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जयशंकर बोले- दुर्भाग्य से हमारे पड़ोसी बुरे,हमें अपने लोगों को आतंकवाद से बचाने का अधिकार
विदेश मंत्री ने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों पर कहा कि वर्षों पहले भारत ने पानी साझा करने जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी सहमति दिखाई थी, लेकिन अगर दशकों तक आतंकवाद जारी रहे तो अच्छे पड़ोसी होने की भावना टिक नहीं सकती।

चेन्नई: विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने शुक्रवार को तमिलनाडु के आईआईटी मद्रास में आयोजित कार्यक्रम के दौरान आतंकवाद, पड़ोसी देशों, वैश्विक कूटनीति और भारत की भूमिका को लेकर स्पष्ट और सख्त संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भारत दुर्भाग्य से ऐसे पड़ोस में है, जहां कुछ देश जानबूझकर, लगातार और बिना किसी पछतावे के आतंकवाद को बढ़ावा देते रहे हैं। ऐसे में भारत को अपने नागरिकों की सुरक्षा का पूरा अधिकार है और वह इस अधिकार का उपयोग कैसे करेगा, यह भारत स्वयं तय करेगा।
जयशंकर ने दो टूक कहा, “अगर कोई देश यह फैसला करता है कि वह आतंकवाद को अपनी नीति बनाए रखेगा, तो हमें अपने लोगों को उससे बचाने का अधिकार है। हम उस अधिकार का इस्तेमाल कैसे करेंगे, यह हम पर निर्भर करता है। कोई हमें यह नहीं बता सकता कि हमें क्या करना चाहिए या क्या नहीं करना चाहिए। अपनी रक्षा के लिए जो भी जरूरी होगा, हम करेंगे।”
पानी समझौते और अच्छे पड़ोसी की भावना पर सवाल
विदेश मंत्री ने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों पर कहा कि वर्षों पहले भारत ने पानी साझा करने जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी सहमति दिखाई थी, लेकिन अगर दशकों तक आतंकवाद जारी रहे तो अच्छे पड़ोसी होने की भावना टिक नहीं सकती। उन्होंने संकेत दिया कि पड़ोसियों के साथ रिश्ते केवल समझौतों से नहीं, बल्कि आपसी भरोसे और जिम्मेदार व्यवहार से चलते हैं।
बांग्लादेश को लेकर संतुलित टिप्पणी
बांग्लादेश में हालिया अशांति के सवाल पर जयशंकर ने कहा कि वह हाल ही में बांग्लादेश गए थे, जहां उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में हिस्सा लिया। उन्होंने कहा, “हमें कई तरह के पड़ोसी मिले हैं। अगर कोई पड़ोसी आपके लिए अच्छा है या कम से कम नुकसानदायक नहीं है, तो रिश्ते सहज रहते हैं। जहां भी अच्छे पड़ोसी होने की भावना होती है, भारत निवेश करता है, मदद करता है और साझेदारी निभाता है।”
भारत की सभ्यता, लोकतंत्र और वैश्विक जिम्मेदारी
जयशंकर ने कहा कि भारत दुनिया की उन प्राचीन सभ्यताओं में से है, जो आज भी एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में जीवित हैं। भारत को अपने इतिहास, संस्कृति और विरासत का स्पष्ट बोध है, जो बहुत कम देशों में देखने को मिलता है। उन्होंने कहा कि भारत ने जानबूझकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया और इसी कारण लोकतंत्र एक वैश्विक राजनीतिक विचार के रूप में मजबूत हुआ।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत की जिम्मेदारी है कि वह अपने विचार, संस्कृति और इतिहास को दुनिया के सामने रखे। पश्चिमी देशों के साथ साझेदारी को जरूरी बताते हुए उन्होंने कहा कि यह सहयोग सकारात्मक और रचनात्मक तरीके से किया जा सकता है।
‘वसुधैव कुटुंबकम’ और विदेश नीति की सोच
विदेश मंत्री ने कहा कि ‘वसुधैव कुटुंबकम’ भारत की मूल सोच है, जिसका अर्थ है कि भारत ने दुनिया को कभी दुश्मन या खतरे के रूप में नहीं देखा। सीमित संसाधनों के बावजूद अधिक प्रभाव डालना ही भारत की विदेश नीति का मूल मंत्र है। भारतीय कूटनीति अपनी ताकत, प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और वैश्विक संस्थानों के माध्यम से समाधान तलाशती है।
वैक्सीन डिप्लोमेसी का मानवीय असर
कोविड-19 काल का जिक्र करते हुए जयशंकर ने कहा कि भारत की वैक्सीन डिप्लोमेसी का भावनात्मक असर बेहद गहरा रहा। कई देशों में जब पहली वैक्सीन खेप पहुंची तो लोगों की आंखों में आंसू थे। उन्होंने कहा कि उस समय कई विकसित देशों ने जरूरत से ज्यादा वैक्सीन जमा कर ली थी, जबकि छोटे और गरीब देशों के लिए भारत की मदद ‘जीवनरेखा’ साबित हुई।
अरुणाचल पर अडिग रुख
अरुणाचल प्रदेश को लेकर विदेश मंत्री ने स्पष्ट कहा कि यह भारत का हिस्सा है और हमेशा रहेगा। शंघाई एयरपोर्ट पर अरुणाचल प्रदेश की एक महिला को चीनी इमिग्रेशन अधिकारियों द्वारा परेशान किए जाने के मामले पर उन्होंने कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि इस तरह की हरकतों से जमीनी सच्चाई नहीं बदलेगी।
आईआईटी मद्रास में कार्यक्रम और समझौते
जयशंकर ने आईआईटी मद्रास के वार्षिक कार्यक्रम ‘शास्त्र 2026’ का उद्घाटन भी किया। इस अवसर पर विदेशों में आईआईटी मद्रास की शाखाएं खोलने को लेकर कई समझौता ज्ञापनों (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए, जिससे भारतीय उच्च शिक्षा के वैश्विक विस्तार को नई गति मिलने की उम्मीद है।
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