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महाराष्ट्र में 22 जून से मानसून सत्र, किसानों की कर्जमाफी पर सरकार-विपक्ष में तीखी बहस के आसार

महाराष्ट्र विधानसभा और विधान परिषद की बिजनेस एडवाइजरी कमेटी ने सोमवार को राज्य विधानसभा के मानसून सत्र की घोषणा की। यह सत्र 22 जून से शुरू होकर 10 जुलाई तक चलेगा।

महाराष्ट्र में 22 जून से मानसून सत्र, किसानों की कर्जमाफी पर सरकार-विपक्ष में तीखी बहस के आसार
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मुंबई। महाराष्ट्र विधानसभा और विधान परिषद की बिजनेस एडवाइजरी कमेटी ने सोमवार को राज्य विधानसभा के मानसून सत्र की घोषणा की। यह सत्र 22 जून से शुरू होकर 10 जुलाई तक चलेगा।

तीन हफ्ते का यह सत्र काफी हंगामेदार रहने की संभावना है। विपक्ष कई अहम मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी में है। इनमें किसानों की कर्जमाफी और राजनीतिक मुद्दे शामिल हैं।

सबसे बड़ा मुद्दा सरकार की हाल ही में घोषित 2 लाख रुपए की कृषि कर्जमाफी योजना को लेकर है। सरकार ने इसे किसानों के लिए बड़ी राहत बताया है, लेकिन विपक्ष ने इसमें कई शर्तों का आरोप लगाया है।

विपक्ष का कहना है कि जिन किसानों पर 2 लाख रुपए से अधिक कर्ज है, उन्हें पहले अपने पैसे से अतिरिक्त कर्ज चुकाना होगा। तभी वे 2 लाख रुपए की माफी का लाभ ले पाएंगे।

एनसीपी (शरद पवार गुट) के नेता जयंत पाटिल सहित विपक्षी नेताओं ने कहा कि पिछली कर्ज माफी योजना का लाभ लेने वाले किसानों को भी योजना से बाहर रखा जा सकता है, जिससे लाखों किसान प्रभावित होंगे।

इसी मुद्दे को लेकर एनसीपी (शरद पवार गुट) के विधायक रोहित पवार ने तीन दिन का अनशन किया था। उन्होंने इसे 'कठोर और भ्रामक शर्तें' बताते हुए हटाने की मांग की थी। हालांकि, उन्होंने सरकार से बातचीत का आश्वासन मिलने के बाद अनशन समाप्त कर दिया।

विपक्ष अब इस मुद्दे को विधानसभा और विधान परिषद दोनों में जोरदार तरीके से उठाने की तैयारी कर रहा है।

दूसरी ओर, सरकार के कई मंत्रियों ने कर्ज माफी योजना का बचाव किया है। उनका कहना है कि बिना किसी अतिरिक्त शर्त के लगभग 40 लाख किसानों को इसका लाभ मिलेगा।

कांग्रेस नेता और विधायक नाना पटोले ने सत्र की अवधि को लेकर सरकार की आलोचना की। उन्होंने कहा कि राज्य में जनता के बीच कई गंभीर मुद्दों को लेकर भारी नाराजगी है, इसलिए सत्र कम से कम एक महीने का होना चाहिए था, लेकिन यह केवल 14 कार्य दिवसों तक ही सीमित रहेगा।

उन्होंने सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि सत्र जल्दी खत्म करने का असली उद्देश्य सिर्फ अनुपूरक वित्तीय मांगों को पारित करना है, जबकि सरकार जनता की समस्याओं पर चर्चा करने में रुचि नहीं रखती।



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