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किन्नर अखाड़े ने घोषित की पहली किन्नर शंकराचार्य, भोपाल सम्मेलन में हुआ पट्टाभिषेक

मूल रूप से मुंबई से संबंध रखने वाली हिमांगी सखी को ब्रह्मसरोवर पुष्कर पीठ की शंकराचार्य घोषित किया गया। इससे पहले वह मां वैष्णो किन्नर अखाड़ा में जगद्गुरु के रूप में सेवाएं दे रही थीं। हिमांगी सखी को पहली किन्नर भागवत कथा वाचक के रूप में भी जाना जाता है।

किन्नर अखाड़े ने घोषित की पहली किन्नर शंकराचार्य, भोपाल सम्मेलन में हुआ पट्टाभिषेक
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भोपाल। शंकराचार्य परंपरा को लेकर प्रयागराज माघ मेले से शुरू हुआ विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। रविवार को भोपाल में आयोजित किन्नर धर्म सम्मेलन में किन्नर अखाड़े ने अपनी पहली शंकराचार्य की घोषणा कर दी। हिमांगी सखी को राजस्थान के ब्रह्मसरोवर पुष्कर पीठ की पहली किन्नर शंकराचार्य के रूप में पट्टाभिषिक्त किया गया। यह घोषणा महाशिवरात्रि के अवसर पर हुई, जहां देशभर से किन्नर समुदाय के प्रतिनिधि एकत्रित हुए थे। सम्मेलन में किन्नर परंपरा के अंतर्गत अन्य धार्मिक पदों की भी घोषणा की गई।

हिमांगी सखी बनीं पहली किन्नर शंकराचार्य

मूल रूप से मुंबई से संबंध रखने वाली हिमांगी सखी को ब्रह्मसरोवर पुष्कर पीठ की शंकराचार्य घोषित किया गया। इससे पहले वह मां वैष्णो किन्नर अखाड़ा में जगद्गुरु के रूप में सेवाएं दे रही थीं। हिमांगी सखी को पहली किन्नर भागवत कथा वाचक के रूप में भी जाना जाता है। धार्मिक आयोजनों और कथाओं के माध्यम से उन्होंने किन्नर समुदाय की आध्यात्मिक भागीदारी को प्रमुखता दिलाने का प्रयास किया है। भोपाल में हुए पट्टाभिषेक समारोह में मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच उन्हें शंकराचार्य की उपाधि प्रदान की गई।

सम्मेलन में कई अन्य घोषणाएं

किन्नर अखाड़ा के संस्थापक अजय दास की उपस्थिति में आयोजित इस सम्मेलन में पांच जगद्गुरुओं और छह महामंडलेश्वरों की भी घोषणा की गई। इसके अलावा 35 किन्नरों को महंत बनाया गया। सम्मेलन के दौरान आयोजकों ने यह भी दावा किया कि 200 किन्नरों की ‘घर वापसी’ कराई गई है, जो पहले मतांतरित हो चुके थे। इस दावे को लेकर भी चर्चा बनी हुई है।

मप्र से शुरू हुआ था किन्नर अखाड़ा

सनातन परंपरा में वर्तमान में 13 प्रमुख अखाड़े हैं, जिनका समन्वय अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद करती है। किन्नर अखाड़े की शुरुआत मध्य प्रदेश में 2015 में हुई थी। 2016 के सिंहस्थ कुंभ से ठीक पहले यह अखाड़ा औपचारिक रूप से अस्तित्व में आया। 2019 के प्रयागराज कुंभ में किन्नर अखाड़े को जूना अखाड़े से संबद्ध बताते हुए शाही स्नान की अनुमति मिली थी। हालांकि, बाद में जूना अखाड़े के भीतर इस संबद्धता को लेकर मतभेद उभर आए। इसके बाद से किन्नर अखाड़ा अपनी स्वतंत्र पहचान को लेकर प्रयासरत रहा है।

परंपरागत विद्वानों की आपत्ति

किन्नर शंकराचार्य की घोषणा के बाद पारंपरिक धार्मिक विद्वानों और संतों की ओर से आपत्तियां सामने आई हैं। महामंडलेश्वर मनेश्वरानंद महाराज ने कहा कि शंकराचार्य पीठों की स्थापना के लिए परंपरागत पीठों की अनुमति आवश्यक होती है। उनके अनुसार, “शंकराचार्य की पीठों की अनुमति के बिना कोई नई पीठ नहीं बन सकती। आयोजकों को सभी अखाड़ों में जाकर अनुमति लेनी चाहिए थी। उनके प्रतिनिधि या पीठाधीश सम्मेलन में आते, तब इसे मान्यता मिलती।” इसी तरह भोपाल स्थित ज्योतिष मठ संस्थान के संचालक पंडित विनोद गौतम ने कहा कि सनातन परंपरा में आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मूल पीठ ही मान्य हैं। उन्होंने कहा कि “चार पीठों के अतिरिक्त पांचवां पीठ परंपरागत रूप से संभव नहीं है”।

आदि शंकराचार्य की चार पीठों की परंपरा

इतिहास के अनुसार, आदि शंकराचार्य ने भारत के चार दिशाओं में चार प्रमुख पीठों की स्थापना की थी-बद्रीनाथ (उत्तर), द्वारका (पश्चिम), पुरी (पूर्व), श्रृंगेरी (दक्षिण)। इन पीठों के शंकराचार्य सनातन धर्म की परंपराओं और सिद्धांतों के संरक्षक माने जाते हैं। इसी आधार पर पारंपरिक विद्वान किसी नई पीठ की स्थापना पर आपत्ति जता रहे हैं।

“नियम किन्नरों पर लागू नहीं”

विवाद के बीच किन्नर अखाड़ा के संस्थापक अजय दास ने विरोध का जवाब दिया। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य ने चार पीठों की स्थापना कर पुजारियों की नियुक्ति की थी, लेकिन शंकराचार्य पद को लेकर कोई स्पष्ट और बाध्यकारी प्रविधान नहीं है। अजय दास का कहना है, “उनके बनाए नियम मनुष्यों पर लागू होते हैं, किन्नरों पर नहीं, क्योंकि किन्नर मनुष्यों से ऊपर और देवतुल्य हैं। अभी तक बने शंकराचार्यों ने किन्नरों की कभी कोई चिंता नहीं की।” उन्होंने यह भी कहा कि किन्नर समुदाय को धार्मिक मुख्यधारा में सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए यह कदम उठाया गया है।

सामाजिक और धार्मिक विमर्श

यह मामला केवल धार्मिक पद की घोषणा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह परंपरा, अधिकार और प्रतिनिधित्व के व्यापक प्रश्नों को भी सामने लाता है। एक ओर किन्नर अखाड़ा इसे धार्मिक समानता और पहचान की दिशा में उठाया गया कदम बता रहा है, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक संत-महात्मा इसे सनातन परंपरा के स्थापित ढांचे के विरुद्ध मान रहे हैं। इस घटनाक्रम ने धार्मिक जगत में बहस को तेज कर दिया है कि परंपरा और परिवर्तन के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।

नई बहस छिड़ी

किन्नर अखाड़े की इस घोषणा को औपचारिक मान्यता मिलती है या नहीं, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद और अन्य परंपरागत पीठों की प्रतिक्रिया भी अहम रहेगी। फिलहाल, भोपाल सम्मेलन के इस फैसले ने शंकराचार्य परंपरा को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। जहां किन्नर अखाड़ा इसे अपने धार्मिक अधिकार और पहचान का विस्तार मान रहा है, वहीं पारंपरिक विद्वान इसे सनातन व्यवस्था के स्थापित ढांचे से बाहर का कदम बता रहे हैं। आने वाले दिनों में यह विवाद किस दिशा में जाता है, इस पर देशभर के धार्मिक और सामाजिक हलकों की नजर बनी रहेगी।


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