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कांग्रेस ने सीएम फडणवीस को महिला आरक्षण पर खुली बहस की चुनौती दी

लैंगिक प्रतिनिधित्व को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच कांग्रेस कार्यसमिति की सदस्य और सांसद प्रणीति शिंदे ने सोमवार को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की उस चुनौती को स्वीकार कर लिया

कांग्रेस ने सीएम फडणवीस को महिला आरक्षण पर खुली बहस की चुनौती दी
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मुंबई। लैंगिक प्रतिनिधित्व को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच कांग्रेस कार्यसमिति की सदस्य और सांसद प्रणीति शिंदे ने सोमवार को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की उस चुनौती को स्वीकार कर लिया, जिसमें उन्होंने महिला आरक्षण विधेयक पर खुली बहस का प्रस्ताव रखा था। इसके साथ ही शिंदे ने यह भी मांग की कि इस बहस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी शामिल होना चाहिए।

कांग्रेस सांसद शोभा बच्छाव के साथ एक पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए प्रणीति शिंदे ने भारतीय जनता पार्टी पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि पार्टी आरक्षण के मुद्दे का उपयोग एक छिपे हुए एजेंडे के रूप में कर रही है, जिसका उद्देश्य निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है। उनके अनुसार, इससे देश की संघीय व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

शिंदे ने मुख्यमंत्री को चुनौती देते हुए कहा कि वे इस मुद्दे पर सार्वजनिक बहस के लिए समय और स्थान तय करें, ताकि सभी पक्ष अपने विचार खुलकर रख सकें। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार द्वारा बुलाया गया विशेष सत्र महिला आरक्षण के लिए नहीं, बल्कि परिसीमन से जुड़े फैसलों को आगे बढ़ाने के लिए था।

शिंदे और बच्छाव ने यह भी कहा कि सरकार की मंशा पर सवाल उठते हैं, क्योंकि प्रस्तावित योजनाओं से उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच असंतुलन पैदा हो सकता है। उन्होंने मांग की कि लोकसभा की सभी पांच सौ तैंतालीस सीटों पर तैंतीस प्रतिशत महिला आरक्षण को तुरंत लागू किया जाए और इसके लिए जनगणना या परिसीमन जैसी किसी शर्त को न जोड़ा जाए।

प्रणीति शिंदे ने यह भी आरोप लगाया कि वर्ष 2023 में लाया गया महिला आरक्षण विधेयक जानबूझकर जटिल शर्तों के साथ तैयार किया गया था, ताकि इसे लागू करने में देरी हो सके। उन्होंने कहा कि सरकार ने महिला आरक्षण के नाम पर विशेष सत्र बुलाया था। लेकिन, शुरू में इस विषय को एजेंडे में शामिल ही नहीं किया गया था।

उन्होंने आगे कहा कि सरकार का असली उद्देश्य निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन के जरिए राजनीतिक लाभ हासिल करना था। लेकिन, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के प्रयासों के कारण यह योजना सफल नहीं हो सकी और सरकार को अपने कदम पीछे लेने पड़े।

शिंदे ने मुख्यमंत्री की 'भ्रूण हत्या' वाली टिप्पणी का भी उल्लेख किया और इसके बाद उन्होंने भाजपा पर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने मणिपुर, हाथरस, उन्नाव और बदलापुर जैसी घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि ये मामले महिलाओं की सुरक्षा की स्थिति पर चिंता पैदा करते हैं। उनके अनुसार, भाजपा सिर्फ राजनीतिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा के मुद्दे पर भी सवालों के घेरे में है।

उन्होंने कहा कि महिलाओं के खिलाफ होने वाली घटनाओं को लेकर सरकार को और अधिक संवेदनशील होने की जरूरत है। शिंदे ने आरोप लगाया कि कई मामलों में महिलाओं के साथ अन्याय हुआ है और उन पर उचित कार्रवाई नहीं की गई।

वहीं, कांग्रेस नेता शोभा बच्छाव ने पार्टी के ऐतिहासिक योगदानों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देने का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को जाता है। साथ ही कई राज्यों में इसे बढ़ाकर पचास प्रतिशत तक पहुंचाने का श्रेय सोनिया गांधी को दिया जाता है।

उन्होंने यह भी कहा कि आज स्थानीय निकायों में लगभग पंद्रह लाख महिलाएं कार्य कर रही हैं और यह बदलाव कांग्रेस की नीतियों के कारण संभव हुआ है। बच्छाव के अनुसार, यदि 2024 के चुनावों के लिए प्रस्तावित 2023 का महिला आरक्षण कानून लागू कर दिया गया होता, तो लोकसभा में लगभग एक सौ अस्सी महिला सांसद होतीं। लेकिन उनके अनुसार, सरकार ने इस कानून को कुछ शर्तों से जोड़कर इसकी प्रक्रिया को जटिल बना दिया।

शिंदे ने भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संगठनात्मक संरचना पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अब तक भाजपा में कोई भी महिला राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं बनी है, जो महिलाओं की भागीदारी पर सवाल खड़ा करता है। उन्होंने भाजपा के प्रस्तावित हस्ताक्षर अभियान को भी आलोचना का विषय बनाते हुए कहा कि यह केवल दिखावा है और इसमें विश्वसनीयता की कमी है।


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