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जनरल मनोज नरवणे की नई किताब आई, सैन्य मिथकों और रहस्यों से उठाया पर्दा
यह पुस्तक भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना के उन पहलुओं पर प्रकाश डालती है, जिन पर आमतौर पर कम चर्चा होती है। जनरल नरवणे ने इसमें उन मिथकों, किंवदंतियों और घटनाओं को समेटने की कोशिश की है, जो वर्षों से सैन्य परंपराओं का हिस्सा रही हैं, लेकिन आम जनता के बीच कम जानी जाती हैं।

नई दिल्ली: पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे एक बार फिर अपनी नई पुस्तक को लेकर सुर्खियों में हैं। हाल ही में उनके अप्रकाशित और विवादित संस्मरण “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी” को लेकर राजनीतिक और रणनीतिक हलकों में काफी हलचल मची थी। अब उनकी नई किताब “द क्यूरियस एंड द क्लासीफाइड: अनअर्थिंग मिलिट्री मिथ्स एंड मिस्ट्रीज” सामने आई है, जिसमें उन्होंने भारतीय सशस्त्र बलों से जुड़ी कई दिलचस्प, कम चर्चित और रहस्यमयी कहानियों को उजागर किया है।
मिथकों, किंवदंतियों और घटनाओं को समेटने की कोशिशयह पुस्तक भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना के उन पहलुओं पर प्रकाश डालती है, जिन पर आमतौर पर कम चर्चा होती है। जनरल नरवणे ने इसमें उन मिथकों, किंवदंतियों और घटनाओं को समेटने की कोशिश की है, जो वर्षों से सैन्य परंपराओं का हिस्सा रही हैं, लेकिन आम जनता के बीच कम जानी जाती हैं। पुस्तक को एक तरह से सशस्त्र बलों के “अनदेखे और अनसुने” पक्ष की झलक के रूप में देखा जा रहा है।दिलचस्प संयोगजनरल नरवणे के अनुसार, इस पुस्तक का विचार उन्हें एक दिलचस्प संयोग से आया। उन्होंने बताया कि करीब दो साल पहले वे एक मित्र के घर गए थे, जहाँ उनकी नजर शशि थरूर की किताब “ए वंडरलैंड ऑफ वर्ड्स” पर पड़ी। उस पुस्तक ने उन्हें प्रेरित किया कि वे भी भारतीय सैन्य जगत की अनोखी और रोचक कहानियों को एकत्र कर पाठकों के सामने प्रस्तुत करें। इसी प्रेरणा से इस नई पुस्तक का जन्म हुआ।अनुभवों और परंपराओं का दस्तावेज“द क्यूरियस एंड द क्लासीफाइड” केवल सैन्य घटनाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि यह उन अनुभवों और परंपराओं का दस्तावेज भी है, जो समय के साथ सैन्य संस्कृति का हिस्सा बन गई हैं। इसमें कई ऐसे किस्से शामिल हैं, जो कभी आधिकारिक तौर पर दर्ज नहीं हुए, लेकिन सैनिकों के बीच पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाए जाते रहे हैं। इस तरह यह पुस्तक इतिहास, अनुभव और लोककथाओं का एक अनोखा मिश्रण प्रस्तुत करती है।पुस्तक की एक खास बात यह है कि यह गंभीर विषयों को भी सरल और रोचक तरीके से प्रस्तुत करती है। जनरल नरवणे ने अपने अनुभव और दृष्टिकोण के आधार पर इन कथाओं को इस तरह पिरोया है कि पाठक न केवल जानकारी प्राप्त करते हैं, बल्कि उन्हें पढ़ने में भी आनंद आता है। इसमें कुछ घटनाएं हैरान करने वाली हैं, तो कुछ बेहद प्रेरणादायक और कुछ हल्के-फुल्के अंदाज में मनोरंजक भी।राजनीतिक गलियारों में बहसइस नई किताब के प्रकाशन से पहले ही जनरल नरवणे अपने अप्रकाशित संस्मरण “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी” को लेकर चर्चा में थे। उस पुस्तक के कुछ अंशों ने राजनीतिक गलियारों में बहस छेड़ दी थी, क्योंकि उसमें कई संवेदनशील मुद्दों का उल्लेख किया गया था। हालांकि वह पुस्तक अभी तक औपचारिक रूप से प्रकाशित नहीं हुई है, लेकिन उसके इर्द-गिर्द बनी चर्चा ने नरवणे को एक बार फिर केंद्र में ला दिया था।सैन्य जीवन के विविध पहलू
अब उनकी नई पुस्तक को एक अलग दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। जहाँ उनका संस्मरण अधिक व्यक्तिगत और अनुभव-आधारित माना जा रहा था, वहीं “द क्यूरियस एंड द क्लासीफाइड” एक व्यापक और हल्के-फुल्के अंदाज में सैन्य जीवन के विविध पहलुओं को प्रस्तुत करती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जनरल नरवणे केवल एक सैन्य अधिकारी ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील लेखक के रूप में भी अपनी पहचान बना रहे हैं।जनरल मनोज नरवणे ने दिसंबर 2019 से अप्रैल 2022 तक भारतीय सेना के 28वें प्रमुख के रूप में सेवा दी। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण सैन्य और रणनीतिक चुनौतियों का सामना किया। उनके नेतृत्व को पेशेवर और संतुलित माना जाता है, और अब सेवानिवृत्ति के बाद वे अपने अनुभवों और विचारों को लेखन के माध्यम से साझा कर रहे हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की पुस्तकें न केवल आम पाठकों को सशस्त्र बलों के बारे में नई जानकारी देती हैं, बल्कि सैन्य जीवन के मानवीय और सांस्कृतिक पहलुओं को भी सामने लाती हैं। इससे सेना के प्रति लोगों की समझ और सम्मान दोनों बढ़ते हैं।
जनरल नरवणे के अनुसार, इस पुस्तक का विचार उन्हें एक दिलचस्प संयोग से आया। उन्होंने बताया कि करीब दो साल पहले वे एक मित्र के घर गए थे, जहाँ उनकी नजर शशि थरूर की किताब “ए वंडरलैंड ऑफ वर्ड्स” पर पड़ी। उस पुस्तक ने उन्हें प्रेरित किया कि वे भी भारतीय सैन्य जगत की अनोखी और रोचक कहानियों को एकत्र कर पाठकों के सामने प्रस्तुत करें। इसी प्रेरणा से इस नई पुस्तक का जन्म हुआ।
अनुभवों और परंपराओं का दस्तावेज“द क्यूरियस एंड द क्लासीफाइड” केवल सैन्य घटनाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि यह उन अनुभवों और परंपराओं का दस्तावेज भी है, जो समय के साथ सैन्य संस्कृति का हिस्सा बन गई हैं। इसमें कई ऐसे किस्से शामिल हैं, जो कभी आधिकारिक तौर पर दर्ज नहीं हुए, लेकिन सैनिकों के बीच पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाए जाते रहे हैं। इस तरह यह पुस्तक इतिहास, अनुभव और लोककथाओं का एक अनोखा मिश्रण प्रस्तुत करती है।पुस्तक की एक खास बात यह है कि यह गंभीर विषयों को भी सरल और रोचक तरीके से प्रस्तुत करती है। जनरल नरवणे ने अपने अनुभव और दृष्टिकोण के आधार पर इन कथाओं को इस तरह पिरोया है कि पाठक न केवल जानकारी प्राप्त करते हैं, बल्कि उन्हें पढ़ने में भी आनंद आता है। इसमें कुछ घटनाएं हैरान करने वाली हैं, तो कुछ बेहद प्रेरणादायक और कुछ हल्के-फुल्के अंदाज में मनोरंजक भी।राजनीतिक गलियारों में बहसइस नई किताब के प्रकाशन से पहले ही जनरल नरवणे अपने अप्रकाशित संस्मरण “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी” को लेकर चर्चा में थे। उस पुस्तक के कुछ अंशों ने राजनीतिक गलियारों में बहस छेड़ दी थी, क्योंकि उसमें कई संवेदनशील मुद्दों का उल्लेख किया गया था। हालांकि वह पुस्तक अभी तक औपचारिक रूप से प्रकाशित नहीं हुई है, लेकिन उसके इर्द-गिर्द बनी चर्चा ने नरवणे को एक बार फिर केंद्र में ला दिया था।सैन्य जीवन के विविध पहलू
अब उनकी नई पुस्तक को एक अलग दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। जहाँ उनका संस्मरण अधिक व्यक्तिगत और अनुभव-आधारित माना जा रहा था, वहीं “द क्यूरियस एंड द क्लासीफाइड” एक व्यापक और हल्के-फुल्के अंदाज में सैन्य जीवन के विविध पहलुओं को प्रस्तुत करती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जनरल नरवणे केवल एक सैन्य अधिकारी ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील लेखक के रूप में भी अपनी पहचान बना रहे हैं।जनरल मनोज नरवणे ने दिसंबर 2019 से अप्रैल 2022 तक भारतीय सेना के 28वें प्रमुख के रूप में सेवा दी। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण सैन्य और रणनीतिक चुनौतियों का सामना किया। उनके नेतृत्व को पेशेवर और संतुलित माना जाता है, और अब सेवानिवृत्ति के बाद वे अपने अनुभवों और विचारों को लेखन के माध्यम से साझा कर रहे हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की पुस्तकें न केवल आम पाठकों को सशस्त्र बलों के बारे में नई जानकारी देती हैं, बल्कि सैन्य जीवन के मानवीय और सांस्कृतिक पहलुओं को भी सामने लाती हैं। इससे सेना के प्रति लोगों की समझ और सम्मान दोनों बढ़ते हैं।
इस नई किताब के प्रकाशन से पहले ही जनरल नरवणे अपने अप्रकाशित संस्मरण “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी” को लेकर चर्चा में थे। उस पुस्तक के कुछ अंशों ने राजनीतिक गलियारों में बहस छेड़ दी थी, क्योंकि उसमें कई संवेदनशील मुद्दों का उल्लेख किया गया था। हालांकि वह पुस्तक अभी तक औपचारिक रूप से प्रकाशित नहीं हुई है, लेकिन उसके इर्द-गिर्द बनी चर्चा ने नरवणे को एक बार फिर केंद्र में ला दिया था।
सैन्य जीवन के विविध पहलू
अब उनकी नई पुस्तक को एक अलग दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। जहाँ उनका संस्मरण अधिक व्यक्तिगत और अनुभव-आधारित माना जा रहा था, वहीं “द क्यूरियस एंड द क्लासीफाइड” एक व्यापक और हल्के-फुल्के अंदाज में सैन्य जीवन के विविध पहलुओं को प्रस्तुत करती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जनरल नरवणे केवल एक सैन्य अधिकारी ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील लेखक के रूप में भी अपनी पहचान बना रहे हैं।
जनरल मनोज नरवणे ने दिसंबर 2019 से अप्रैल 2022 तक भारतीय सेना के 28वें प्रमुख के रूप में सेवा दी। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण सैन्य और रणनीतिक चुनौतियों का सामना किया। उनके नेतृत्व को पेशेवर और संतुलित माना जाता है, और अब सेवानिवृत्ति के बाद वे अपने अनुभवों और विचारों को लेखन के माध्यम से साझा कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की पुस्तकें न केवल आम पाठकों को सशस्त्र बलों के बारे में नई जानकारी देती हैं, बल्कि सैन्य जीवन के मानवीय और सांस्कृतिक पहलुओं को भी सामने लाती हैं। इससे सेना के प्रति लोगों की समझ और सम्मान दोनों बढ़ते हैं।
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