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जमुई वाली रील ‘वायरल’ न होती तो क्या तब भी न्याय मिल पाता?

वायरल रील के आधार पर न्याय सुनिश्चित करने की वकालत करने से पहले भारत में लैंगिक हिंसा की पूरी तस्वीर देखने की जरूरत है.

जमुई वाली रील ‘वायरल’ न होती तो क्या तब भी न्याय मिल पाता?
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बिहार के जमुई जिले से नाबालिग लड़की के उत्पीड़न का वीडियो वायरल होने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या न्याय तभी सुनिश्चित होगा जब घटना की रील वायरल होगी और आम लोग उसके खिलाफ विरोध दर्ज करवाएंगे?

21 सितंबर को भारत में लगभग सभी की फीड पर बिहार के जमुई जिले का वह 'वायरल' वीडियो आया जिसमें दो नाबालिगों का उत्पीड़न किया गया. इस पर राज्य के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का एक आधिकारिक बयान कुछ यह है, "अपना जीवन जियो कोई मना नहीं कर रहा, लेकिन कोई आपराधिक घटना करने से कोई समाज का हीरो नहीं बनेगा. आजकल रील बनाने के चक्कर में लोग मारे जा रहे हैं. आज की जो घटना है, वह अगर रील नहीं बनाता तो क्या पकड़ा जाता?” उनके बयान के 24 घंटे बाद ही बिहार के ही एक और जिले समस्तीपुर से ऐसा ही एक वीडियो सामने आया है जिसमें एक लड़की को तीन से चार लोग मिलकर उत्पीड़ित करते नजर आ रहे हैं.

सम्राट चौधरी के इस बयान को बहुत सारे लोग असंवेदनशील बताते हुए इसकी आलोचना कर रहे हैं. लेकिन आलोचना से परे, इस बयान का एक पहलू यह भी है कि अगर वाकई इस यौन हिंसा की घटना की रील ‘वायरल' ना होती तो क्या सच में नाबालिग सर्वाइवर इसके खिलाफ पुलिस के पास जाते? क्या आम जनमानस में इसके खिलाफ इतनी तीखी प्रतिक्रिया आती? क्या इतनी जल्दी पुलिस की तरफ से कार्रवाई की जाती? क्या सीएम का यह सवाल उनकी अपनी सरकार, अपने राज्य की पुलिस और न्याय व्यवस्था से नहीं होना चाहिए?

अब तक सामने आई जानकारी के मुताबिक, घटना के वक्त दोनों नाबालिग एक साथ शाम को अपने घर जा रहे थे. उनका उत्पीड़न करने वालों में स्थानीय लोग ही शामिल थे. मामले की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया गया है. वीडियो के आधार पर दोषियों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है. पुलिस ने अब तक जिन लोगों को गिरफ्तार किया है उनमें तीन नाबालिग भी शामिल हैं.

भारतीय समाचार एजेंसियों के मुताबिक, सर्वाइवर लड़की ने घटना की जानकारी अपने घरवालों को नहीं दी थी. उत्पीड़न का वीडियो वायरल होने के बाद घरवालों को पता चला. देखा जाए तो ऐसी घटनाओं के बाद यौन उत्पीड़न और हिंसा के अधिकतर सर्वाइवरों की पहली प्रतिक्रिया यही होती है; वे घटना को दर्ज नहीं करवाना चाहते. आंकड़े भी यही कहते हैं कि भारत में हर साल होने वाले ऐसे मामलों में 90 फीसदी से ज्यादा मामले रिपोर्ट ही नहीं होते. सामाजिक ढांचा अक्सर ऐसे सर्वाइवरों का साथ देने के बजाय उनके खिलाफ खड़ा नजर आता है. 'विक्टिम ब्लेमिंग' की सोच सर्वाइवर्स को न्याय से दूर ले जाती है.

वायरल वीडियो से होगा न्याय सुनिश्चित?

वायरल - यह शब्द सोशल मीडिया के संदर्भ में आम जनमानस के बीच बीते एक दशक में रच-बस गया है. एक सीधे सपाट शीर्षक में अगर 'वायरल' शब्द जोड़ दिया जाए तो उसके ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने की संभावना होती है. अगर वह वायरल कॉन्टेंट किसी अपराध से संबंधित हो तो उसका स्वत: संज्ञान भी बिना देरी के लिया जाता है. जमुई की घटना के बाद जिस रफ्तार से रील के आधार पर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई हुई उससे एक आशा जगती है कि न्याय के गलियारे में ऐसे मामलों के लिए सिर्फ नाउम्मीदी नहीं है. लेकिन क्या हर मामले को लेकर कानून व्यवस्था इतनी ही फुर्ती से हरकत में आती दिखती है? कई बार, ऐसी घटनाओं में अक्सर वीडियो भी वही बनाकर सोशल मीडिया पर डालते हैं जो अपराध में शामिल होते हैं.

निवेदिता झा कई दशकों से बिहार में महिला अधिकारों पर काम करती आई हैं. डीडब्ल्यू से बातचीत में उन्होंने कहा, "यहां रील किस मकसद से वायरल हुई इस पर भी सोचना होगा. रेप करते हुए भी आज रील्स वायरल होती हैं. किसी आपराधिक घटना को रिकॉर्ड करना गलत नहीं है लेकिन अगर बचाना मकसद होता तो समझ आता है लेकिन इसका मकसद उन नाबालिगों को शर्मिंदा करना था. अब वे सोच रहे होंगे कि उनके साथ जो हुआ वह सबने देख लिया. फिर सवाल.. जो अब वहां के लोग भी उस बच्ची से किए जा रहे हैं कि शाम के अंधेरे में आखिर वह कर क्या रही थी. घटना होने के बाद उस घटना का सोशल मीडिया पर मौजूद होना सर्वाइवरों के लिए ‘डबल ट्रॉमा' से गुजरने जैसा होता है." हालांकि, जमुई पुलिस ने लोगों से अपील की है कि इस वीडियो को सर्कुलेट ना किया जाए.

क्या अब सोशल मीडिया बन रहा है सर्वाइवरों के लिए ‘डबल ट्रॉमा?

सोशल मीडिया के दौर में इंटरनेट से किसी चीज को पूरी तरह हटाना एक नामुमकिन सी बात लगती है. ऐसे मामलों पर लोगों का समर्थन जुटाने, उन्हें साथ लाने, आंदोलन को मजबूत करने में सोशल मीडिया की निर्णायक भूमिका से इनकार भी नहीं किया जा सकता. लेकिन यही स्पेस जो सर्वाइवर्स का पक्ष रखने का जरिया बनता है उनके लिए दोधारी तलवार भी बन जाता है जब उनके वीडियो, क्लिप्स, बयान को अलग-अलग नजरिये के साथ सर्कुलेट किया जाता है. इंटरनेट पर यह सुनिश्चित नहीं किया जा सकता कि हर लाइक और शेयर का मकसद सर्वाइवर को न्याय दिलाना ही हो.

हालांकि, सर्वाइवर्स के प्रति इस असंवेदनशील ऑनलाइन व्यवहार का हमेशा से एक ऑफलाइन रूप भी हमारे आसपास मौजूद रहा है. भारतीय न्याय व्यवस्था में ऐसे सैकड़ों मामले दर्ज हैं जहां सर्वाइवर को कटघरे में, पुलिस थानों और न्यायिक प्रक्रियाओं में गरिमा सुरक्षित करने के बजाय खूब अपमान का सामना करना पड़ा. मोरल पुलिसिंग की आपराधिक घटना के बाद सर्वाइवर्स को न्याय व्यवस्था की ‘मोरल पुलिसिंग' और वहां व्याप्त पूर्वाग्रहों का भी सामना करना पड़ता है. विक्टिम ब्लेमिंग की मानसिकता हर स्तर पर सुनिश्चित करती है कि सर्वाइवरों की मुश्किलें खत्म ना हो. लैंगिक हिंसा के मामलों को रिपोर्ट ना करने की यह सबसे बड़ी वजह बनती है.

उदाहरण के तौर पर जिन मामलों ने भारतीय कानून में लैंगिक न्याय की नींव ठोस की, उनमें भी सर्वाइवर्स ऐसे ही अपमानजनक न्याय प्रक्रिया से गुजरे. 1992 में भारत के राजस्थान में भंवरी देवी रेप केस में स्थानीय पुलिस ने तुरंत उनकी एफआईआर दर्ज करने या चिकित्सा सहायता देने के बजाय उससे साक्ष्य के रूप में अपना लहंगा पेश करने की मांग की थी. अदालत ने सर्वाइवर पर जातिगत टिप्पणियां की थीं. इस मामले को आज भी रेप सर्वाइवर्स के प्रति न्याय व्यवस्था की संवेदनशीलता मापने के लिए दोहराया जाता है.

रिपोर्ट और सर्वे इस बात की तस्दीक भी करते हैं. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ह्युमन राइट्स वॉच की एक जांच में पुलिस स्टेशनों में बलात्कार या यौन उत्पीड़न के लिए शून्य या न के बराबर एफआईआर दर्ज होने की बात सामने आई. कई गैर-सरकारी संगठनों ने अपने अनुभव से ह्युमन राइट्स वॉच को बताया कि कई बार जब महिलाएं पुलिस हिरासत में बंद अपने परिजनों के बारे में पूछताछ करने या बलात्कार की घटनाओं सहित अन्य मामलों में एफआईआर दर्ज कराने के लिए पुलिस स्टेशन गईं, तो उन्हें दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा है. आरोपी या दोषी के बजाय सर्वाइवर से सवाल अधिक किए जाते हैं.

इन चुनौतियों से पार पाकर जो मामले दर्ज भी होते हैं उनमें सजा मिलने की दर भारत में काफी कम है. एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 2002 और 2011 के बीच, अदालत में गए सभी मामलों में से लगभग 26 फीसदी में सजा सुनाई गई थी. 2012 के बाद, दोषसिद्धि की दर में सुधार होना शुरू हुआ, जिसके बाद 2016 में यह गिरकर फिर से 25 फीसदी रही. 2017 में, दोषसिद्धि की दर बढ़कर 32 फीसदी दर्ज की गई.


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