Top
Begin typing your search above and press return to search.

उनके जाने से जीवन विपन्न हो गया

मायारामजी सुरजन को पहली बार मैंने बलिगारिया की राजधानी सोफिया में देखा था

उनके जाने से जीवन विपन्न हो गया
X

- विश्वनाथ त्रिपाठी

मायारामजी सुरजन को पहली बार मैंने बलिगारिया की राजधानी सोफिया में देखा था। देखा था इसलिए क्योंकि वहां मेरी उनसे कोई बातचीत नहीं हुई। किसी ने परिचय भी नहीं कराया। जिस प्रतिनिधिमंडल में हम लोग गए थे, उसकी संख्या बहुत बड़ी थी। मैं दिल्ली से गया था, वे मध्यप्रदेश से। उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा लग रहा था और व्यक्तित्व आकर्षक सहज, सुन्दर था। उनके ज्येष्ठ पुत्र ललित सुरजन को मैं सतना- 1975 में देख चुका था। उनको कविरूप में जानता था।

1986-87 के आस-पास खैरागढ़ में कविता- शिविर लगा। बन्धुवर डॉ. कमला प्रसाद ने वहां आने के लिए निमंत्रित किया। उसकी देख-रेख मायाराम जी कर रहे थे। अनुमानत: यह आयोजन हिन्दी साहित्य सम्मेलन मध्यप्रदेश और प्रगतिशील लेखक संघ मध्यप्रदेश के सम्मिलित रूप में हो रहा था। मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ कि प्रगतिशील लेखक संघ और हिन्दी साहित्य सम्मेलन का मिलन कैसे हुआ? हिन्दी साहित्य सम्मेलन लगभग दक्षिण पंथियों के वर्चस्व में रहता है। बाद में जब मुझे मायारामजी के जादुई व्यक्तित्व का पता चला तब मालूम हुआ, कि वे संस्थाओं का उपयोग जनतांत्रिक कार्यों में करने में कितने माहिर हैं। खैरागढ़ में मैंने पहली बार देखा कि मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ कितना लोकप्रिय सार्वजनिक और समावेशी साहित्यिक आंदोलन है। कविता शिविर में सैकड़ों साहित्यकार जिनमें से अधिकांशत: युवा थे।

विनोद कुमार शुक्ल, प्रयाग शुक्ल, नरेश सक्सेना, वेणुगोपाल, राजेश जोशी- यह कहिए कौन नहीं था? वह शिविर कई दिनों तक का था। गर्मी के दिन थे बाहर चौकियों पर लोग सोते, साथ- साथ खाते- उठते बैठते, काव्य- पाठ करते, सुनते, विचार करते। वहां मैंने जो देखा, वह मेरे लिए अभूतपूर्व था। युवा कवियों ने इतनी अच्छी कविताएं सुनाईं, इतना अच्छा सामूहिक गान किया कि आयोजन का, साहित्यिक आंदोलन का अर्थ समझ में आया-यों कहें कि अर्थ का अनुभव हुआ। एक युवक था तरुण नियोगी वह करीब 50 युवा कवियों के साथ जुलूस में आगे- आगे गाता जा रहा था- मार हथौड़ा कर-कर चोट, वहां एक नया कवि था शायद राजीव सभरवाल जिसकी काव्य पंक्ति मुझे याद है- गिद्ध कितनी जल्दी आते हैं। उस शिविर में विनोदकुमार शुक्ल और नरेश सक्सेना का काव्य पाठ मैंने पहली बार सुना। हरिनारायण व्यास को देखा- मिला।

रमाकांत श्रीवास्तव से हल्की मुठभेड़ हुई और बाद में प्रगाढ़ मेल हो गया। वहां सबसे निकट मेरे कमला प्रसाद, लेकिन मैं देखता- मायाराम जी सर्वत्र रहते। मैं जानता था, कि वे देशबन्धु समाचार पत्र समूह के स्वामी- संपादक हैं, तो, उन्हें चौबीस घंटों विभिन्न सत्रों में मौजूद देखकर हैरानी होती। भोजन का जिम्मा किर्न्ही जोशी जी के जिम्मे था- भोजन सादा- स्वादिष्ट और देसीपन का स्वाद लिए हुए। पता नहीं उस शिविर में क्या हुआ, कि मायारामजी का स्नेह मुझे मिल गया और मैं उनके हर निवेदन पर पहुंच जाता।

मध्यप्रदेश में हिन्दी साहित्य सम्मेलन और प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलनों और समारोहों का आयोजन लगातार होता रहता। उसके वास्तविक आयोजक वे ही होते। कमलाप्रसादजी उनके प्रधान सहायक। लेकिन मायाराम जी के आत्मीयों, मित्रों, प्रशंसकों, सत्संगियों का माडल बहुत बड़ा था। राजनीति, साहित्य कला कर्म, अध्यापक कर्मचारी, श्रमिक, व्यापारी, समाजसेवी, सब लोगों से उनकी मित्रता और अधिकांशत: से मित्रता थी। वे परम विश्वसनीय व्यक्ति थे और सबकी सहायता करने को सदैव तत्पर। मैंने कभी नहीं पाया, कि वे कभी कहीं किसी अपने काम से गए हों, सदा दूसरों या संगठन के ही किसी काम से उन्हें व्यस्त मैंने देखा। जब कभी निमंत्रित करते तो स्टेशन पर अगवानी में जरुर मिलते, लौटते समय प्लेटफार्म पर विदा करते। प्राय: अपने घर ठहराते।

जलपान के समय अनेक मित्र आ जाते। सतना में भगवान दास सफडिया और प्रहलाद अग्रवाल जरूर होते, कमलाप्रसादजी तो होते ही। मैंने मायाराम जी संगत में बहुत सुख उठाया। जैसे वास्तविक सौंदर्य सहज होता है, वैसे ही सच्चा सुख भी सहज होता है, वह भी लगभग अनायास मिलता है। मायाराम जी के साथ सहज सुख का अनुभव होता था। एक बार वे हमें सतना से खजुराहो ले गए। साथ में भगवानदास सफाडिया और प्रहलाद अग्रवाल थे। खजुराहो से चित्रकूट। खजुराहो की मूर्तियों के बारे में तो सुन ही रखा था। देखा, मुझे उन मूर्तियों से ज्यादा सुंदर खजुराहो में मंदिरों की वास्तु कला लगी। उस मंदिर के समूह को अगर आप एक साथ पुंज में देखें, तो अनुपम सौंदर्य की प्रतीति होती है। और चित्रकूट जैसा मनोरम स्थल शायद कहीं अन्यत्र हो। चित्रकूट जाकर निराला को तुलसीदास और तुलसीदास का चित्रकूट वर्णन ठीक-ठाक समझ में आता है। वहां गुप्त गोदावरी में बैठकर आनंद लिया है। मायारामजी तब लगभग पैंसठ (65) वर्ष के थे। मैं उनसे लगभग 9 वर्ष छोटा था। मैंने देखा- धोती उठाए वे गुप्त गोदावरी के प्रवाह में हम लोगों के साथ उत्साहपूर्वक चल रहे थे। स्फटिक शिला पर बैठे तुलसीदास ने लिखा है- वहां के कोह- किरात राम से कहते हैं- हम लोग आपके वस्त्र आदि नहीं चुरा लेते यही हमारी सेवा है-

'लेहिन आस- बसन चुराई
इहइ हमार बड़ सेवकाई'

संयोग ऐसा हुआ कि मेरे जूते किसी ने चुरा लिए। जूते नए थे। मायारामजी ने कहीं से पदचरण का इंतजाम कर दिया। मन में सोचा- तुलसीदास के भी जूते या खड़ाऊं किसी कोल- किरात ने चुरा लिए थे क्या? मैंने कहा चित्रकूट में मधुमक्खियां शहद एकत्र करतीं होंगी- अच्छा शहद मिलता होगा यहां। मायारामजी कुछ बोले नहीं- लेकिन थोड़ी देर बाद कार एक छोटी सी दुकान पर रुकी। वहां शहद मिलता था। दुकानदार मायारामजी से मित्र भाव से मिला।

इस यात्रा से सुखद और अविस्मरणीय यात्रा मैंने कम की होगी। तब तक मुझे पता चल गया था, कि मायारामजी और हरिशंकर परसाई अंतरंग हैं। मायारामजी के एक लेख में पढ़ा कि देशबन्धु (या कोई अन्य समाचार पत्र) शुरु करने के लिए चंदा इक_ा करने का काम दोनों साथ-साथ करते थे और कैसे एक पान वाले ने इसके लिए चंदा दिया था। सिर्फ मायाराम जी ही नहीं बल्कि मायारामजी के सारे परिवार के साथ परसाई की अंतरंगता है। दोनों आजीवन एक दूसरे के सुख-दुख में शामिल रहे।परसाईजी अपने अंतिम दिनों तक देशबन्धु में लगातार लिखते रहे। सो मैंने परसाईजी को सूचित किया- मायारामजी ने बहुत साथ दिया। परसाई ने मुझे लिखा मुझे तुम्हारी सभी हरकतों के बारे में पता चल गया है। हरकतों का संबंध मायारामजी से नहीं, रमाकांत श्रीवास्तव से था। मायारामजी शाम को चाय पीते थे। हरकतबाजी नहीं करते थे।

मायारामजी देशबन्धु समाचार पत्र समूह के स्वामी थे। ऐसे आदमी को संपन्न ही कहा जाएगा। देशबन्धु रायपुर, सतना, भोपाल, जबलपुर, बिलासपुर कई स्थानों से निकलता है। लेकिन यह संभवत: ऐसा दुर्लभ पत्र समूह है, जिसके स्वामी समाचार पत्र प्रकाशित करने के अलावा कोई और उद्योग नहीं करते। फिर मायारामजी का बड़ा परिवार है। ऐसे गलाकाट प्रतियोगी माहौल में देशबन्धु निरंतर अर्थसंकट से गुजरता रहा होगा, जिसकी मुझे कोई व्यक्तिगत जानकारी नहीं है।
मायाराम संपन्न नहीं, विपन्न परिवार में जन्मे थे। उन्होंने कठिन आर्थिक एवं पारिवारिक स्थितियों से अपना जीवन संघर्ष प्रारंभ किया था। अपने जीवन- संघर्ष के विषय में जो कुछ उन्होंने लिखा है वह रोमांचक है।

मायारामजी संपादक थे। देशबन्धु में रोज लिखते थे। उन्होंने प्रचुर गद्य लेखन किया है। उन्होंने अपना जीवन संघर्ष तो लिखा ही है। दूसरों के बारे में कहीं ज्यादा लिखा है- यात्रावृत्त, संस्करण, संपादकीय, वैचारिक लेख- सब लिखा है- उनकी एक पुस्तक है- मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री, उसे पढ़कर लगता है कि क्षेत्रीय, प्रादेशिक, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्थितियों पर उनकी कितनी पैनी नजर थी। प्रदेश के अधिकांश मुख्यमंत्रियों से उनके गहरे संबंध थे। वे इनका सम्मान करते थे और समय- असमय विभिन्न समस्याओं पर इनसे परामर्श भी लेते थे। अर्जुनसिंह से मायारामजी के विशेष संबंध थे। उसका कारण विचारधारा और समान राजनैतिक दृष्टिकोण रहा होगा। मायारामजी को इन मुख्यमंत्रियों और अन्य महत्वपूर्ण राजनैतिक शख्सियतों के बारे में बहुत कुछ पता था लेकिन वे इन जानकारियों को मर्यादित सीमा और संयम से बरतते थे। इसी कारण उन सबका विश्वास अंत तक बना रहा।

मायारामजी का गद्य सुस्वच्छ सजीव और सहज है। पत्रकार की भाषा अस्पष्ट नहीं होनी चाहिए साथ ही उसे अमर्यादित भी नहीं होना चाहिए। अच्छे पत्रकार ऐसी भाषा में लिखते हैं, जो बेलाग तो हो लेकिन अनादर सूचक नहीं। मायारामजी का गद्य ऐसा था जिससे साहित्यकार भी बहुत कुछ सीख सकते हैं, उनके संस्मरण साहित्योचित नाट्य मनोरंजन और करुणा से भरे हैं जो पढ़ने पर साहित्य का आस्वाद देते हैं। मुझे मायाराम जी के गद्य में हिन्दी जातीयता और समाजवादी जनतांत्रिक सौंदर्य बोध का आस्वाद मिलता है। वह आडम्बर रहित, अतिरेक से बचती हुई, सुस्पष्ट और जानकारी बढ़ाने वाली है। अनुमानत: उनका अनछपा भी अभी बहुत बचा होगा। आशा है, कि वह सब कभी न कभी प्रकाश में आएगा।

मायाराम जी दिल्ली आते, तो मेरे यहां आने का कष्ट उठाते। फोन कर देते, ऑटो से आते। भोजन शायद उन्होंने कभी नहीं किया। लेकिन जल-पान करते। पत्नी से बच्चों से हाल-चाल पूछते। आश्वस्त करते। उनकी संगति में सपरिवार आश्वस्त अनुभव करता।

उनसे अंतिम भेंट भोपाल में हुई। हिन्दी साहित्य सम्मेलन में तार सप्तक के प्रकाशन के 50 वर्ष पूरा होने पर वृहद सम्मेलन समारोह आयोजित था। व्यापक स्तर पर विशाल साहित्यिक समूह उपस्थित था। सप्तकों के जीवित कवियों के सम्मान और साहित्य विमर्श का आयोजन था। आयोजक मायारामजी थे। पहुंचा तो पता चला, अस्पताल में हैं। हार्ट अटैक हुआ है। सन्न रह गया, वह अप्रत्याशित था। सारा उत्साह मंदा पड़ गया। डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन के साथ अस्पताल गया, तो देखा बिस्तर पर हैं। पहचाना, बात हुई। आगे की कुछ योजनाएं भी बताईं। मैं पूरी आशा के साथ लौटा।

उनके पुत्र आशान्वित थे। ललित ने कहा कि - ठीक है कोई खास बात नहीं।
भोपाल से लौटा, तो एक दिन सुबह देवेन्द्र उपाध्याय का फोन आया- बाबू जी नहीं रहे।
परसाईजी पहले ही जा चुके थे। अब तो कमलाप्रसादजी और भगवत रावत भी चले गए हैं।

हमारा जीवन विपन्न हो गया है। यह विपन्नता कैसे कम हो। मायारामजी का स्मरण, उनकी याद में किया जाने वाला कोई समारोह, कोई प्रयास इस विपन्नता को कम करता है।

-बी- 37, दिलशाद गार्डन
दिल्ली- 110032


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it