पश्चिम बंगाल में कितना कारगर होगी बाल विवाह पर अंकुश लगाने की पहल
पश्चिम बंगाल लंबे समय से बाल विवाह के मामले में लगातार देश में पहले स्थान पर रहा है

पश्चिम बंगाल लंबे समय से बाल विवाह के मामले में लगातार देश में पहले स्थान पर रहा है. अब सरकार ने इस तस्वीर को बदलने की दिशा में पहल की है. क्या इससे बदलेगी स्थिति?
सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की सांख्यिकीय रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में अब भी 6.3 फीसदी युवतियों की शादी 18 साल से कम उम्र में हो जाती है. यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत 2.1 फीसदी के मुकाबले तीन गुना है.
बंगाल में बाल विवाह और कम उम्र में मां बनने के बढ़ते मामलों पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं और सत्ता में रहने वाली पार्टी भी हालत में सुधार के लिए समुचित उपाय करने का दावा करती रही है. पंद्रह साल तक सत्ता में रहने वाली ममता बनर्जी सरकार ने बाल विवाह के मामलों पर अंकुश लगाने के लिए कन्याश्री जैसी योजनाएं शुरू की थी. लेकिन बावजूद इसके बाल विवाह और 18 साल से कम उम्र में बच्चों के जन्म देने के मामले में यह राज्य अब भी देश में पहले स्थान पर है.
बाल विवाह के खिलाफ पश्चिम बंगाल सरकार की ताजा पहल
अब पड़ोसी असम की तर्ज पर राज्य की बीजेपी सरकार ने लगातार बढ़ते ऐसे मामलों पर अंकुश लगाने के लिए कड़ी कार्रवाई की योजना बनाई है. इसके तहत स्वास्थ्य विभाग किशोरियों के गर्भवती होने के बढ़ते मामलों पर अंकुश लगाने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करेगा. इसके लिए बनी समिति की पहली बैठक 18 सितंबर को कोलकाता के स्वास्थ्य मंत्रालय में होगी.
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कोलकाता में पत्रकारों को बताया, "इस साल के पहले छह महीनों यानी 30 जून तक 60 हजार युवतियों ने 18 साल से कम उम्र में बच्चों को जन्म दिया था. ऐसे 13 हजार मामलों के साथ मुर्शिदाबाद राज्य में पहले स्थान पर है."
मुख्यमंत्री का आरोप है कि 15 साल तक सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस सरकार ने केंद्र सरकार के साथ आंकड़ें शेयर नहीं किए और इन पर अंकुश लगाने की दिशा में कोई कदम भी नमहीं उठाया. उनका कहना था, इस समस्या को रोकने के लिए दोषियों के खिलाफ बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पोक्सो) अधिनियम के प्रावधानों को कड़ाई से लागू किया जाएगा.
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स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर डीडब्ल्यू को बताते हैं, "सरकार बाल विवाह और कम उम्र में बच्चों के जन्म को रोकने के लिए पूरे राज्य में घर-घर अभियान चलाएगी."
मुख्यमंत्री ने पत्रकारों को बताया, "स्वास्थ्य विभाग ऐसे मामलों में दोषियों खासकर पति को कारण बताओ नोटिस जारी करेगा. उनको एक महीने के भीतर पति-पत्नी के बालिग होने के दस्तावेजी सबूत देने होंगे. इसमें नाकाम रहने पर उनके खिलाफ संबंधित अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाएगी."
उनके मुताबिक, पुलिस खुद ऐसे मामलों का संज्ञान लेगी. शादी कराने वाले पुजारी और काजी के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी.
मुख्यमंत्री ने कहा है कि ऐसे दोषी परिवारों को केंद्र और राज्य की कल्याण योजनाओं के तहत मिलने वाली मदद भी बंद कर दी जाएगी. उनका कहना था कि राज्य में बाल विवाह और कम उम्र में मां बनने वाली किशोरियों की संख्या इतनी ज्यादा है कि राज्य की जेलों में दोषियों को रखने के लिए जगह कम पड़ जाएगी.
क्या इससे बदलेगी तस्वीर?
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार की ताजा पहल का जमीनी स्तर पर क्या और कितना असर होगा, यह अभी कहना मुश्किल है.
एक महिला कार्यकर्ता सुमेधा गोस्वामी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "इससे पहले तृणमूल कांग्रेस सरकार ने भी कन्याश्री जैसी योजनाएं शुरू कर बाल विवाह पर अंकुश लगाने का दावा किया था. लेकिन राष्ट्रीय आंकड़े कुछ और ही कहते हैं. इसलिए फिलहाल ताजा पहल के नतीजों के बारे में कोई पूर्वानुमान लगाना उचित नहीं होगा."
पश्चिम बंगाल में बाल विवाह पर गहन शोध करने वाली टीम की सदस्य रहीं बर्दवान विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नमिता चकमा डीडब्ल्यू से कहती हैं, "राज्य में बाल विवाह की समस्या बहुत पुरानी है और इसकी जड़ें समाज की मानसिकता और आर्थिक स्थिति में छिपी हैं. सिर्फ सजा का डर दिखा कर इस पर पूरी तरह अंकुश लगाना संभव नहीं है."
कार्यकर्ताओं का कहना है कि इसके लिए बड़े पैमाने पर जागरुकता अभियान चलाने के साथ समय-समय पर इस अभियान के असर की समीक्षा की जानी चाहिए. उस आधार पर अभियान के तौर-तरीकों में बदलवा करना होगा. समाज की मानसिकता नहीं बदलने तक इस सामाजिक कुरीति पर अंकुश लगाना मुश्किल होगा.


