतिक संबंध बहाल करना शामिल है। इसमें उच्चायुक्तों की पुनः नियुक्ति, नियमित वीजा सेवाओं की बहाली और वाणिज्यिक उड़ानों के लिए हवाई क्षेत्र खोलने की मांग की गई है। इसके अलावा अटारी-वाघा सीमा को व्यापार और यात्रा के लिए फिर से खोलने, श्रीनगर-मुजफ्फराबाद बस सेवा को पुनः शुरू करने और सीमा पार संपर्क कार्यक्रमों को पुनर्जीवित करने का आग्रह भी किया गया है।

बातचीत और सुरक्षा संतुलन पर जोर

पत्र में जम्मू-कश्मीर सहित सभी लंबित मुद्दों पर व्यापक द्विपक्षीय वार्ता शुरू करने की अपील की गई है। साथ ही 2004 से 2007 के बीच तैयार किए गए वार्ता ढांचे पर फिर से विचार करने का सुझाव दिया गया है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने यह भी कहा कि दोनों देशों की सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखते हुए तनाव कम करने और विश्वास बहाली के उपायों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उनके अनुसार दशकों से जारी अलगाव की स्थिति ने क्षेत्रीय विकास और अवसरों को प्रभावित किया है।

धार्मिक और सांस्कृतिक संपर्क बहाल करने की मांग

अपील में करतारपुर साहिब कॉरिडोर को पुनः सुचारू करने, नीलम घाटी स्थित शारदा पीठ तक श्रद्धालुओं की पहुंच आसान बनाने और दोनों देशों में स्थित धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थलों की यात्रा को सरल बनाने की भी मांग की गई है। हस्ताक्षरकर्ताओं का मानना है कि सांस्कृतिक और धार्मिक संपर्क दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और विरोध

इस अपील पर भारत में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में विपक्ष के नेता सुनील शर्मा ने इस पहल की आलोचना करते हुए कहा कि मौजूदा हालात में बातचीत का आह्वान उचित नहीं है। वहीं भाजपा नेता रविंदर रैना ने कहा कि भारत सरकार को किसी पत्र की आवश्यकता नहीं है और देश की नीति स्पष्ट है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान के साथ संबंध केवल राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा के आधार पर तय होंगे।

शांति बनाम सुरक्षा की बहस फिर तेज

इस संयुक्त अपील ने एक बार फिर भारत-पाकिस्तान संबंधों पर बहस को तेज कर दिया है। एक तरफ हस्ताक्षरकर्ता संवाद और सहयोग को क्षेत्रीय विकास के लिए जरूरी बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ राजनीतिक दल इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से उचित नहीं मान रहे हैं। फिलहाल यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस अपील का दोनों सरकारों पर कोई कूटनीतिक प्रभाव पड़ता है या नहीं, और क्या यह पहल भविष्य में किसी नए संवाद की दिशा खोल सकती है।


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