यूपीआई में बदलाव को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस में टकराव
कांग्रेस का आरोप, यूपीआई चार्ज से अमेरिकी कंपनियों का फायदा

कांग्रेस का आरोप है कि यूपीआई लेनदेन पर लगने वाले चार्ज से गूगल पे और फोन पे जैसी अमेरिकी कंपनियों को फायदा होगा. वहीं, सरकार का कहना है कि इससे होने वाली कमाई पेमेंट ईकोसिस्टम के सभी हिस्सेदारों में बांटी जाएगी.
भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने बीजेपी शासित केंद्र सरकार पर अमेरिका के सामने झुकने का आरोप लगाया है. कांग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि 2,000 रुपये से ऊपर के मर्चेंट यूपीआई पेमेंट पर जो चार्ज लगाया गया है, उसका सबसे ज्यादा फायदा फोन पे, गूगल पे और अमेजन पे को होगा, जो अमेरिकी कंपनियों से जुड़े पेमेंट प्लेटफॉर्म हैं.
सुप्रिया श्रीनेत ने दावा किया, अमेरिका की पेमेंट कंपनियां लगातार भारत की जीरो एमडीआर नीति का विरोध करती रही हैं, जिनके सामने नरेंद्र मोदी ने सरेंडर कर दिया है. उनके मुताबिक, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि की 2026 की रिपोर्ट में भारत की यूपीआई और रू-पे के मुफ्त होने की आलोचना की गई थी और कहा गया कि इससे अमेरिका के वीजा और मास्टरकार्ड का नुकसान हो रहा है.
सरकार का दावा, 96 फीसदी मर्चेंट ट्रांजेक्शनों पर नहीं होगा असर
नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) की ओर से 15 सितंबर को एलान किया गया कि 2,000 रुपये से ऊपर के पर्सन-टू-मर्चेंट लेन-देनों पर 0.4 फीसदी मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगेगा. उदाहरण के लिए 5,000 रुपये का लेनदेन करने पर 20 रुपये लगेंगे. यह नियम 15 अक्टूबर, 2026 से लागू होगा और इसके तहत प्रति लेन देन अधिकतम 300 रुपये वसूले जा सकेंगे.
इस मामले में वित्त मंत्रालय ने एक प्रेस रिलीज जारी कर कहा है कि एमडीआर सरकार या एनपीसीआई द्वारा वसूला जाने वाला कोई टैक्स या चार्ज नहीं है. सरकार के मुताबिक, इससे मिलने वाले राजस्व को पेमेंट ईकोसिस्टम के भागीदारों जैसे बैंकों और पेमेंट ऐप्लिकेशन प्रोवाइडरों के बीच बांटा जाता है ताकि यूपीआई इकोसिस्टम के संचालन और निरंतर विस्तार में मदद की जा सके.
वित्त मंत्रालय ने कहा है कि आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि यह एमडीआर केवल लगभग चार फीसदी मर्चेंट लेनदेन पर लागू होगा. इसके दो कारण बताए गए हैं. पहला- 2000 रुपये तक के मर्चेंट लेनदेनों पर एमडीआर नहीं लगेगा. दूसरा- स्ट्रीट वेंडर जैसे छोटे व्यापारी जिन्हें हर महीने यूपीआई के जरिए एक लाख रुपये तक मिलते हैं, उन पर भी कोई एमडीआर नहीं लगेगा.
व्यापारी या ग्राहक: किस पर पड़ेगा एमडीआर का बोझ
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने दावा किया है कि यूपीआई पर लगने वाले एमडीआर की वसूली देश के युवाओं, गरीबों, छात्रों, मजदूरों और महिलाओं से की जाएगी. वहीं, बीजेपी का दावा है कि आम नागरिक को कुछ नहीं देना होगा. बीजेपी का कहना है कि एमडीआर बड़े लेनदेनों पर व्यापारियों से लिया जाने वाला चार्ज है, जो यूपीआई ईकोसिस्टम की मदद करता है. कांग्रेस ने बीजेपी के इस तर्क को सरकार का झुनझुना बताया है.
पार्टी ने लिखा, सरकार एक झुनझुना पकड़ा रही है कि इसका असर किसी ग्राहक पर नहीं, बल्कि मर्चेंट पर पड़ेगा. लेकिन हम सब जानते हैं कि कोई भी मर्चेंट बढ़े हुए खर्च को नहीं झेलेगा. आखिर में मर्चेंट सामानों की कीमत बढ़ा देगा और ग्राहक से पैसा वसूला जाएगा. वहीं, वित्त मंत्रालय ने कहा है कि बैंकों को यह निर्देश दिया गया है कि व्यापारी एमडीआर का बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल सकते.
यूपीआई पर हर कितना होता है खर्च
यूपीआई से जुड़े इस नए चार्ज को लेकर एनपीसीआई ने सवाल-जवाबों की एक लिस्ट जारी की है. इसमें एनपीसीआई ने लिखा है कि उद्योग के अनुमानों के मुताबिक, यूपीआई पेमेंट ऑपरेशन, सर्वर बैंडविड्थ, धोखाधड़ी रोकने वाले सिस्टम और बैंक टेक्निकल सपोर्ट को बनाए रखने में सालाना लगभग 20,000 करोड़ रुपये का खर्च आता है. एनपीसीआई का कहना है कि सिर्फ सरकारी बजट आवंटन पर निर्भर रहने से फंडिंग को लेकर अनिश्चितता पैदा होती है.
कांग्रेस ने इस मसले पर कहा कि वित्त वर्ष 2025-26 में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने मोदी सरकार को तीन लाख करोड़ रुपये सरप्लस ट्रांसफर किए और इसके महज 7.2 फीसदी हिस्से से पूरा यूपीआई चल जाएगा. कांग्रेस ने इस मामले में मोदी सरकार पर झूठ बोलने का भी आरोप लगाया है. श्रीनेत ने कहा, 6 अगस्त को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि "एमडीआर पर कोई निर्णय नहीं लिया गया" और 14 सितंबर को नोटिफिकेशन निकाल कर एमडीआर चार्ज लगा दिया गया.
इस बीच सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर एमडीआर लगाने के फैसले को चुनौती दी गई है. याचिका में कहा गया है कि इन आधिकारिक दावों के बावजूद कि व्यापारी इस लागत का बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल सकते, यह फीस अनिवार्य रूप से मूल्य संरचना में शामिल हो जाएगी जिससे वर्किंग कैपिटल घटेगी और व्यापारियों की ओर से यूपीआई भुगतान से इनकार किए जाने की शुरुआत हो सकती है. याचिकाकर्ता ने एमडीआर लगाने के फैसले को रद्द करने की मांग की है.


