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पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत की कूटनीतिक ताकत, एलपीजी संकट के बीच अमेरिका और रूस से आपूर्ति ने दी राहत

अमेरिका और रूस जैसे बड़े ऊर्जा उत्पादक देशों से एक साथ आपूर्ति मिलना भारत की संतुलित कूटनीति और विविध आयात नीति का परिणाम माना जा रहा है। भारत ने वर्षों से अपनी ऊर्जा निर्भरता को एक ही क्षेत्र तक सीमित न रखकर विभिन्न देशों से आयात बढ़ाया है।

पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत की कूटनीतिक ताकत, एलपीजी संकट के बीच अमेरिका और रूस से आपूर्ति ने दी राहत
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नई दिल्ली/मंगलूरू: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल और एलपीजी की आपूर्ति बाधित होने से दुनियाभर में संकट गहराता जा रहा है। इसी बीच भारत ने अपनी कूटनीतिक सक्रियता और रणनीतिक तैयारी के दम पर ऊर्जा आपूर्ति को संतुलित बनाए रखने में सफलता हासिल की है। अमेरिका और रूस से लगातार आ रही खेप ने देश को बड़ी राहत दी है।

अमेरिका से एलपीजी लेकर पहुंचा ‘पिक्सिस पायनियर’

रविवार को अमेरिकी कार्गो जहाज पिक्सिस पायनियर 16,714 मीट्रिक टन लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) लेकर कर्नाटक के मंगलूरू बंदरगाह पहुंचा। इस जहाज ने 14 फरवरी को टेक्सास के पोर्ट ऑफ नेदरलैंड से अपनी यात्रा शुरू की थी। मंगलूरू पहुंचने के बाद एलपीजी को एजिस लॉजिस्टिक्स के टर्मिनल पर उतारा गया। वैश्विक स्तर पर एलपीजी की कमी के बीच यह आपूर्ति भारत के लिए बेहद अहम मानी जा रही है, क्योंकि इससे घरेलू गैस स्टॉक को स्थिर बनाए रखने में मदद मिलेगी।

रूस से कच्चे तेल की बड़ी खेप

अमेरिकी जहाज के पहुंचने से एक दिन पहले ही रूस का तेल टैंकर एक्वा टाइटन मंगलूरू बंदरगाह पहुंचा। यह टैंकर एक लाख टन से अधिक कच्चा तेल लेकर आया है, जिसमें करीब 7.7 लाख बैरल क्रूड ऑयल शामिल है। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह टैंकर पहले चीन की ओर जा रहा था, लेकिन वैश्विक हालात को देखते हुए इसे भारत की ओर मोड़ दिया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत वर्तमान समय में ऊर्जा आपूर्ति के लिए एक महत्वपूर्ण और भरोसेमंद बाजार बनकर उभरा है।

होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे 700 जहाज

ईरान से जुड़े युद्ध के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास स्थिति बेहद तनावपूर्ण बनी हुई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस क्षेत्र में दुनिया के करीब 700 जहाज फंसे हुए हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का एक प्रमुख मार्ग है, जहां से लगभग 20% कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचता है। जहाजों के फंसने से सप्लाई चेन बाधित हो गई है, जिसका सीधा असर कच्चे तेल और एलपीजी की उपलब्धता पर पड़ रहा है। इस कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है, जबकि एलपीजी की कमी भी कई देशों के लिए चिंता का विषय बन गई है।

मंगलूरू पोर्ट की रणनीतिक अहमियत

इस संकट के बीच मंगलूरू बंदरगाह भारत के लिए एक अहम केंद्र बनकर उभरा है। यहां देश की सबसे बड़ी भूमिगत एलपीजी स्टोरेज सुविधा स्थित है, जो समुद्र तल से करीब 225 मीटर नीचे बनी हुई है। इस स्टोरेज की कुल क्षमता 80,000 मीट्रिक टन है, जो आपूर्ति में उतार-चढ़ाव के समय देश के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच का काम करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की अत्याधुनिक भंडारण व्यवस्था भारत की ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत बनाती है।

कूटनीति और विविध स्रोतों का फायदा

अमेरिका और रूस जैसे बड़े ऊर्जा उत्पादक देशों से एक साथ आपूर्ति मिलना भारत की संतुलित कूटनीति और विविध आयात नीति का परिणाम माना जा रहा है। भारत ने वर्षों से अपनी ऊर्जा निर्भरता को एक ही क्षेत्र तक सीमित न रखकर विभिन्न देशों से आयात बढ़ाया है। इस रणनीति का फायदा अब स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जब वैश्विक संकट के बावजूद देश में ऊर्जा आपूर्ति बनी हुई है।

घरेलू बाजार पर सकारात्मक असर

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि इन आपूर्तियों से भारत में एलपीजी और पेट्रोलियम उत्पादों की उपलब्धता बनी रहेगी। इससे घरेलू उपभोक्ताओं को राहत मिल सकती है और कीमतों पर भी नियंत्रण रखने में मदद मिलेगी। एलपीजी की पर्याप्त आपूर्ति से घरेलू सिलेंडर वितरण प्रभावित नहीं होगा, जबकि कच्चे तेल की उपलब्धता से रिफाइनिंग और ईंधन आपूर्ति सुचारू बनी रहेगी।

संकट के बीच भारत की मजबूत तैयारी

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था को झकझोर दिया है, लेकिन भारत ने अपनी दूरदर्शी नीति और सक्रिय कूटनीति के दम पर स्थिति को संभालने की क्षमता दिखाई है। अमेरिका और रूस से लगातार मिल रही ऊर्जा आपूर्ति इस बात का संकेत है कि भारत न केवल अपनी जरूरतों को पूरा कर रहा है, बल्कि वैश्विक स्तर पर एक मजबूत और स्थिर ऊर्जा उपभोक्ता के रूप में उभर रहा है। यह घटनाक्रम दर्शाता है कि वैश्विक संकट के बीच भी भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर पूरी तरह सतर्क और तैयार है।


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