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Holika Dahan 2026: कल लगेगा खंड चंद्रग्रहण, आज है होलिका दहन, जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा का महत्व

फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा, 3 मार्च को लगने वाला यह खंड चंद्रग्रहण भारतीय समयानुसार दोपहर 3:20 बजे आरंभ होकर सायं 6:48 बजे तक रहेगा। हालांकि भारत में यह ग्रहण ‘ग्रस्तोदित’ रूप में दिखाई देगा, अर्थात चंद्रमा जब उदित होगा, तब वह ग्रहण से ग्रस्त रहेगा।

Holika Dahan 2026: कल लगेगा खंड चंद्रग्रहण, आज है होलिका दहन, जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा का महत्व
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नई दिल्‍ली/ वाराणसी : Holika Dahan 2026: रंगों का पर्व होली इस वर्ष चंद्रग्रहण के कारण एक दिन आगे बढ़ गया है। सामान्यतः होलिका दहन के अगले दिन रंगोत्सव मनाया जाता है, लेकिन इस बार पूर्णिमा तिथि पर लगने वाले खंड चंद्रग्रहण (Partial Lunar Eclipse 2026) के चलते उत्सव की तिथि में बदलाव किया गया है। अब रंगोत्सव बुधवार, 4 मार्च को मनाया जाएगा। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार मंगलवार को चंद्रग्रहण लगने से उस दिन रंग खेलने और अन्य मांगलिक कार्य वर्जित रहेंगे। ग्रहण के दौरान भोजन, गमनागमन और शुभ कार्यों पर भी रोक रहती है, इसलिए परंपरा और शास्त्रसम्मत विचार के आधार पर रंगोत्सव को एक दिन आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया है।

दोपहर से शुरू होगा ग्रहण

ख्यात ज्योतिषाचार्य पं. ऋषि द्विवेदी के अनुसार फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा, 3 मार्च को लगने वाला यह खंड चंद्रग्रहण भारतीय समयानुसार दोपहर 3:20 बजे आरंभ होकर सायं 6:48 बजे तक रहेगा। हालांकि भारत में यह ग्रहण ‘ग्रस्तोदित’ रूप में दिखाई देगा, अर्थात चंद्रमा जब उदित होगा, तब वह ग्रहण से ग्रस्त रहेगा। पूर्वोत्तर राज्यों को छोड़कर बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली, महाराष्ट्र, राजस्थान सहित कई क्षेत्रों में यह आंशिक खंड चंद्रग्रहण सूर्यास्त के बाद चंद्रोदय के समय से दिखाई देगा। ज्योतिष मान्यता के अनुसार जिस क्षेत्र में ग्रहण जिस समय दिखाई देता है, वही समय उस क्षेत्र के लिए ग्रहण का प्रभावी काल माना जाता है।

काशी में ग्रहण का समय और सूतक

काशी में चंद्रोदय सायं 5:58 बजे होगा। इस आधार पर यहां ग्रहण का दृश्य प्रभाव 5:58 बजे से 6:48 बजे तक लगभग 50 मिनट रहेगा। बीएचयू के ज्योतिष विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विनय कुमार पांडेय ने बताया कि चंद्रग्रहण का सूतक काल ग्रहण के दृश्य होने से नौ घंटे पूर्व प्रारंभ हो जाता है।इस प्रकार काशी में सूतक प्रातः 8:58 बजे से प्रभावी होगा। सूतक काल में जप, तप, हवन और मंत्र जाप के अलावा अन्य शुभ कार्य नहीं किए जाते। विवाह, पूजन, नए कार्यों का आरंभ और उत्सव जैसे मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं।

स्नान और धार्मिक आचरण का महत्व

श्रीकाशी विद्वत परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी के अनुसार ग्रहण और मोक्ष काल में स्नान करना विशेष फलदायी माना जाता है। उनका कहना है कि उस समय सभी जल गंगाजल के समान पवित्र हो जाते हैं। यदि आसपास कोई तीर्थक्षेत्र, नदी या सरोवर हो तो वहां स्नान करना श्रेष्ठ माना जाता है। ग्रहण के दौरान दान, जप और ध्यान को विशेष महत्व दिया गया है। मोक्ष काल में स्नान के बाद दान-पुण्य करने से विशेष आध्यात्मिक लाभ की मान्यता है।

होलिका दहन का शुभ मुहूर्त

इस वर्ष होलिका दहन को लेकर भी विशेष गणना की गई है। पं. ऋषि द्विवेदी के अनुसार फागुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में सोमवार, 2 मार्च को रात्रिपर्यंत भद्रा का प्रभाव रहेगा। शास्त्रों में भद्रा काल में शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं, लेकिन भद्रा के ‘पुच्छ’ भाग में कुछ कार्य किए जा सकते हैं। भद्रा पुच्छ का समय रात्रि 12:50 बजे से 2:02 बजे के बीच रहेगा। इसी अवधि में होलिका दहन किया जाएगा। फागुन शुक्ल पूर्णिमा तिथि 2 मार्च की शाम 5:18 बजे से प्रारंभ होकर 3 मार्च की शाम 4:33 बजे तक रहेगी। भद्रा 2 मार्च की शाम 5:18 बजे से शुरू होकर 3 मार्च की भोर 4:56 बजे तक प्रभावी रहेगी। शास्त्राज्ञा के अनुसार इस बार भद्रा पुच्छ में ही होलिका दहन संपन्न होगा।

4 मार्च को मनाया जाएगा रंगोत्सव

3 मार्च को शाम 4:33 बजे से चैत्र कृष्ण प्रतिपदा तिथि लग जाएगी, जो 4 मार्च को 4:15 बजे तक रहेगी। चूंकि 3 मार्च को चंद्रग्रहण का प्रभाव रहेगा और उस दिन उत्सव वर्जित माना गया है, इसलिए रंग खेलने का पर्व 4 मार्च को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ग्रहण के प्रभाव वाले दिन रंगोत्सव मनाना शुभ नहीं माना जाता। इसी कारण समाज और मंदिरों में 4 मार्च को रंगोत्सव की तैयारियां की जा रही हैं।

परंपरा और ज्योतिषीय गणना का समन्वय

हर वर्ष होली की तिथि चंद्र पंचांग के आधार पर तय होती है। पूर्णिमा, भद्रा और ग्रहण जैसे खगोलीय एवं ज्योतिषीय तत्वों को ध्यान में रखकर शुभ मुहूर्त निर्धारित किया जाता है। इस बार चंद्रग्रहण के कारण तिथियों और उत्सवों के समय में विशेष सावधानी बरती गई है। ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं का सम्मान करते हुए पर्व मनाना ही शुभ फलदायी होता है। इसलिए होलिका दहन निर्धारित मुहूर्त में और रंगोत्सव 4 मार्च को मनाया जाएगा।

क्या करें और क्या न करें

ग्रहण काल में भोजन बनाने और ग्रहण करने से बचने की परंपरा है। गर्भवती महिलाओं और बच्चों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। मंदिरों के कपाट ग्रहण के दौरान बंद रखे जाते हैं और मोक्ष काल के बाद शुद्धि के साथ पुनः खोले जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ग्रहण को भय या अंधविश्वास से नहीं, बल्कि धार्मिक अनुशासन और परंपरा के रूप में देखना चाहिए। उचित समय पर स्नान, दान और पूजा-अर्चना से आध्यात्मिक संतुलन बनाए रखने की परंपरा रही है।

उत्साह बरकरार, बस एक दिन की प्रतीक्षा

हालांकि रंगोत्सव एक दिन आगे बढ़ गया है, लेकिन होली के उल्लास में कोई कमी नहीं है। बाजारों में गुलाल, पिचकारियां और मिठाइयों की खरीदारी जारी है। लोग बस एक दिन की अतिरिक्त प्रतीक्षा के साथ पूरे उत्साह से रंगों के इस पर्व का स्वागत करने को तैयार हैं। इस प्रकार चंद्रग्रहण के कारण इस वर्ष होली का रंगोत्सव 4 मार्च को मनाया जाएगा, जबकि होलिका दहन 2 मार्च की रात्रि भद्रा पुच्छ में संपन्न होगा। धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषीय गणनाओं के समन्वय के साथ यह पर्व पूरे देश में परंपरागत उल्लास के साथ मनाया जाएगा।


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