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बेल नियम जेल अपवाद, UAPA में भी लागू...उमर खालिद मामले में बड़ी बेंच की अनदेखी पर सुप्रीम कोर्ट

अदालत ने दोहराया कि गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA की धारा 43D(5) का उपयोग किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक जेल में रखने के लिए नहीं किया जा सकता। पीठ ने कहा कि “बेल नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत आतंकवाद और गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में भी लागू होता है।

बेल नियम जेल अपवाद, UAPA में भी लागू...उमर खालिद मामले में बड़ी बेंच की अनदेखी पर सुप्रीम कोर्ट
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नई दिल्ली। Umar Khalid Case: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों से जुड़े एक मामले में उमर खालिद को जमानत न देने के अपने ही पुराने फैसले की समीक्षा के दौरान महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि पहले दिए गए आदेश में सर्वोच्च अदालत की बड़ी बेंच के स्थापित सिद्धांतों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने स्पष्ट किया कि “बेल नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत केवल सामान्य मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह UAPA जैसे कड़े कानूनों पर भी लागू होता है।

बड़ी बेंच के फैसले को कमजोर नहीं कर सकती छोटी बेंच

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में न्यायिक व्यवस्था के भीतर बेंच संरचना को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि छोटी बेंच किसी बड़ी बेंच के निर्णय को न तो कमजोर कर सकती है और न ही उससे अलग जा सकती है। यदि किसी फैसले को लेकर असहमति हो, तो उसे केवल भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के समक्ष भेजकर बड़ी बेंच के गठन का अनुरोध किया जा सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि बड़ी बेंच द्वारा दिए गए फैसले सभी निचली और समान स्तर की बेंचों पर बाध्यकारी होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के सामने मामला क्या था

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2021 में नजीब केस में दी गई व्यवस्था आज भी लागू और बाध्यकारी कानून है। इसका मतलब यह है कि अगर कोई ट्रायल के इतंजार में लंबे वक्त से जेल में बंद है तो उसे जमानत मिल सकती है। UAPA के तहत जमानत की सख्त शर्तों का प्रावधान होने के चलते उसे जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता, निचली अदालतें, हाई कोर्ट, या सुप्रीम कोर्ट की छोटी बेंचें भी इस फैसले को कमजोर या नजरअंदाज नहीं कर सकती, सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी नार्को-टेररिज्म के आरोप में UAPA के तहत दर्ज केस में पिछले 5 साल से जेल में बंद सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत देते हुए की।

UAPA मामलों में भी लागू होगा जमानत का सिद्धांत

अदालत ने दोहराया कि गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA की धारा 43D(5) का उपयोग किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक जेल में रखने के लिए नहीं किया जा सकता। पीठ ने कहा कि “बेल नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत आतंकवाद और गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में भी लागू होता है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि केवल आरोपों के आधार पर जमानत से लगातार इनकार किया जाता रहा, तो यह विचाराधीन हिरासत को सजा में बदल सकता है, जो संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ है।

लंबी हिरासत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक ट्रायल लंबित रहने और आरोपी के वर्षों तक जेल में रहने की स्थिति में अदालतों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता देनी चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है, और इसे UAPA जैसे कानूनों के साथ संतुलित तरीके से लागू किया जाना चाहिए।

एक अन्य मामले में जमानत पर अहम टिप्पणी

इसी क्रम में अदालत ने नारको-टेरर से जुड़े एक अन्य मामले में भी महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। आरोपी पिछले पांच वर्षों से हिरासत में था और उस पर गंभीर आरोप लगाए गए थे। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और UAPA के प्रावधानों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।

NCRB आंकड़ों का हवाला

जस्टिस उज्जल भुइयां ने अपने फैसले में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों का हवाला देते हुए UAPA मामलों की स्थिति पर गंभीर चिंता जताई। आंकड़ों के अनुसार, 2019 से 2023 के बीच UAPA मामलों में दोषसिद्धि दर केवल 1.5% से 4% के बीच रही है। वहीं कई वर्षों में यह दर इससे भी कम दर्ज की गई। जम्मू-कश्मीर के मामलों में 2019 में दोषसिद्धि दर शून्य रही, जबकि 2022 में यह अधिकतम 0.89% तक पहुंची।

बड़ी संख्या में आरोपी होते हैं बरी

कोर्ट ने यह भी कहा कि UAPA मामलों में 94% से 98% तक आरोपी अंततः बरी हो जाते हैं। जम्मू-कश्मीर में यह आंकड़ा लगभग 99% तक पहुंच जाता है। इस संदर्भ में अदालत ने कहा कि इतने कम दोषसिद्धि अनुपात के बावजूद लंबे समय तक हिरासत में रखना गंभीर सवाल खड़े करता है।

विचाराधीन हिरासत बन रही सजा

सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि अदालतें केवल प्रारंभिक आरोपों के आधार पर जमानत से इनकार करती रहीं, तो विचाराधीन कैद एक प्रकार की सजा बन सकती है। अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रणाली को यह सुनिश्चित करना होगा कि जांच और ट्रायल में देरी के कारण किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन न हो।

संवैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता देने की जरूरत

अंत में सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि देश की न्याय प्रणाली में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुरक्षा कानूनों के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। कोर्ट ने संकेत दिया कि गंभीर आरोपों के मामलों में भी अदालतों को संवैधानिक अधिकारों और न्यायिक सिद्धांतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

क्या है सुप्रीम कोर्ट के अलग-अलग बेंच की राय

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली दंगों के मामल में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया की बेंच ने 2021 में दिए तीन जजों की बेंच के फैसले में दी गई व्यवस्था का पालन नहीं किया। 2021 में केंद्र सरकार बनाम के ए नजीब केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ट्रायल में देरी UAPA के तहत दर्ज केस में भी जमानत का आधार बन सकती है। लेकिन इस साल जनवरी में जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली बेंच ने उमर खालिद और शरजील इमाम को यह कहते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया था कि सिर्फ जेल में लंबे वक्त तक रहने के चलते कोई जमानत का हकदार नहीं हो जाता, बेंच ने यह भी कहा था कि नजीब केस में दी गई व्यवस्था सिर्फ असाधारण मामलों में ही लागू होती है।

'त्वरित सुनवाई का अधिकार खत्म नहीं किया जा सकता'

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि किसी आरोपी का त्वरित सुनवाई का संवैधानिक अधिकार केवल इसलिए खत्म नहीं किया जा सकता क्योंकि उस पर यूएपीए जैसा सख्त कानून लगाया गया है। पीठ ने कहा कि लंबे समय तक मुकदमा लंबित रहने की स्थिति में अदालतों को आरोपी के मौलिक अधिकारों पर भी ध्यान देना चाहिए।


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