हाईकोर्ट में समझौते के बाद भी उज्जैन में तनाव
हाईकोर्ट में समझौते के बाद उज्जैन की शाही मस्जिद से जुड़ा कानूनी विवाद एक स्तर पर सुलझ गया, लेकिन सोमवार की हिंसक झड़प के बाद प्रशासन ने इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी है. मस्जिद के प्रभावित हिस्से को हटाने का काम जारी है.

उज्जैन की शाही मस्जिद को लेकर चल रहे विवाद में सोमवार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश दिया. सोमवार को हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में दो जजों की खंडपीठ ने मस्जिद के एक हिस्से को सड़क चौड़ीकरण की जद से हटाने को लेकर दायर याचिकाएं खारिज कर दीं और दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते के आधार पर इन याचिकाओं का निपटारा कर दिया.
समझौते के मुताबिक मस्जिद का करीब तीन फीट का वो हिस्सा हटाया जाएगा जो सड़क को चौड़ा करने में बाधक बन रहा है. इसके साथ ही सड़क को चौड़ा करने का काम जारी रहेगा. एक दुकान को हटाने पर भी सहमति बनी है.
मस्जिद कमेटी की ओर मुकदमे की पैरवी कर रहे अधिवक्ता अजहर वारसी के मुताबिक, "कोर्ट ने इस शर्त के साथ अपील डिस्पोज कर दी है कि धार्मिक स्थल का सिर्फ तीन फीट हिस्सा ही हटाया जाएगा. इससे पहले उज्जैन नगर निगम और धार्मिक स्थल कमेटी के बीच भी समझौता हो चुका है.”
दरअसल, साल 2028 में होने वाले सिंहस्थ कुंभ की तैयारियों के लिए उज्जैन शहर में सड़क चौड़ीकरण का काम चल रहा है लेकिन हाईकोर्ट में समझौते के आधार पर मामले का निपटारा होने से पहले ही सोमवार सुबह उज्जैन में तनाव बढ़ चुका था.
रविवार रात से ही छतरी चौक इलाके में बड़ी संख्या में लोग मस्जिद के पास जमा हुए और सोमवार सुबह भीड़ और पुलिस के बीच झड़प हो गई, जो कुछ ही देर में हिंसक हो गई. और हाईकोर्ट में मामला सुलझने से पहले ही सोमवार सुबह उज्जैन में तनाव बढ़ गया. आस-पास के स्कूल और बाजार बंद कर दिए गए.
हिंसा में कैसे बदल गया शाही मस्जिद के एक हिस्से को गिराने का विवाद?
सड़क चौड़ीकरण के लिए मस्जिद के बाधक हिस्से को हटाने की कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में लोग जमा हुए. पुलिस और लोगों के बीच टकराव हुआ और वहां जुटे लोगों ने पुलिस पर पथराव किया. जवाब में पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बल का प्रयोग किया. कई लोगों को हिरासत में लिया गया है और मामले में एफआईआर भी दर्ज की गई है.
उज्जैन के पुलिस अधीक्षक प्रदीप शर्मा ने मीडिया को बताया कि मस्जिद के प्रभावित हिस्से को हटाने की कार्रवाई कमेटी की सहमति से लगातार जारी है. उनके मुताबिक, "सब कुछ संबंधित पक्षों की सहमति से हो रहा था लेकिन कुछ लोगों ने गलत खबरें फैलाने का काम किया. अफवाह फैलाई गई. इनमें कुछ सोशल मीडिया के कंटेंट क्रियेटर्स भी हैं. सात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है. अब तक 15 लोगों को हिरासत में लिया गया है. पुलिस सोशल मीडिया की लगातार निगरानी कर रही है. अफवाह फैलाने या भड़काऊ सामग्री पोस्ट करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है.”
दरअसल, रविवार रात प्रशासन और शहर काजी के बीच बातचीत के बाद प्रभावित हिस्सा खुद हटाने पर सहमति बन चुकी थी. शहर काजी की ओर से लोगों से अफवाहों पर ध्यान नहीं देने और मौके पर नहीं आने की अपील भी की गई थी. इसके बावजूद सोमवार सुबह बड़ी संख्या में लोग वहां पहुंच गए.
अरुणाचल में धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम पर क्यों बढ़ रहा है विवाद
शहर काजी खलीकुर्रहमान ने एक वीडियो संदेश जारी कर कहा, "मस्जिद का मामला रात में ही आपसी सहमति से सुलझ गया था. ऐसी कोई स्थिति नहीं है, जिसके लिए किसी को वहां जाने की जरूरत हो. जिस काम को पूरा करने का संकल्प लिया गया है, उसे पूरा किया जा रहा है. अफवाहों के कारण घर से बाहर निकलकर अनावश्यक रूप से मौके पर न जाएं.”
उज्जैन में क्यों तोड़े जा रहे हैं मंदिर और मस्जिद?
उज्जैन में 2028 में होने वाले सिंहस्थ कुंभ को देखते हुए शहर के पुराने हिस्सों में सड़कों को चौड़ा करने और यातायात व्यवस्था सुधारने का काम चल रहा है. सिंहस्थ प्रोजेक्ट के तहत उज्जैन में कंठाल चौराहे से गोपाल मंदिर की तरफ जाने वाली सड़क को करीब पंद्रह मीटर चौड़ा करने की योजना है. प्रशासन का तर्क है कि सिंहस्थ के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उज्जैन पहुंचेंगे, इसलिए अभी से सड़कों और दूसरी बुनियादी सुविधाओं को तैयार किया जा रहा है.
इसी सड़क के दायरे में शाही मस्जिद का करीब नौ फीट लंबा और चार फीट चौड़ा हिस्सा भी आ रहा है. हालांकि इस जद में सिर्फ शाही मस्जिद ही नहीं बल्कि कई मंदिर और तीन सौ से ज्यादा मकान भी आ रहे थे. कई धर्मस्थलों और मकानों को तोड़ा भी जा चुका है. लेकिन शाही मस्जिद के प्रबंधन से जुड़े पक्ष ने नगर निगम की कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
लखनऊ विश्वविद्यालय में नमाज और हनुमान चालीसा पर क्यों हुआ विवाद
याचिका में कहा गया था कि सड़क चौड़ीकरण के कारण मस्जिद के प्रार्थना स्थल का हिस्सा, करीब 120 फुट ऊंची मीनार और आसपास का हिस्सा प्रभावित होगा. मस्जिद प्रबंधन ने धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संपत्ति से जुड़े संवैधानिक अधिकारों का भी हवाला दिया था. लेकिन नगर निगम ने अदालत में कहा कि कार्रवाई तय कानूनी प्रक्रिया के तहत हो रही है और सड़क चौड़ीकरण के लिए दूसरे धार्मिक निर्माणों के खिलाफ भी कार्रवाई की गई है.
हाईकोर्ट में नगर निगम की ओर से बताया गया कि इसी सड़क पर पहले ही दस मंदिरों और एक मस्जिद के हिस्से हटाए जा चुके हैं. 9 सितंबर को हाईकोर्ट की इंदौर बेंच की एकल पीठ ने मस्जिद पक्ष की दोनों याचिकाएं खारिज कर दी थीं. अदालत ने माना कि नगर निगम ने आवश्यक प्रक्रिया का पालन किया है.
इसके बाद मस्जिद पक्ष ने डिवीजन बेंच का रुख किया लेकिन सोमवार को वहां भी याचिका खारिज कर दी गई और फिर वहीं से समझौते का रास्ता निकला. डिवीजन बेंच के सामने दोनों पक्षों ने बताया कि उनके बीच समझौता हो गया है. समझौते के तहत सड़क में बाधक बन रही मस्जिद की तीन फीट जगह साफ की जाएगी, कुछ दुकानें हटेंगी, बड़ी मीनार को दूसरी ओर शिफ्ट किया जाएगा और दुकानों के लिए दूसरी जगह दी जाएगी.
शाही मस्जिद के 650 साल पुरानी होने का दावा कितना सही है?
मस्जिद के निर्माण की तारीख और इसे बनवाने वाले शासक को लेकर हालांकि अलग-अलग दावे हैं. मस्जिद के इमाम और प्रबंधन का कहना है कि इसका निर्माण 1390 में हुआ था और यह करीब 636 साल पुरानी है. लेकिन मौजूदा सार्वजनिक दस्तावेजों में इस तारीख की स्वतंत्र पुष्टि नहीं मिलती. 17 मार्च 1925 के सिंधिया-कालीन टाउन इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट के दस्तावेज और 1985 के मध्य प्रदेश सरकार के राजपत्र में मस्जिद के अस्तित्व का उल्लेख जरूर मिलता है, लेकिन इनमें इसके निर्माण की तारीख 1390 नहीं दी गई है.
जर्मनी की नई धार्मिक विविधता: बंद हो रहे चर्च, खुल रहे नए धार्मिक स्थल
दिलावर खान का नाम मालवा में इस दौर की मस्जिदों के इतिहास में जरूर आता है. इतिहासकार रिचर्ड ईटन ने मालवा के इतिहास पर अपने अध्ययन में लिखा है कि स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने के बाद दिलावर खान ने उज्जैन समेत मालवा के प्रमुख शहरों में जामा मस्जिदों का निर्माण कराया था. लेकिन उनके इस उल्लेख से मौजूदा शाही मस्जिद की पहचान या 1390 की निर्माण-तिथि स्थापित नहीं होती.
उज्जैन की ‘बिना नींव की मस्जिद' के लिए 1403-04 का एक फारसी शिलालेख उपलब्ध है, जिसमें दिलावर खान द्वारा जामा मस्जिद की नींव रखे जाने का जिक्र है. लेकिन जानकारों का कहना है कि उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर इस शिलालेख को मौजूदा शाही मस्जिद से जोड़ना संभव नहीं है.


