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'यादगार' वर्मा मलिक : जब गाने चलने के बावजूद नहीं मिल रहा था काम, मनोज कुमार की एक पेशकश और बदल गई जिंदगी

हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसे कई गीतकार हुए, जिन्होंने अपनी अनोखी और समृद्ध रचनाओं से फिल्मों को अमर बनाया

यादगार वर्मा मलिक : जब गाने चलने के बावजूद नहीं मिल रहा था काम, मनोज कुमार की एक पेशकश और बदल गई जिंदगी
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मुंबई। हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसे कई गीतकार हुए, जिन्होंने अपनी अनोखी और समृद्ध रचनाओं से फिल्मों को अमर बनाया। लीक से हटकर लिखने वाले इन कलमकारों में वर्मा मलिक का जिक्र लाजमी है। जीवन के हर रंग और भावनाओं को अपने शब्दों में समेटने वाले गीतकार वर्मा मलिक की 15 मार्च को पुण्यतिथि है। उनकी कलम से निकले गीत आज भी पुराने नहीं हुए।

गीतकार वर्मा मलिक की कलम से निकले गाने आज भी लोगों के दिलों में बसे हैं, खासकर 'यादगार' फिल्म का सॉन्ग “एक तारा बोले तुम तुम...” जो उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट बन गया। शुरुआती दौर में कई हिट गाने लिखने के बावजूद उन्हें लगातार काम नहीं मिल रहा था। लेकिन मनोज कुमार की एक पेशकश ने उनकी किस्मत बदल दी और उन्हें सिनेमा जगत में स्थापित कर दिया।

वर्मा मलिक का जन्म 13 अप्रैल 1925 को पंजाब के फिरोजपुर में हुआ था। बचपन से ही आजादी की लड़ाई के नारे उनके कानों में गूंजते थे। उन्होंने देशभक्ति के गीत लिखे और गाए। भजन गायक के रूप में भी नाम कमाया। खास बात है कि हर इवेंट की शुरुआत वह भजन से ही करते थे।

साल 1947 में विभाजन के बाद जब वह भारत आए तो जिंदगी धीरे-धीरे पटरी पर आई और इसी कड़ी में साल 1954 में कुलदीप सैगल की फिल्म 'दोस्त' में उन्हें पहला बड़ा मौका मिला। फिल्म में कुल सात गाने थे और पांच गीतकारों को बुलाया गया। जीवन दर्शन और दोस्ती पर आधारित एक गाना वर्मा मलिक को सौंपा गया। उन्होंने लिखा – “आए भी अकेला, जाए भी अकेला, दो दिन की जिंदगी है, दो दिन का मेला” तलत महमूद की मखमली आवाज में यह गाना सुपरहिट हुआ, लेकिन इसके बावजूद उन्हें कोई बड़ा ब्रेक नहीं मिला। निराशा के दौर में उन्होंने भजन गाकर गुजारा करने का फैसला लिया। कहते हैं न किस्मत आने से पहले दस्तक नहीं देती और यही उनके साथ भी हुआ। फिल्म 'यादगार' साल 1970 में आई, इसके निर्माता-निर्देशक एस. राम शर्मा थे और मुख्य अभिनेता मनोज कुमार थे।

दरअसल, वर्मा मलिक की किस्मत मनोज कुमार की वजह से ही खुली। वर्मा मलिक से एक मुलाकात के दौरान मनोज कुमार ने उनके अंदर के कलाकार को पकड़ लिया और वर्मा को फिल्म के सभी गीत लिखने की पेशकश की। फिल्म के गाने जबरदस्त हिट हुए और वर्मा मलिक की पहचान बन गई। 'यादगार' न उनके करियर के लिए टर्निंग प्वाइंट बना बल्कि करियर के लिए भी यादगार बन गया।

फिर तो वर्मा मलिक ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसी साल आई फिल्म 'पहचान' में उनका गाना “सबसे बड़ा नादान वही है जो समझे नादान मुझे” ने इतिहास रच दिया। इस गाने को फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला सर्वश्रेष्ठ गीत के लिए वर्मा मलिक, सर्वश्रेष्ठ गायक के लिए मुकेश को और सर्वश्रेष्ठ संगीत के लिए शंकर-जयकिशन को पुरस्कार मिला।

वर्मा मलिक ने देशभक्ति, भजन और फिल्मी गीतों में महारत हासिल की। उन्होंने हिंदी के साथ पंजाबी में भी गीत लिखे। साल 1969 में दारा सिंह की फिल्म 'नानक नाम जहाज है' के गीत भी उनके लिखे थे। उनकी जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, शंकर-जयकिशन, कल्याणजी-आनंदजी, रवि जैसे संगीतकारों के साथ रही।

कुछ यादगार गानों पर नजर डालें तो सावन भादो का “सुन सुन सुन ओ गुलाबी कली...दिल लेकर मेरा दूर दूर जाओ ना”, 'विक्टोरिया नंबर 203' का “दो बेचारे बिना सहारे”, 'नागिन' का “हफ्ते, महीने, बरसों नहीं, सदियों से है ये पुराने तेरे मेरे याराने हो” आदि हैं।

वर्मा मलिक लीक से हटकर लिखते थे। उन्होंने 'पत्थर और पायल', 'वारिस', 'कौन कितने पानी में' जैसी फिल्मों में भी गीत दिए। इसके अलावा, आज मेरे यार की शादी है, महंगाई मारगई गानों को रचा। 15 मार्च 2009 को वर्मा मलिक इस दुनिया से चले गए। ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने लिखा था–आए भी अकेला, गए भी अकेला लेकिन पीछे छोड़ गए अमर गीत जो आज भी जीवन के मेले की याद दिलाते हैं।


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