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कई स्कूलों में लैब ही नहीं, कैसी होगी प्रायोगिक परीक्षा?

जांजगीर ! सरकारी स्कूलों में पिछले 2 वर्षो से शिक्षा गुणवत्ता वर्ष मनाया जा रहा है। मगर इन स्कूलों में आवश्यक संसाधनों के प्रति विभागीय लापरवाही कम होने का नाम नहीं ले रहा।

कई स्कूलों में लैब ही नहीं, कैसी होगी प्रायोगिक परीक्षा?
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16 से शुरू हो रही परीक्षाएं, निभाई जाएगी सिर्फ औपचारिकता
जांजगीर ! सरकारी स्कूलों में पिछले 2 वर्षो से शिक्षा गुणवत्ता वर्ष मनाया जा रहा है। मगर इन स्कूलों में आवश्यक संसाधनों के प्रति विभागीय लापरवाही कम होने का नाम नहीं ले रहा। आज भी जिले के अधिकांश स्कूलों में प्रायोगिक कार्य महज खानापूर्ति तक सिमट कर रह गया है। इस ओर शिक्षा विभाग कभी फंड जारी कर भी दे तो राशि का बंदर बाट के चलते छात्रों तक उपकरण नहीं पहुंच पाता। अब एक बार फिर 16 जनवरी से दसवी व बारहवी की प्रायोगिक परीक्षाएं शुरू होने जा रही है, ऐसे में फिर से रस्म आदयगी स्कूलों में निभाई जायेगी।
गौरतलब है कि इस बार स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा सीबीएसई के पैटर्न लागू करने के चलते हाई व हायर सेकेण्डरी स्कूलों में बोर्ड परीक्षा 10 फरवरी से शुरू होने जा रहा है, वही इन कक्षाओं की प्रायोगिक परीक्षा 16 जनवरी से 30 जनवरी तक सम्पन्न कराने का निर्देश बोर्ड से भेजा गया है। जिसकी तैयारी किसी भी स्कूल ने नहीं करायी है। वजह एकदम स्पष्ट है कि इन स्कूलों में अलग से लैब या तो है नहीं या फिर विषय विशेषज्ञ शिक्षकों का अभाव है। इसके आलावा स्कूलों में कुछ गिने चुने प्रायोगिक उपकरण उपलब्ध है। जिन्हे बच्चों को प्रादर्श के रूप में दिखा कर प्रायोगिक कार्य की औपचारिकता निभायी जाती है। सरकारी आंकड़ों पर नजर डाले तो जिले में 125 शासकीय हाईस्कूल व 153 हायर सेकेण्डरी स्कूल है। इतने ही निजी स्कूल भी संचालित हो रहे हैं। अधिकतर निजी स्कूलों में लैब की व्यवस्था नहीं है। हायर सेकेण्डरी में बायोलॉजी, कैमिस्ट्री, फिजिक्स, भूगोल व पर्यावरण की प्रेक्टिकल कराना आवश्यक है, लेकिन विद्यार्थियों को सिर्फ कॉपी-नोट्स में थ्योरी करवाकर प्रयोगिक परीक्षा की औपचारिकता निभाई जा रही है। ऐसे में विद्यार्थियों को प्रायोगिक का वास्तविक ज्ञान नहीं मिल पा रहा है और आगे की पढ़ाई में उन्हें कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। उल्लेखनीय है कि प्रायवेट स्कूल के संचालकों द्वारा मान्यता प्राप्त करने के दौरान स्कूल में सारी सुविधाएं विद्यार्थियों को दिए जाने की गारंटी दी जाती है। इन सुविधाओं में लैब की सुविधा अनिवार्य होती है, लेकिन मान्यता मिलने के बाद अधिकतर प्रायवेट स्कूल संचालकों द्वारा इस नियम को दरकिनार कर संचालन किया जाता है, वहीं स्कूल में एडमिशन के समय पालकों से मोटी फीस ली जाती है। ऐसे में एक ओर जहां बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है वहीं प्रेक्टिकल के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है।
प्रायोगिक कक्ष इतिहास की बात
आज से 2 दशक पूर्व जिले में कुछ नामचीन सरकारी विद्यालय ऐसे हुआ करते थे जहां न सिर्फ शिक्षक समर्पित भाव से अध्यापन कराते बल्कि इन स्कूलों में सुसज्जित प्रायोग कक्ष भी हुआ करता था। जहां छात्र प्रायोगिक कार्य में दक्ष बनाये जाते थे। मगर वर्तमान में शिक्षा के स्तर के लगातार गिरावट व प्रायोगिक सामाग्री में कमीशन खोरी के चलते प्रायोगिक कार्य महज औपचारिक बन कर रह गया है। जहां प्रायोगिक परीक्षा के दिन चंद उपकरणो को प्रादर्श के रूप में रख कर परीक्षा की औपचारिकता निभा दी जाती है।
ये सुविधाएं होनी चाहिए
सभी निजी एवं शासकीय शालाओं में प्रायोगिक लैब, दर्ज संख्या के हिसाब से सहायक विज्ञान शिक्षक, प्रत्येक प्रायोगिक विषय के लिए कालखंड का निर्धारण, शिक्षकों द्वारा प्रायोगिक कार्यों की सतत मॉनिटरिंग, विद्यार्थियों से रिकार्ड, मॉडल का निर्माण कराना होता है।


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