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साठोत्तरी कथा के प्रमुख स्तंभ ज्ञानरंजन का निधन, नम आंखों के साथ दी अंतिम विदाई
वह उन चुनिंदा लेखकों में थे, जिन्होंने 1960 के दशक के बाद उभरी साठोत्तरी कथा धारा को न सिर्फ दिशा दी, बल्कि उसे वैचारिक गहराई और भाषिक नवीनता भी प्रदान की।

जबलपुर। हिंदी कथा साहित्य के वरिष्ठ साहित्यकार, साठोत्तरी कथा आंदोलन के प्रमुख स्तंभ और प्रतिष्ठित पत्रिका ‘पहल’ के संपादक ज्ञानरंजन का बुधवार रात निधन हो गया। वह 89 वर्ष के थे। उनके निधन से हिंदी साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। गुरुवार को मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर स्थित गौरीघाट मुक्तिधाम में उनका अंतिम संस्कार किया गया, जहां साहित्य, शिक्षा और संस्कृति से जुड़े अनेक लोगों ने नम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई दी।
नवाचारी कथाकार का अंत, साहित्य जगत में शोक
ज्ञानरंजन के निधन को हिंदी कथा साहित्य के लिए एक अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। वह उन चुनिंदा लेखकों में थे, जिन्होंने 1960 के दशक के बाद उभरी साठोत्तरी कथा धारा को न सिर्फ दिशा दी, बल्कि उसे वैचारिक गहराई और भाषिक नवीनता भी प्रदान की। उनके निधन के साथ ही हिंदी साहित्य ने एक ऐसे सर्जक को खो दिया है, जिसने आम आदमी के अनुभव, आंतरिक द्वंद्व और सामाजिक यथार्थ को नई संवेदना के साथ कथा में उतारा।
अकोला से जबलपुर तक का साहित्यिक सफर
महाराष्ट्र के अकोला में 21 नवंबर 1936 को जन्मे ज्ञानरंजन ने हिंदी साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उन्होंने अपने रचनात्मक जीवन का बड़ा हिस्सा मध्य प्रदेश के जबलपुर में बिताया। यहीं वे जीएस कॉलेज में हिंदी के प्राध्यापक रहे और वर्ष 1996 में सेवानिवृत्त हुए। शिक्षण के साथ-साथ उन्होंने निरंतर लेखन और संपादन के माध्यम से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया।
साठोत्तरी कथा के सशक्त हस्ताक्षर
ज्ञानरंजन को साठोत्तरी कहानी का सशक्त हस्ताक्षर माना जाता है। साठोत्तरी कथा, नई कहानी आंदोलन से आगे बढ़कर यथार्थवाद, विद्रोह, मोहभंग और सामाजिक विसंगतियों को केंद्र में रखती है। ज्ञानरंजन ने इस धारा में कहानियों को काव्यात्मकता, सघन भाषा और अनूठे शिल्प के साथ प्रस्तुत किया। उनके लेखन की विशेषता यह थी कि वे बाहरी घटनाओं से अधिक मनुष्य के भीतर चलने वाले मौन, असहमति और पीढ़ियों के फासले को कथा का विषय बनाते थे।
‘पहल’ पत्रिका और वैचारिक योगदानज्ञानरंजन का साहित्यिक योगदान केवल लेखन तक सीमित नहीं था। उन्होंने करीब 35 वर्षों तक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’ का संपादन किया। पहल अपने समय की सबसे प्रभावशाली साहित्यिक पत्रिकाओं में गिनी जाती है। इसकी लोकप्रियता और वैचारिक महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जर्मनी की एक विश्वविद्यालय ने इसके सभी 125 अंकों को डिजिटाइज किया।
देश-दुनिया में साहित्यिक पहचान
ज्ञानरंजन की कहानियां केवल हिंदी तक सीमित नहीं रहीं। उनकी रचनाओं का अनुवाद अंग्रेजी, जापानी, रूसी सहित कई अन्य भाषाओं में हुआ। उनकी कहानियां सैन फ्रांसिसको, हार्वर्ड, लंदन, लेनिनग्राद और पूर्वी यूरोप के कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल की गईं। यह उनकी अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक उपस्थिति और प्रभाव को दर्शाता है।
साहित्यकारों की श्रद्धांजलि
साहित्यकार विवेक चतुर्वेदी ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि जबलपुर से हरिशंकर परसाई के बाद ज्ञानरंजन ऐसे साहित्यकार थे, जिन्होंने देश-दुनिया में हिंदी साहित्य को गरिमा के साथ पहचान दिलाई। वहीं, साहित्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव ने कहा कि ज्ञानरंजन हिंदी कहानी के उस युग के प्रवर्तक स्वर थे, जिन्होंने आम आदमी को कथा के केंद्र में रखा। उन्होंने कहा, “ज्ञानरंजन के निधन के साथ हिंदी कथा साहित्य ने अपना एक साक्षी खो दिया है, लेकिन उनकी कहानियां समय की डायरी बनकर हमेशा जीवित रहेंगी। वे हमें यह याद दिलाती हैं कि तकनीक या आधुनिकता से नहीं, बल्कि मनुष्यता से ही पीढ़ियां जुड़ी रहती हैं।” समकालीन कथाकार पंकज स्वामी गुलुश ने कहा कि ज्ञानरंजन की रचनात्मकता और पहल के संपादन ने हिंदी साहित्य को वैश्विक मंच पर पहुंचाया।
सम्मान और विरासत
ज्ञानरंजन को उनके साहित्यिक योगदान के लिए कई सम्मानों से नवाजा गया। मध्य प्रदेश के रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय ने उन्हें महामहोपाध्याय की मानद उपाधि से सम्मानित किया था। उनका लेखन आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बना रहेगा।
साहित्य में अमर रहेंगे ज्ञानरंजन
ज्ञानरंजन भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कहानियां, उनका वैचारिक साहस और मनुष्यता के पक्ष में खड़ा लेखन उन्हें हिंदी साहित्य में अमर बनाए रखेगा। साठोत्तरी कथा के इस स्तंभ के निधन से साहित्य जगत शोकाकुल है, लेकिन उनकी रचनात्मक विरासत आने वाले समय तक पाठकों और लेखकों को प्रेरित करती रहेगी।
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