4 साल में 111 सांसद-विधायकों ने बदली पार्टी, ADR रिपोर्ट में सामने आया दल-बदल का बड़ा आंकड़ा
दलबदल विरोधी कानून में पार्टी विलय के लिए एक महत्वपूर्ण अपवाद मौजूद है। यदि किसी राजनीतिक दल के कम से कम दो-तिहाई विधायक या सांसद किसी दूसरे दल में विलय के पक्ष में हों, तो इसे कानून के तहत दलबदल नहीं माना जाता।

नई दिल्ली: चुनाव जीतने के बाद जनप्रतिनिधियों के राजनीतिक दल बदलने को लेकर एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और नेशनल इलेक्शन वॉच ने एक विस्तृत विश्लेषण जारी किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 से 2026 के बीच लोकसभा, राज्यसभा और विभिन्न विधानसभाओं के चुनाव तथा उपचुनाव जीतने के बाद कुल 111 सांसदों और विधायकों ने अपनी राजनीतिक पार्टी बदली। इनमें 26 लोकसभा सदस्य, सात राज्यसभा सदस्य और 78 विधायक शामिल हैं। रिपोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पार्टी छोड़ने, पार्टी विलय, इस्तीफे के बाद उपचुनाव जीतने और उपचुनाव जीतने के बाद अयोग्यता जैसे मामलों को भी शामिल किया गया है।
नगालैंड और बंगाल में सबसे ज्यादा मामले
राज्यवार आंकड़ों में नगालैंड सबसे आगे रहा। यहां 32 विधायकों के पार्टी बदलने के मामले दर्ज किए गए। पश्चिम बंगाल में 20 लोकसभा सदस्यों के दल बदलने की जानकारी रिपोर्ट में दी गई है। तेलंगाना में विधायकों से जुड़े नौ मामले सामने आए, जबकि गोवा और पंजाब में आठ-आठ मामले दर्ज किए गए। महाराष्ट्र में लोकसभा सदस्यों के पार्टी बदलने के छह मामले सामने आए। दिल्ली में एक राज्यसभा सदस्य के दल बदलने का मामला दर्ज किया गया।
किन दलों को मिला सबसे ज्यादा फायदा?
ADR के विश्लेषण के अनुसार, पार्टी बदलने वाले जनप्रतिनिधियों के नए राजनीतिक दलों का भी विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, NPF को 32 विधायक मिले, जबकि BJP में 29 विधायक शामिल हुए। NCPI को 20 विधायकों के पार्टी बदलने से फायदा हुआ। इसके अलावा कांग्रेस को नौ, शिवसेना को आठ, NPP को छह और पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल को चार विधायक मिलने की जानकारी रिपोर्ट में दी गई है। ADR के मुताबिक, 111 मामलों में से 64 मामलों में NDPP, AITC और कांग्रेस से जुड़े जनप्रतिनिधियों का उल्लेख है। वहीं, NPF, BJP और NCPI से जुड़े दलों ने मिलकर 111 विधायक दल-बदल मामलों में से 81 का प्रतिनिधित्व किया।
सरकारों के गठन और गिरने पर भी असर
रिपोर्ट में हाल के कुछ राजनीतिक पलायनों को विभिन्न विधानसभाओं में सरकारों के गठन और गिरने से भी जोड़ा गया है। हालांकि, ADR ने यह भी स्पष्ट किया है कि देश में विधायकों और सांसदों के पार्टी बदलने का कोई आधिकारिक और केंद्रीकृत डेटाबेस उपलब्ध नहीं है। इसी वजह से ऐसे मामलों की निगरानी और रिकॉर्ड तैयार करने के लिए गैर-सरकारी संस्थाओं के विश्लेषण की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। ADR ने दलबदल विरोधी कानून के मौजूदा ढांचे में बदलाव की भी सिफारिश की है। संगठन ने सुझाव दिया है कि सांसदों की अयोग्यता संबंधी याचिकाओं पर फैसला लेने की शक्ति लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति से हटाकर राष्ट्रपति को दी जाए। विधायकों के मामले में यह अधिकार राज्यपाल को देने का सुझाव दिया गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ऐसे फैसले चुनाव आयोग की सलाह के आधार पर किए जाएं।
क्या है दलबदल विरोधी कानून?
भारत में राजनीतिक दल बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई। इसी के तहत दलबदल विरोधी कानून अस्तित्व में आया। इसके तहत किसी सांसद या विधायक को कुछ परिस्थितियों में अयोग्य ठहराया जा सकता है। मसलन, यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है या पार्टी के निर्देश यानी व्हिप के खिलाफ सदन में मतदान करता है अथवा मतदान से अनुपस्थित रहता है। निर्दलीय सदस्य के चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होने पर भी अयोग्यता का प्रावधान लागू हो सकता है। मनोनीत सदस्य के लिए भी नियम है कि सदन में नामांकन के छह महीने बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होने पर उसे अयोग्यता का सामना करना पड़ सकता है।
दो-तिहाई विलय का प्रावधान कैसे काम करता है?
दलबदल विरोधी कानून में पार्टी विलय के लिए एक महत्वपूर्ण अपवाद मौजूद है। यदि किसी राजनीतिक दल के कम से कम दो-तिहाई विधायक या सांसद किसी दूसरे दल में विलय के पक्ष में हों, तो इसे कानून के तहत दलबदल नहीं माना जाता। 1985 में लागू मूल प्रावधान में यह सीमा एक-तिहाई थी। बाद में 2003 के 91वें संविधान संशोधन के जरिए इसे बढ़ाकर दो-तिहाई कर दिया गया। ADR के विश्लेषण में इस प्रावधान को दलबदल से जुड़े मौजूदा विवादों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया है।
स्पीकर के फैसले और समयसीमा पर सवाल
अयोग्यता के मामलों पर फैसला संबंधित सदन के अध्यक्ष या सभापति के पास होता है। 1992 के किहोतो होलोहन बनाम जाकिल्लू मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अध्यक्ष के फैसले को न्यायिक समीक्षा के दायरे में माना था। दलबदल से जुड़े मामलों में फैसला आने में देरी भी लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। ADR ने अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला लेने के लिए स्पष्ट समयसीमा तय करने और दल बदलने वाले जनप्रतिनिधियों के सार्वजनिक पद संभालने पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की है। रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा लोकसभा में 21 सांसदों से जुड़े अयोग्यता मामले स्पीकर के समक्ष लंबित बताए गए हैं। इनमें TMC के 20 सांसदों से जुड़ा मामला भी शामिल है, जिनके NCPI में शामिल होने और विलय के आधार पर अयोग्यता से बाहर होने के दावे का उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है। यह मामला जून 2026 से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के समक्ष विचाराधीन बताया गया है।


