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मराठवाड़ा में किसान आत्महत्याओं का संकट गहराया, पांच साल में 5,000 से ज्यादा मौतें, 2025 में सबसे अधिक मामले

अधिकारियों के मुताबिक, 2025 में मौसम की मार ने किसानों की स्थिति और खराब कर दी। मई महीने में मराठवाड़ा के कई हिस्सों में बेमौसम बारिश दर्ज की गई, जिससे खड़ी फसलें तबाह हो गईं।

मराठवाड़ा में किसान आत्महत्याओं का संकट गहराया, पांच साल में 5,000 से ज्यादा मौतें, 2025 में सबसे अधिक मामले
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छत्रपति संभाजीनगर। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में किसान आत्महत्याओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले पांच वर्षों में इस सूखा प्रभावित इलाके में 5,075 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2025 किसान आत्महत्याओं के लिहाज से सबसे भयावह वर्ष साबित हुआ, जब 1,129 किसानों ने अपनी जान गंवाई। यह चौंकाने वाले आंकड़े मराठवाड़ा मंडल आयुक्त कार्यालय द्वारा तैयार की गई आधिकारिक रिपोर्ट में सामने आए हैं। रिपोर्ट ने एक बार फिर क्षेत्र में कृषि संकट, मौसम की मार और किसानों की बदहाल आर्थिक स्थिति को उजागर किया है।

आठ जिलों वाला मराठवाड़ा मंडल
मराठवाड़ा मंडल में महाराष्ट्र के आठ जिले शामिल हैं—छत्रपति संभाजीनगर, जालना, परभणी, नांदेड़, बीड, धराशिव, हिंगोली, लातूर। ये जिले लंबे समय से सूखा, फसल नुकसान, कर्ज के बोझ और अस्थिर मौसम की समस्या से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन संरचनात्मक समस्याओं का समाधान न होने के कारण किसान लगातार आत्महत्या जैसे कठोर कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं।

वर्षवार आंकड़े: हर साल बढ़ती चिंता
रिपोर्ट में 2021 से 2025 तक किसान आत्महत्याओं के वर्षवार आंकड़े भी जारी किए गए हैं, जो हालात की गंभीरता को दर्शाते हैं—

2021 – 887 किसान

2022 – 1,023 किसान

2023 – 1,088 किसान

2024 – 948 किसान

2025 – 1,129 किसान

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि 2024 में कुछ कमी के बाद 2025 में आत्महत्याओं की संख्या फिर से तेजी से बढ़ी और पांच वर्षों का सबसे ऊंचा स्तर दर्ज किया गया।

बीड जिला सबसे ज्यादा प्रभावित

जिलावार आंकड़ों पर नजर डालें तो बीड जिला सबसे अधिक प्रभावित रहा है। 2025 में अकेले बीड में 256 किसानों ने आत्महत्या की, जो मराठवाड़ा के किसी भी जिले में सबसे ज्यादा है।

इसके अलावा अन्य जिलों में 2025 के दौरान आत्महत्याओं की संख्या इस प्रकार रही—

छत्रपति संभाजीनगर – 224

नांदेड़ – 170

धराशिव – 141

परभणी – 104

जालना – 90

लातूर – 76

हिंगोली – 68

इन आंकड़ों से यह साफ है कि संकट किसी एक जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे मराठवाड़ा में फैला हुआ है।

हर परिवार तक नहीं पहुंची मदद

रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में जिन किसानों ने आत्महत्या की, उनमें से 193 किसानों के परिवारों को ही अनुग्रह राशि (मुआवजा) मिल सका। इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में पीड़ित परिवार अब भी सरकारी सहायता से वंचित हैं। सामाजिक संगठनों का कहना है कि मुआवजा प्रक्रिया जटिल है और कई मामलों में किसान आत्महत्या को ‘पात्र’ नहीं माना जाता, जिससे परिवारों को आर्थिक मदद नहीं मिल पाती।

बेमौसम बारिश और बाढ़ ने बढ़ाई मुश्किलें
अधिकारियों के मुताबिक, 2025 में मौसम की मार ने किसानों की स्थिति और खराब कर दी। मई महीने में मराठवाड़ा के कई हिस्सों में बेमौसम बारिश दर्ज की गई, जिससे खड़ी फसलें तबाह हो गईं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि “क्षेत्र के विभिन्न जिलों में सामान्य से 125 से 150 प्रतिशत अधिक वर्षा दर्ज की गई। इससे सोयाबीन, कपास और दलहन जैसी प्रमुख फसलों को भारी नुकसान हुआ।”
इसके अलावा सितंबर और अक्टूबर 2025 में मराठवाड़ा के कई इलाकों में भीषण बाढ़ आई, जिसने खेतों, घरों और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया। जिन किसानों ने किसी तरह खरीफ की फसल बचाने की उम्मीद की थी, उनकी वह उम्मीद भी टूट गई।

कर्ज और बढ़ती लागत बना बड़ा कारण
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, मराठवाड़ा में किसान आत्महत्याओं के पीछे केवल मौसम ही नहीं, बल्कि बढ़ती खेती लागत, बीज, खाद और कीटनाशकों के ऊंचे दाम, फसलों का उचित समर्थन मूल्य न मिलना, बैंकों और साहूकारों का कर्ज जैसे कई कारण जिम्मेदार हैं। फसल खराब होने के बाद किसान कर्ज चुकाने की स्थिति में नहीं रह जाते और मानसिक दबाव बढ़ता जाता है।

समाधान की मांग तेज
किसान संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सरकार से मांग की है कि फसल बीमा योजनाओं को प्रभावी बनाया जाए, आत्महत्या प्रभावित परिवारों को तुरंत सहायता दी जाए, सिंचाई और जल प्रबंधन पर दीर्घकालिक निवेश किया जाए, किसानों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए काउंसलिंग व्यवस्था मजबूत की जाए। उनका कहना है कि केवल मुआवजा देना समाधान नहीं है, बल्कि कृषि को टिकाऊ और लाभकारी बनाना ही इस संकट से निकलने का रास्ता है।

गंभीर चेतावनी

मराठवाड़ा में किसान आत्महत्याओं के ताजा आंकड़े राज्य और केंद्र सरकार दोनों के लिए गंभीर चेतावनी हैं। 2025 में रिकॉर्ड आत्महत्याएं यह दर्शाती हैं कि मौजूदा नीतियां जमीनी स्तर पर किसानों की तकलीफ कम करने में नाकाम साबित हो रही हैं। जब तक मौसम की मार, कर्ज और कृषि व्यवस्था की खामियों का स्थायी समाधान नहीं किया जाता, तब तक यह मानवीय त्रासदी थमने की उम्मीद कम ही नजर आती है।


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