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एफसीआरए में प्रस्तावित संशोधन का विरोध क्यों?

भारत सरकार इस सप्ताह संसद में एफसीआरए यानी विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम में संशोधन का एक प्रस्ताव पेश करने वाली है. गैर-सरकारी संगठनों और चर्चों के अलावा विपक्षी दल भी इसका भारी विरोध क्यों कर रहे हैं, मगर क्यों

एफसीआरए में प्रस्तावित संशोधन का विरोध क्यों?
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भारत सरकार इस सप्ताह संसद में एफसीआरए यानी विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम में संशोधन का एक प्रस्ताव पेश करने वाली है. गैर-सरकारी संगठनों और चर्चों के अलावा विपक्षी दल भी इसका भारी विरोध क्यों कर रहे हैं, मगर क्यों?

पूर्वोत्तर के ईसाई-बहुल मेघालय, मिजोरम और नागालैंड के अलावा विदेशों से आर्थिक मदद पाने वाले देश भर के गैर-सरकारी संगठन और इंडिया गठबंधन में शामिल राजनीतिक दल इस संशोधन विधेयक विरोध कर रहे हैं. कुछ संगठनों ने 11 अगस्त को 'प्रतिवाद दिवस' मनाने की अपील की है.

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पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में तो बीजेपी सांसद और मंत्री भी इस मुद्दे पर केंद्र से और स्पष्टता की मांग कर रहे हैं. अमेरिका के एक सांसद ने भी इसे ईसाइयों पर सीधा हमला बताते हुए इसका विरोध किया है. हालांकि केंद्र सरकार ने इन आपत्तियों को खारिज करते हुए भरोसा दिया है कि इससे विदेशी मदद हासिल करने में संगठनों को कोई दिक्कत नहीं होगी. संसद के दोनों सदनों के आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए इस विधेयक के पास होने में कोई दिक्कत होने की आशंका नहीं है.

एफसीआरए है क्या?

एफसीआरए गैर-सरकारी संगठनों और किसी ट्रस्ट या धार्मिक संगठन को विदेशों से मिलने वाली आर्थिक सहायता या चंदे पर निगरानी रखते हुए उसे पारदर्शी बनाने का कानून है. वर्ष 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने इमरजेंसी के दौरान यह कानून बनाया और लागू किया था. उसके बाद भी सुरक्षा और पारदर्शिता के लिहाज से इस में कई बार संशोधन किए गए हैं.

आयकर विशेषज्ञ जुगल पुरोहित डीडब्ल्यू को बताते हैं, "इस कानून का मकसद विदेश से आने वाले पैसों के स्रोत की जांच के साथ इसके इस्तेमाल पर निगाह रखना और यह सुनिश्चित करना है कि इसका इस्तेमाल राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में नहीं हो. "

प्रस्तावित संशोधन

अब केंद्र सरकार ने जो संशोधन विधेयक तैयार किया है उसमें कहा गया है कि किसी संगठन का एफसीआरए लाइसेंस रद्द या खत्म होने की स्थिति में विदेशी पैसों से तैयार संपत्ति का प्रबंधन और नियंत्रण अपने हाथ में ले सकती है. यह काम एक विशेष अधिकारी के जरिए होगा.

इसमें विदेशी धन का दुरुपयोग रोकने के लिए मौजूदा नियमों को संशोधित करते हुए हुए निगरानी प्रणाली को भी और मजबूत व असरदार बनाने का प्रस्ताव है. केंद्र की दलील है कि दुनिया के बाकी देशों की तरह उसे भी आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से विदेशों से आने वाली रकम की सख्त निगरानी और नियमन का अधिकार है.

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नए विधेयक में एफसीआरए लाइसेंस के दुरुपयोग की स्थिति में संबंधित संगठन के संचालकों को निजी तौर पर जवाबदेह ठहराने का भी प्रावधान है. विदेशी चंदे और उसके इस्तेमाल को पारदर्शी बनाने के लिए ऐसी संस्थाओं के रजिस्ट्रेशन, लाइसेंस नवीनीकरण और आयकर रिटर्न भरने की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक नया पोर्टल भी लांच किया है.

संशोधन का विरोध क्यों?

पूर्वोत्तर समेत देश के बाकी हिस्सों में विदेशी चंदा या वित्तीय मदद हासिल करने वाले संगठनों को डर है कि सरकार इस संशोधन के जरिए उनकी संपत्ति पर कब्जा कर सकती है. पूर्वोत्तर के ईसाई संगठनों की दलील है कि संशोधन विधेयक के कड़े प्रावधानों के कारण उनकी धार्मिक आजादी और संस्था की ओर से चलाए जा रहे कल्याणकारी काम खतरे में पड़ जाएंगे. इसके अलावा रजिस्ट्रेशन और आयकर रिटर्न के कड़े प्रावधानों के कारण खासकर छोटी संस्थाओं का कामकाज मुश्किल हो जाएगा.

मिजोरम के नौ चर्च समुदायों को संगठन ताकतवर संगठन काउंसिल आफ चर्चेज इन मिजोरम (सीसीएम) के महासचिव रेवरेंड लालहमंगाइहा डीडब्ल्यू से कहते हैं, "संशोधन विधेयक के प्रावधानों ने चिंता बढ़ा दी है. सरकार इसकी आड़ में हमारी दशकों पुरानी संपत्ति पर कब्जा कर सकती है. इनमें स्कूल और अस्पताल जैसी उपयोगी संपत्ति शामिल है. इससे इलाके में संस्था की ओर से किए जा रहे कार्यों पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ेगा."

उनका कहना है कि संस्था के संचालकों की निजी जवाबदेही तय करने वाले प्रावधान का भी कामकाज पर गहरा असर पड़ने की आशंका है. इस कानून के डर से लोग फैसला लेने से हिचकेंगे.

तमाम संगठनों ने संसद में पेश करने से पहले इस विधेयक को संसद की संयुक्त समिति के पास भेजने की मांग की है ताकि संबंधित पक्षों से विचार-विमर्श के बाद ही इस पर फैसला किया जा सके.

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मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदूहोमा ने इस मुद्दे पर बीते सप्ताह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी. मुख्यमंत्री के मुताबिक शाह ने उनको भरोसा दिया है कि संशोधन विधेयक के प्रावधानों को पिछली तारीख से नहीं लागू किया जाएगा.

मेघालय के बीजेपी विधायक ए.एल.हेक ने भी इस विधेयक का विरोध किया है. हेक ने डीडब्ल्यू से कहा, "सिर्फ आश्वासन से काम नहीं होगा. विधेयक में कानूनी तौर पर और स्पष्टता जरूरी है. इसे संसद में पेश करने से पहले संबंधित पक्षों के साथ व्यापक स्तर पर विचार-विमर्श किया जाना चाहिए."

अमेरिकी सांसद रेली मूर ने भी इस विधेयक पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि यह ईसाई संस्थाओं, चर्चों और चैरिटी के खिलाफ है और इससे दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ सकता है. उनका कहना था कि विधेयक में प्रस्तावित प्रावधान से सरकार को चर्चों और अन्य धर्मार्थ संगठनों पर कब्जा करने का अधिकार मिल जाएगा. यह ईसाइयों पर सीधा हमला है.

लेकिन विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी आशंका को खारिज करते हुए इसे अपना आंतरिक मामला बताया है. सरकार ने कहा है कि अमेरिका समेत दुनिया के तमाम देश विदेशी धन को नियंत्रित करते हैं. ऐसे में भारत को भी अपने हितों की रक्षा के लिए जरूरी कानून बनाने या उसमें संशोधन करने का अधिकार है.

सरकार की दलील

केंद्र सरकार ने प्रस्तावित संशोधनों का बचाव करते हुए कहा है कि इसका मकसद विदेशी धन से बनी संपत्तियों और उनके कामकाज को पारदर्शी बनाए रखना है. संबंधित संस्था या संगठन के बंद होने या उसका रजिस्ट्रेशन रद्द होने के बावजूद उनका दुरुपयोग रोकना ही इस संशोधन का मुख्य मकसद है.

सरकार की दलील है कि इस संशोधन का मकसद विदेशी धन से बनी संपत्तियों का प्रबंधन कानूनी तौर पर सुनिश्चित करना और जवाबदेही को मजबूत बनाना है.

इस विधेयक पर धर्म विशेष के लोगों को निशाना बनाने के भी आरोप लग रहे हैं. लेकिन बीते छह अगस्त को दिल्ली में ईसाई संगठनों के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक में अमित शाह ने भरोसा दिया कि सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है. तमाम धार्मिक संस्थाओं का मौजूद स्वरूप कायम रहेगा.


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