खदान के लिए ग्रामीण नहीं देंगे जमीन
अम्बिकापुर ! अमेरा ओपन कास्ट खदान के विस्तार की प्रक्रिया अब ग्रामवासी के विरोध के कारण खटाई में पड़ती दिखाई दे रही है।

अम्बिकापुर ! अमेरा ओपन कास्ट खदान के विस्तार की प्रक्रिया अब ग्रामवासी के विरोध के कारण खटाई में पड़ती दिखाई दे रही है। अमेरा खदान एक्सटेंशन के लिये प्रबंधन लखनपुर जनपद अंतर्गत जिस ग्राम परसोड़ीकला के ग्रामीणों की जमीन अधिग्रहण करना चाह रही है उन प्रभावितों का कहना है कि अमेरा ग्राम में गत एक दशक पूर्व जो अधिग्रहण किया गया था, उन ग्रामीणों की सामाजिक संरचना को लेकर जो-जो वादे किये गये थे आज दिनांक तक पूरा नहीं किया जा सका है। अधिग्रहण के बाद जैसे स्कूल, आंगनबाड़ी केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य भवन तोड़े गये थे उसे पुन: निर्माण कराकर प्रबंधन द्वारा दिया जायेगा। इसके साथ प्रभावित परिवार के एक लोगों को नौकरी, पुनव्र्यास्थापन हेतु आवास व अन्य मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जायेगी, लेकिन एक दशक गुजरने के बाद खदान से उत्खनन प्रारंभ होने के बाद भी इन्हें उन सभी मूलभूत आवश्यकताओं से दूर रखा गया। इनमेें एक दर्जन से भी अधिक परिवार ऐसे हैं जिन्हें आज तक न तो नौकरी न ही मुआवजा मिला। शेष मूलभूत सुविधा की बात तो छोड़ो इनका खेत के साथ घर भी चला गया। आज वे घुमक्कड़ की जिन्दगी जीने को मजबूर हैं।
परसोड़ीकला के ग्रामीणों का आरोप है कि जिला प्रशासन अधिग्रहण कराने व भूमि खाली कराने ऐड़ी चोटी का जोर लगा रहा हैं उन्हेें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिये कि घुनघुट्टा केनाल के बाई ओर किमी 36 से 40 लगभग चार किमी का जो केनाल का क्षेत्र सहित अन्य अधोसंरचना कुल 664 हेक्टेयर सिंचित रकबा का अधिग्रहण किया गया था, जिसके लिये 2007-08 में 228 लाख रूपये मुआवजा जिला प्रशासन को देने की सहमति बनी थी, किन्तु 2014 तक मुआवजा नहीं दिया गया और प्रशासन ने पुन: नये दर से मुआवजा का निर्धारण किया, जो कि 1538 लाख रूपये हुआ, किन्तु आज पर्यंत तक भी ना तो जिला प्रशासन और न ही जल संसाधन विभाग को एसईसीएल द्वारा उक्त मुआवजा दिया गया। जब जिला प्रशासन एसईसीएल से मुआवजा आज तक नहीं ले पाई तो क्या हम गरीबों को जिनके बाप-दादाओं से जुड़ा जमीन घर है उनका क्या होगा। ग्रामीणों का आरोप है कि विस्थापित ग्राम अमेरा के एक दर्जन से अधिक उन ग्रामीणों को पहले मुआवजा व नौकरी दिला दे जो लगभग 10 वर्षों से एसईसीएल के कार्यालय के चक्कर लगाकर परेशान हैं, लेकिन उन्हें आज तक नौकरी या फुटी कौड़ी भी प्रबंधन से नसीब नहीं हुई। ग्रामीणों की मांग है कि कानून के अनुसार 70 प्रतिशत जमीन मालिकों की सहमति के बाद ही अधिग्रहण किया जा सकता है। जबकि परसोड़ी कला में केवल 15 लोग जमीन देने को तैयार हैं अथवा मुआवजा ले लिये हैं। ऐसी परिस्थिति में जिला प्रशासन द्वारा परसोड़ी कला पहुंचकर जमीन खाली कराना नियम के विरूद्ध है, क्योंकि 70 प्रतिशत सहमति आवश्यक है। ग्रामीणों का कहना है कि जिला प्रशासन द्वारा अन्य लोगों पर दबाव बनाने के लिये इस तरह की कार्यवाही की जा रही है। अमेरा परियोजना से बेदखल हुई एक प्रभावित राजेश्वरी ने बताया कि गत 10 वर्ष पूर्व अमेरा में उसका 9.5 एकड़ के करीब भूमि का अधिग्रहण किया गया था, जिसमें उसका जमीन व घर दोनों चले गया, लेकिन आज तक उसे न नौकरी मिली, ना एक पैसा एसईसीएल प्रबंधन द्वारा दिया गया। उसने बताया कि उसके लिये उसने जनप्रतिनिधियों से लेकर एसईसीएल के उच्च अधिकारियों व जिला प्रशासन से भी कई बार गुहार लगाई, लेकिन किसी ने कोई मदद नहीं की। जानकारी के अनुसार परसोड़ी कला में कुल 232 परिवार प्रभावित क्षेत्र में आ रहे हैं, जिसमें मात्र 17 परिवार ने ही सहमति या दबाव पर मुआवजा स्वीकार किया है। शेष परिवार अपनी जमीन नहीं देने पर अड़े हैं जिसके कारण आये दिन प्रबंधन व गांव वालों के बीच में दंगल की स्थिति निर्मित हो जाती है। बीच-बचाव करने जिला प्रशासन की टीम भी पहुंचती है, लेकिन ग्रामीण एक इंच जमीन भी नहीं देना चाहते हैं। गत 12 फरवरी को ग्रामवासियों ने अपने शिकायत में बताया कि प्रबंधन द्वारा उनके कुछ मकानों को बर्बरता पूर्वक तोड़ दिया गया। अमेरा ग्राम के चरित्र सिंह ने बताया कि खपड़ा, बल्ली, मयार, दरवाजा सहित तकरीबन 3 लाख रूपये का घर में लगे सामान जमीदोज हो गया। मोतीलाल व बजरंग राम ने घरों का कुछ खपड़ा, बल्ली, दरवाजा आदि को किसी तरह बचाया। ग्रामीणों ने उक्त कार्यवाही को गलत ठहराते हुये कहा कि नौकरी, मुआवजा, विस्थापन की व्यवस्था बिना कार्यवाही किया जाना हमारे मौलिक अधिकार का हनन है। ग्रामीणों ने बताया कि 10 वर्ष पूर्व जब अमेरा ग्राम का एसईसीएल द्वारा अधिग्रहण किया जा रहा था तो उससे लगा कटकोना ग्राम भी अधिग्रहण के क्षेत्र में था, लेकिन ग्रामीणों ने एकजुट होकर इसका विरोध कर कटकोना से एक इंच जमीन नहीं देने का फैसला किया। ग्रामसभा की पूर्ण सहमति के आधार पर आज कटकोना सुरक्षित है। परसोड़ी कला के ग्रामीण भी चाहते हैं कि अपने पूर्वजों की जमीन वे एसईसीएल को नहीं देंगे। उन्होंने जनप्रतिनिधियों व जिला प्रशासन से ग्राम को बचाये जाने की मांग की है। ग्रामीणों ने आरोप लगाते हुये बताया कि स्वतंत्रता के बाद से सरगुजा के विभिन्न ग्रामों में अलग-अलग खदान खोले गये, लेकिन एक भी ऐसा क्षेत्र प्रशासन उन्हें बताये जहां के आम लोगों को व आसपास के प्रभावितों को लाभ हुआ हो, जिसका उदाहरण क्षेत्र के लिये बना हो, जहां-जहां खदानें खुली प्रभावित लोग आज भी बेघरबार व बेरोजगार हैं। यदि रोजगार दिया भी गया है तो मजदूरी या सुरक्षा गार्ड के पदों पर ।


