Re-NEET से पहले टेलीग्राम बैन पर सोशल मीडिया पर IIT-K के डायरेक्टर से भिड़े सार्थक सिद्धांत और निसर्ग अधिकारी
18 वर्षीय सार्थक सिद्धांत ने पूरे प्लेटफॉर्म को बंद करने की आवश्यकता पर सवाल उठाया। उनका कहना था कि यदि किसी माध्यम के जरिए गलत जानकारी फैलने की संभावना है तो क्या उसी आधार पर उसे बंद कर देना उचित है।

कानपुर : राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET-UG) 2026 के निरस्त होने के बाद राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) ने 21 जून को पुनर्परीक्षा कराने का फैसला किया है। परीक्षा की निष्पक्षता बनाए रखने और पेपर लीक से जुड़ी अफवाहों तथा भ्रामक दावों को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने 22 जून तक मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम की सेवाओं पर अस्थायी रोक लगाने का निर्णय लिया है। सरकार का कहना है कि यह कदम गलत सूचनाओं के प्रसार को रोकने और परीक्षार्थियों के बीच भ्रम की स्थिति से बचने के उद्देश्य से उठाया गया है।
एनटीए के पोस्ट के बाद शुरू हुई बहस
टेलीग्राम पर प्रतिबंध की जानकारी एनटीए की ओर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा की गई। इसके बाद इंटरनेट मीडिया पर इस फैसले को लेकर बहस शुरू हो गई। इस चर्चा में आईआईटी कानपुर के निदेशक प्रो. मणीन्द्र अग्रवाल, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ निसर्ग अधिकारी और युवा तकनीकी शोधकर्ता सार्थक सिद्धांत के बीच कई मुद्दों पर मतभेद सामने आए।
निसर्ग ने उठाए प्रतिबंध की प्रभावशीलता पर सवाल
खुद को एथिकल हैकर बताने वाले निसर्ग अधिकारी ने कहा कि टेलीग्राम को पूरी तरह बंद करना तकनीकी रूप से आसान नहीं है। उनके अनुसार, उपयोगकर्ता प्रॉक्सी और अन्य विकल्पों की मदद से इस प्लेटफॉर्म तक पहुंच बना सकते हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर टिप्पणी करते हुए कहा कि पेपर लीक को रोकने में असफल रहने के बाद अब टेलीग्राम को बंद करना समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि इसकी प्रभावशीलता सीमित हो सकती है।
प्रो. मणीन्द्र अग्रवाल ने बताया प्रतिबंध का कारण
निसर्ग अधिकारी की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए आईआईटी कानपुर के निदेशक प्रो. मणीन्द्र अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि चिंता केवल लीक हुए प्रश्नपत्रों को साझा करने की नहीं है, बल्कि उनसे जुड़ी झूठी सूचनाओं के प्रसार की भी है। उन्होंने कहा कि कई बार फर्जी पेपर या गलत दावों को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि वे वास्तविक प्रतीत होते हैं, जिससे छात्रों के बीच भ्रम पैदा होता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जेईई एडवांस्ड के दौरान भी इस तरह की स्थिति सामने आई थी।
सार्थक ने अभिव्यक्ति और प्रतिबंध पर उठाए सवाल
18 वर्षीय सार्थक सिद्धांत ने पूरे प्लेटफॉर्म को बंद करने की आवश्यकता पर सवाल उठाया। उनका कहना था कि यदि किसी माध्यम के जरिए गलत जानकारी फैलने की संभावना है तो क्या उसी आधार पर उसे बंद कर देना उचित है। उन्होंने पूछा कि क्या व्हाट्सएप या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर गलत सूचनाएं नहीं फैलतीं और क्या इसी तर्क के आधार पर उन पर भी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।
एडिट फीचर को लेकर भी हुई बहस
प्रो. अग्रवाल ने कहा कि टेलीग्राम में ऐसा फीचर मौजूद है, जिससे पोस्ट को बिना स्पष्ट संकेत छोड़े संपादित किया जा सकता है और इसका दुरुपयोग कर फर्जी लीक की सामग्री को वास्तविक रूप दिया जा सकता है। हालांकि, सार्थक सिद्धांत ने स्क्रीनशॉट साझा करते हुए दावा किया कि टेलीग्राम पर संपादित संदेशों के साथ 'Edited' का संकेत दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि इस संबंध में दी जा रही जानकारी पूरी तरह सही नहीं है और गलत सूचना फैलाने के आधार पर किसी मंच को बंद करना उचित समाधान नहीं माना जा सकता।
दोनों युवा विशेषज्ञ हाल में जुड़े हैं IITआईआईटी कानपुर से
निसर्ग अधिकारी हाल ही में आईआईटी कानपुर के साइबर सिक्योरिटी एंड साइबर डिफेंस इनोवेशन सेंटर (C3iHub) से अनुबंध के आधार पर ओएसआईएनटी और थ्रेट इंटेलिजेंस इंजीनियर के रूप में जुड़े हैं। वहीं, सार्थक सिद्धांत उन छात्रों में शामिल रहे हैं जिन्होंने सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली में कथित खामियों की ओर ध्यान आकर्षित किया था। उनकी तकनीकी समझ और शोध क्षमता से प्रभावित होकर आईआईटी कानपुर ने उन्हें भी अपने साथ काम करने का अवसर दिया।
परीक्षा सुरक्षा और डिजिटल स्वतंत्रता के बीच संतुलन पर चर्चा
टेलीग्राम पर अस्थायी प्रतिबंध के फैसले ने परीक्षा सुरक्षा और डिजिटल स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। एक पक्ष इसे गलत सूचनाओं को रोकने के लिए आवश्यक कदम मान रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे तकनीकी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दृष्टिकोण से चुनौतीपूर्ण मान रहा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और व्यापक चर्चा का विषय बन सकता है।


