Top
Begin typing your search above and press return to search.

भारत में घटती प्रजनन दर से बढ़ती चिंता, क्या होगा असर?

आबादी के 'रिप्लेसमेंट लेवल' की चिंता अब कई यूरोपीय और एशियाई देशों से होकर भारत तक भी पहुंच गई है. देश में आबादी का संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी प्रजनन दर 2.1 प्रति महिला से घट कर 1.9 तक पहुंच गई है

भारत में घटती प्रजनन दर से बढ़ती चिंता, क्या होगा असर?
X

आबादी के 'रिप्लेसमेंट लेवल' की चिंता अब कई यूरोपीय और एशियाई देशों से होकर भारत तक भी पहुंच गई है. देश में आबादी का संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी प्रजनन दर 2.1 प्रति महिला से घट कर 1.9 तक पहुंच गई है.

हाल में केंद्र को सौंपी गई सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम स्टैटिस्टिकल रिपोर्ट, 2024 में कहा गया है कि पीढ़ी दर पीढ़ी आबादी का स्तर बनाए रखने के लिए प्रति महिला 2.1 बच्चे जरूरी हैं. लेकिन अब यह घटकर 1.9 रह गई है. इस सदी की शुरुआत में यह प्रजनन दर 3.1 प्रति महिला थी. लेकिन यह पहली बार 'रिप्लेसमेंट लेवल' यानी भरपाई या प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आ गई है.

आबादी के मामले में भारत ने कुछ समय पहले ही चीन को पीछे छोड़ दिया था. लेकिन अब ताजा आंकड़े आबादी पर दूरगामी प्रतिकूल असर का संकेत हैं. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक प्रजनन दर के मामले में दक्षिण कोरिया 0.75 बच्चे प्रति महिला के साथ दुनिया में सबसे नीचे है. 'रिप्लेसमेंट लेवल' से कम दर वाले देशों में इटली और स्पेन जैसे यूरोपीय देशों के अलावा ताइवान और सिंगापुर जैसे एशियाई देश शामिल हैं. अब भारत का नाम भी इसी सूची में शामिल हो गया है.

सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम स्टैटिस्टिकल रिपोर्ट में क्या है?

रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के विभिन्न राज्यों में भी प्रजनन दर के मामले में काफी अंतर है. मिसाल के तौर पर बिहार में यह दर देश में सबसे ज्यादा 2.9 प्रति महिला है. इसके बाद क्रमशः उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान का स्थान है. प्रजनन दर का आशय एक महिला के जीवन काल में पैदा होने वाले बच्चों की तादाद से है. इस सदी की शुरुआत में यह दर 3.3 प्रति महिला थी.

रिपोर्ट के मुताबिक, यह गिरावट कोई एक दिन में नहीं आई है. वर्ष 1971 से 1981 के बीच देश में प्रजनन दर 5.2 से घटकर 4.5 बच्चे प्रति महिला तक आ गई. उसके अगले दस साल में यह आंकड़ा 4.5 तक पहुंच गया. अब 2024 में घटकर 1.9 तक पहुंच गया है. वर्ष 1971 में ग्रामीण इलाकों में प्रजनन दर 5.4 थी जो घटकर 2024 में 2.1 तक पहुंच गई है. शहरी इलाकों में तस्वीर और बदतर है. इस इलाके में इस दौरान यह आंकड़ा 2.1 से घटकर 1.5 रह गया है.

बीते कुछ दशकों से देश की आबादी लगातार बढ़ती रही है. रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते कुछ साल से प्रजनन दर में लगातार गिरावट के बावजूद यह रिप्लेसमेंट लेवल से ज्यादा थी. इसी वजह से आबादी में वृद्धि दर्ज की जा रही थी.

भारत में लोग कम बच्चे क्यों पैदा कर रहे हैं?

विशेषज्ञों का कहना है कि सत्तर के दशक के दौरान केंद्र की सत्ता में रही सरकार ने आबादी विस्फोट की चेतावनी देते हुए इस पर अंकुश लगाने के लिए कई जन्म निरोधक योजनाएं लागू की थी. इनमें जबरन नसबंदी जैसी विवादास्पद योजना भी शामिल थी. विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षा तक बेहतर पहुंच और जन्म निरोधक उपायों के बढ़ते प्रचलन के साथ ही बच्चों के पालन-पोषण और पढ़ाई के खर्चों में बेतहाशा वृद्धि भी प्रजनन दर में गिरावट के कुछ प्रमुख कारण हैं.

समाजशास्त्रियों का कहना है कि अब खासकर कामकाजी महिलाएं अपने करियर और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने को ज्यादा तरजीह दे रही हैं. इसके कारण उनकी शादी देरी से हो रही है और वो बच्चे भी बहुत कम या नहीं पैदा कर रही हैं.

पश्चिम बंगाल राज्य राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष लीना गांगुली डीडब्ल्यू से कहती हैं, "महिलाओं में साक्षरता बढ़ने और जन्म निरोधक उपायों तक पहुंच के साथ ही पारिवारिक फैसलों में उनकी बढ़ती भूमिका भी कम बच्चे पैदा करने की प्रमुख वजह है. बच्चो का पालन-पोषण और पढ़ाई का खर्च भी आम लोगों की पहुंच से बाहर होता जा रहा है."

कोलकाता के प्रजनन विशेषज्ञ डा. सुदर्शन गोष दस्तीदार डीडब्ल्यू को बताते हैं, "प्रजनन दर घटने की एक और वजह है. शिशुओं की मृत्यु दर में गिरावट के कारण लोगों में ज्यादा बच्चे पैदा करने की चाह भी घटती जाती है." ताजा सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में वर्ष 2019 में जहां शिशुओं की मृत्यु दर 30 प्रति हजार ती वहीं 2024 में यह घट कर 24 रह गई है.

कोलकाता विश्वविद्यालय के एक कालेज में समाज विज्ञान की प्रोफेसर मानविका मुखर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "टूटते संयुक्त परिवार भी बच्चे कम पैदा होने की एक वजह हैं. पति-पत्नी के कामकाजी होने की वजह से बच्चों की देखभाल एक बड़ी समस्या बनती जा रही है."

विशेषज्ञों के मुताबिक, कुछ दंपति पारिवारिक और आर्थिक दिक्कतों के कारण मजबूरी में बच्चे नहीं पैदा करने का फैसला करते हैं तो कुछ आपसी सहमति से. इसके अलावा शिशुओं की मृत्यु दर में गिरावट का भी प्रजनन दर पर असर पड़ा है.

इन विशेषज्ञों का कहना था कि मिसाल के तौर पर बिहार में महिलाओं में साक्षरता की कमी और शिशुओं की मृत्यु दर ज्यादा है वहां प्रजनन दर भी देश में सबसे ज्यादा है. इसके उलट शिक्षा तक बेहतर पहुंच और शिशुओं की मृत्यु दर कम होने के कारण राजधानी दिल्ली में प्रजनन दर महज 1.2 प्रति महिला है. केरल और तमिलनाडु जैसे साक्षर राज्यों में भी यह दर 1.3 ही है.

भारत: डिजिटल जनगणना के डेटा का राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल का सता रहा डर

वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जनसंख्या विस्फोट के खतरों से आगाह किया था. लेकिन उसके करीब तीन साल बाद से ही प्रजनन दर में तेजी से गिरावट के लक्षण नजर आने लगे थे. हालांकि अप्रैल, 2023 में देश आबादी के लिहाज से चीन को पछाड़ कर पहले स्थान पर पहुंच गया था.

लेकिन अब ताजा आंकड़ों ने इस समस्या की गंभीरता को उजागर करते हुए सरकार और नीति निर्धारकों की चिंता बढ़ा दी है. विशेषज्ञों का कहना है कि प्रजनन दर में यह गिरावट तमाम पूर्वानुमानों से तेज है.

बुजुर्गों की संख्या बढ़ने का अंदेशा

यूनाइटेड नेशंस पापुलेशन फंड (यूएनएफपीए) के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2005 में भारत का आबादी डेमोग्राफिक डिविडेंड यानी जनसांख्यिकीय लाभांश वाले चरण में पहुंची थी. यह उस दौर का कहाजात है जिसमें 15 से 64 साल तक के कामकाजी लोगों की संख्या बुजुर्गों और बच्चों की की संख्या से ज्यादा थी. यह अनुपात वर्ष 2055 तक जारी रहने की उम्मीद है.

समाजशास्त्रियों का कहना है कि सिंगापुर, हॉन्ग कॉन्ग और जापान जैसे देश साठ के दशक में ही इस दौर में पहुंच गए थे जबकि चीन में यह दौर अस्सी के दशक में शुरू हुआ. उसके बाद इन देशों की अर्थव्यवस्था में तेजी से प्रगति हुई. भारत में भी अर्थव्यवस्था पर इसका असर नजर आने लगा है. लेकिन चीन के मुकाबले यहां बेरोजगारी दर ज्यादा है और अब भी यह पूरी तरह विकसित अर्थव्यवस्था नहीं बन सकी है. अब प्रजनन दर में गिरावट के कारण भारत को शायद इस डेमोग्राफिक डिविडेंड का पूरा फायदा नहीं मिल सके.

लीना गांगुली कहती हैं, "प्रजनन दर में तेजी से गिरावट जारी रहने की स्थिति में आगामी तीन-चार दशकों में देश में बुजुर्गों की संख्या कामकाजी लोगों के मुकाबले ज्यादा हो जाएगी."

फिलहाल राज्यों के स्तर पर हो रही हैं कोशिशें

केंद्र सरकार ने फिलहाल प्रजनन दर में इस गिरावट पर अंकुश लगाने के लिए किसी ठोस राष्ट्रीय नीति का एलान नहीं किया है. लेकिन कई राज्यों ने अपने स्तर पर इस दिशा में शुरुआत की है. लोगों को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए बढ़ावा देने की खातिर आंध्र प्रदेश सरकार ने तीसरे बच्चे के जन्म के बाद दंपत्ति को तीस हजार और चौथे बच्चे के जन्म के बाद 40 हजार रुपए देने का एलान किया है. राज्य में प्रजनन दर 1.4 है. आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और गोवा जैसे राज्यों ने पहली बार माता-पिता बनने के इच्छुक दंपति के लिए सरकारी खर्च से आईवीएफ केंद्र खोले हैं.

राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती डीडब्ल्यू से कहते हैं, अगर देश को प्रजनन दर में गिरावट के कारण पैदा होने वाली समस्याओं से प्रभावी तरीके से निपटना है तो अभी से इस दिशा में ठोस पहल करनी होगी. अगर अगले तीन-चार दशकों में बुजुर्गों की संख्या बढ़ने की संभावना है तो उनकी मदद के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनानी होगी. उनके मुताबिक, इनमें उनके लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, पेंस और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी देने वाली योजनाएं शामिल की जा सकती हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि देश की आबादी अब भी बढ़ रही है. 'द लांसेट' में छपी वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट आफ हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2048 में भारत की आबादी बढ़ कर अधिकतम 1.6 अरब तक पहुंच जाएगी. लेकिन उसके बाद वर्ष 2100 में यह एक अरब से महज कुछ ही ज्यादा रहेगी. चक्रवर्ती कहते हैं, "प्रजनन दर में गिरावट के दूरगामी नतीजे होंगे. अगर इससे पैदा होने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए समय रहते ठोस उपाय नहीं किए गए तो देश को गंभीर समस्याओं से जूझना पड़ सकता है."

विशेषज्ञों के मुताबिक, दक्षिण कोरिया, चीन, जापान, हंगरी, ताइवान, रूस और ग्रीस जैसे देशों में घटती प्रजनन दर और बूढ़ी होती आबादी से निपटने के लिए लोगों को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं. भारत को भी इसी तर्ज पर राष्ट्रीय नीति बना बनाकरकर उसे जमीन पर लागू करने की दिशा में ठोस पहल करनी होगी.


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it