महबूबा का इस्तीफा, लगेगा राज्यपाल शासन
जम्मू-कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी से नाता तोड़ने के साथ ही महबूबा मुफ्ती सरकार गिर गई है

नई दिल्ली/श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी से नाता तोड़ने के साथ ही महबूबा मुफ्ती सरकार गिर गई है। महबूबा मुफ्ती ने जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल एनएन बोहरा से मिलकर अपना इस्तीफा सौंप दिया। बोहरा ने राज्य की राजनीतिक स्थिति को देखते हुए प्रदेश में राज्यपाल शासन लगाने की सिफारिश केंद्र से की है।
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद इस समय तीन देशों की यात्रा पर हैं। उनका आज सूरीनाम पहुंचने का कार्यक्रम है। इस बात की संभावना है कि राष्ट्रपति के भारत वापस लौटने के बाद ही केंद्र सरकार राज्य में राज्यपाल शासन लगाने के बारे में कोई फैसला करेगी। राज्य में लगातार बिगड़ते हालात के कारण भाजपा को 2019 में होने वाले चुनावी नुकसान की आशंका सता रही थी। दूसरी ओर भाजपा द्वारा समर्थन वापसी की घोषणा के बाद राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने राज्यपाल से मिलकर उन्हें अपना इस्तीफा सौंप दिया।
महबूबा ने कहा, राज्य में सरकार बनाने का फैसला बड़े मकसद के लिए किया था जिसमें हम हद तक सफल भी रहे। भाजपा के समर्थन वापसी के फैसले से वह अचंभित नहीं है। दूसरी ओर कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस ने साफ कर दिया है कि वह राज्य में नई सरकार गठन के लिए न तो कोशिश करेंगे और न ही सरकार गठन में किसी को समर्थन ही देंगे। भाजपा के महासचिव और जम्मू-कश्मीर के प्रभारी राम माधव ने मंगलवार को गठबंधन तोड़ने की घोषणा करते हुए कहा कि राज्य की जो स्थिति है उसमें पीडीपी के साथ आगे गठबंधन जारी रखना संभव नहीं है और इसलिए पार्टी ने नाता तोड़ने का फैसला किया है।
श्री राममाधव ने कहा कि राज्य में शांति बहाल करने तथा जम्मू-कश्मीर का तेजी से विकास करने के उद्देश्य से हमने पीडीपी के साथ गठबंधन किया था। मोदी सरकार ने राज्य में विकास के लिए काफी काम किया है। राज्य के विकास के लिए जो भी संभव था सब कुछ किया गया। उन्होंने कहा कि राज्य में आतंकवाद, हिंसा तथा अतिवाद बढ़ा है और घाटी में लोगों के मूलभूत अधिकार खतरे में पड़ गए थे। केंद्र सरकार की ओर से समर्थन के बावजूद पीडीपी राज्य के हालात को नियंत्रित करने के विफल रही है।
भाजपा-पीडीपी में थे मतभदे
भाजपा का आरोप है कि महबूबा सरकार जम्मू व लद्दाख की उपेक्षा कर रही थी। उनके मंत्रियों को स्वतंत्रता पूर्व काम नहीं करने दिया जा रहा था। महबूबा मुफ्ती केंद्र से अलगाववादियों से वार्ता का दबाव डाल रहीं थी लेकिन केंद्र इसके लिए तैयार नहीं था। रमजान के दौरान संघर्ष विराम का मुद्दे पर दोनों के बीच जबरदस्त मतभेद सामने आए, महबूबा के दबाव में केंद्र ने संघर्ष विराम लागू किया लेकिन इसका लाभ नहीं मिला, उल्टे भाजपा को देशभर में गलत संदेश पहुंचने का डर सताने लगा।


