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हिजाब विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर असदुद्दीन ओवैसी भड़के, आदेश को बताया इस्लाम पर हमला

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि छात्रा ऐसा कोई धार्मिक ग्रंथ या अन्य प्रमाण पेश नहीं कर सकी, जिससे यह साबित हो कि सिर पर स्कार्फ या हिजाब पहनना उसके धर्म का ऐसा अनिवार्य हिस्सा है, जिसके बिना उसकी धार्मिक आस्था प्रभावित होगी।

हिजाब विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर असदुद्दीन ओवैसी भड़के, आदेश को बताया इस्लाम पर हमला
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नई दिल्ली। Hijab controversy: प्रयागराज के एक स्कूल में हिजाब पहनने को लेकर सामने आए विवाद पर एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। हाई कोर्ट ने स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की अनुमति मांगने वाली नाबालिग छात्रा की याचिका खारिज कर दी थी। ओवैसी ने मंगलवार को इस फैसले को संविधान में दिए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ बताते हुए कहा कि वह अदालत के आदेश से सहमत नहीं हैं। दारुस्सलाम स्थित एआईएमआईएम मुख्यालय में आयोजित ‘जलसा-ए-रहमतुल-लिल-आलमीन’ कार्यक्रम में बोलते हुए ओवैसी ने कहा कि स्कूल में हिजाब पहनने के मुद्दे पर अदालत को धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में विचार करना चाहिए था। उन्होंने इसे ‘इस्लाम पर हमला’ तक बताया।

ओवैसी ने अनुच्छेद 25 और 19 का दिया हवाला

ओवैसी ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 19 नागरिकों को धार्मिक आस्था और अभिव्यक्ति से जुड़े अधिकार प्रदान करते हैं। उनके मुताबिक, यह तय करना अदालत का विषय नहीं होना चाहिए कि किसी धर्म में कौन-सी प्रथा कितनी जरूरी है। उन्होंने सबरीमाला मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि धार्मिक प्रथाओं की अनिवार्यता से जुड़ा सवाल सुप्रीम कोर्ट के सामने विचाराधीन है। ओवैसी ने सवाल उठाया कि जब इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है, तब हाई कोर्ट को इस तरह का फैसला नहीं देना चाहिए था।

हाई कोर्ट ने क्यों खारिज की छात्रा की याचिका?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि छात्रा ऐसा कोई धार्मिक ग्रंथ या अन्य प्रमाण पेश नहीं कर सकी, जिससे यह साबित हो कि सिर पर स्कार्फ या हिजाब पहनना उसके धर्म का ऐसा अनिवार्य हिस्सा है, जिसके बिना उसकी धार्मिक आस्था प्रभावित होगी। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि संबंधित समुदाय के कुछ अन्य छात्र तस्वीरों में बिना स्कार्फ के नजर आए। कोर्ट के मुताबिक, केवल धार्मिक पहचान के आधार पर स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म में बदलाव की मांग को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

स्कूल ड्रेस कोड को लेकर अदालत की अहम टिप्पणी

जस्टिस जे.जे. मुनीर और इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि यदि किसी स्कूल का ड्रेस कोड सभी छात्रों पर समान रूप से लागू होता है, भेदभावपूर्ण नहीं है और उसका उद्देश्य अनुशासन तथा संस्थान की एकरूप पहचान बनाए रखना है, तो यूनिफॉर्म निर्धारित करना मुख्य रूप से स्कूल के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत ने यह भी कहा कि छात्रा का पहले की कक्षाओं में स्कार्फ पहनना अपने आप में ऐसा कानूनी अधिकार नहीं बनाता, जिसके आधार पर वह स्कूल की मौजूदा यूनिफॉर्म नीति में बदलाव की मांग कर सके।

कक्षा 11 में दाखिले के दौरान सामने आया विवाद

मामला उस समय सामने आया जब छात्रा ने इसी स्कूल से कक्षा 10 की पढ़ाई पूरी करने के बाद कक्षा 11 में दाखिले के लिए आवेदन किया। छात्रा का कहना था कि वह कक्षा 6 से स्कूल यूनिफॉर्म के साथ सिर पर स्कार्फ पहनती रही है और तब स्कूल प्रबंधन ने कोई आपत्ति नहीं जताई थी। हालांकि, कक्षा 11 में दाखिले के समय स्कूल प्रशासन ने उसे बताया कि स्कार्फ पहनना निर्धारित ड्रेस कोड के अनुरूप नहीं है। इसके बाद छात्रा को दाखिला नहीं दिया गया। छात्रा ने स्कूल के इस निर्णय को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हिजाब और ड्रेस कोड पर बहस फिर तेज

हाई कोर्ट के फैसले के बाद हिजाब, धार्मिक स्वतंत्रता और शैक्षणिक संस्थानों के ड्रेस कोड को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। एक तरफ अदालत ने संस्थागत अनुशासन और समान यूनिफॉर्म को महत्वपूर्ण माना है, वहीं ओवैसी जैसे नेता इसे धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार से जोड़ रहे हैं। फिलहाल इस मामले में हाई कोर्ट के आदेश पर ओवैसी की प्रतिक्रिया ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। आने वाले समय में यह मुद्दा धार्मिक स्वतंत्रता, स्कूल ड्रेस कोड और संविधान में मिले मौलिक अधिकारों के व्यापक संदर्भ में चर्चा का विषय बना रह सकता है।


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