कर्नाटक के CM सिद्धारमैया ने किया इस्तीफे का ऐलान, शिवकुमार ने छुए पैर और लगाया गले
इस्तीफे के औपचारिक ऐलान से पहले मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने बेंगलुरु में अपने सरकारी आवास पर एक 'ब्रेकफास्ट मीटिंग' (नाश्ते पर बैठक) बुलाई थी। इस बैठक में उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार समेत कैबिनेट के तमाम मंत्री शामिल हुए।

बेंगलुरु: कर्नाटक में लंबे समय से चल रही सियासी खींचतान और अटकलों पर विराम लगाते हुए मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने पद से इस्तीफा देने का आधिकारिक ऐलान कर दिया है। सिद्धारमैया के इस फैसले के बाद राज्य के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है। कर्नाटक कांग्रेस में सत्ता परिवर्तन की यह पटकथा दिल्ली से लेकर बेंगलुरु तक कई दौर की बैठकों के बाद लिखी गई है।
मंत्रियों के साथ नाश्ता और इस्तीफे का ऐलान
इस्तीफे के औपचारिक ऐलान से पहले मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने बेंगलुरु में अपने सरकारी आवास पर एक 'ब्रेकफास्ट मीटिंग' (नाश्ते पर बैठक) बुलाई थी। इस बैठक में उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार समेत कैबिनेट के तमाम मंत्री शामिल हुए। सभी नेताओं ने एक साथ बैठकर इडली, चटनी, वड़ा और केसरी भात जैसे पारंपरिक व्यंजनों का लुत्फ उठाया। इस सौहार्दपूर्ण माहौल के बीच सिद्धारमैया ने मंत्रियों के साथ अपनी आखिरी बैठक की। राज्य के गृह मंत्री ने बैठक से पहले ही इस बात की पुष्टि कर दी थी कि मुख्यमंत्री ने सभी मंत्रियों को धन्यवाद देने और आभार जताने के लिए नाश्ते पर आमंत्रित किया है, जिसके तुरंत बाद वह अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। नाश्ते की मेज पर ही सिद्धारमैया ने कैबिनेट के सहयोगियों के सामने अपने इस्तीफे की घोषणा की।
दोपहर 3 बजे लोकभवन में सौंपेंगे कमान
तय कार्यक्रम के मुताबिक, सिद्धारमैया दोपहर तीन बजे बेंगलुरु स्थित लोकभवन जाएंगे, जहां वह राज्यपाल कार्यालय को अपना आधिकारिक इस्तीफा सौंपेंगे। दिलचस्प बात यह है कि इस ऐतिहासिक राजनीतिक घटनाक्रम के बीच कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत इस समय बेंगलुरु में मौजूद नहीं हैं। पारिवारिक कारणों से राज्यपाल थावरचंद गहलोत मध्य प्रदेश के इंदौर दौरे पर हैं, जहां उनके किसी करीबी रिश्तेदार के बीमार होने की खबर है। राज्यपाल की अनुपस्थिति के कारण सिद्धारमैया का इस्तीफा राजभवन के वरिष्ठ अधिकारियों या तय प्रक्रिया के तहत राजभवन सचिवालय को सुपुर्द किया जाएगा।
ढाई-ढाई साल का वो 'सीक्रेट फॉर्मूला'
कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन की इस कहानी की शुरुआत मई 2023 में ही हो गई थी। 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की प्रचंड जीत के बाद 23 मई को सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री और डीके शिवकुमार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। उस समय आलाकमान ने दोनों नेताओं को शांत करने के लिए 'ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला' तय किया था। इसके तहत पहले ढाई साल सिद्धारमैया को और शेष ढाई साल डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी जानी थी। हालांकि, सरकार के तीन साल पूरे होने के बाद भी जब सत्ता का हस्तांतरण नहीं हुआ, तो कर्नाटक कांग्रेस दो धड़ों में बंट गई। सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के समर्थक आमने-सामने आ गए और डीके खेमे ने लगातार अपने नेता को मुख्यमंत्री बनाने के लिए आलाकमान पर दबाव बनाना शुरू कर दिया।
कुर्सी छोड़ने के पीछे 'बिहार मॉडल'
सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया यूं ही मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए हैं। इसके लिए उन्होंने पार्टी आलाकमान के सामने बेहद कड़ी शर्तें रखी हैं, जिसे कांग्रेस नेतृत्व ने स्वीकार कर लिया है। राजनीतिक गलियारों में इसे 'बिहार मॉडल' की तरह देखा जा रहा है, जहां अतीत में वरिष्ठ नेताओं को केंद्र की राजनीति में भेजकर राज्य में नए समीकरण बनाए गए थे।
सिद्धारमैया को मनाने के लिए आलाकमान ने उन्हें निम्नलिखित ऑफर दिए हैं:
बेटे के लिए बड़ा पद: सिद्धारमैया के बेटे को कैबिनेट में शामिल किया जाएगा और उन्हें उपमुख्यमंत्री (डिप्टी सीएम) या अहम मंत्रालय देने पर सहमति बनी है।
केंद्र की राजनीति में एंट्री: सिद्धारमैया को खुद दिल्ली की राजनीति में सम्मानजनक स्थान देने के लिए कांग्रेस के कोटे से राज्यसभा सीट का आश्वासन दिया गया है।
राहुल गांधी की मध्यस्थता
बीते कुछ दिनों से कर्नाटक का यह सियासी नाटक दिल्ली के गलियारों में घूम रहा था। डीके शिवकुमार के बढ़ते दबाव के बाद दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान की एक बेहद महत्वपूर्ण और गुप्त बैठक आयोजित की गई थी। इस गतिरोध को तोड़ने के लिए खुद राहुल गांधी को कमान संभालनी पड़ी। राहुल गांधी ने सिद्धारमैया से सीधे बातचीत की और उन्हें भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं और पार्टी की एकजुटता का हवाला देकर पद छोड़ने के लिए राजी किया। आलाकमान के इसी हस्तक्षेप और शर्तों पर बनी सहमति के बाद आखिरकार सिद्धारमैया ने भारी मन से ही सही, लेकिन डीके शिवकुमार के लिए रास्ता छोड़ने का फैसला कर लिया। अब देखना यह होगा कि नई कैबिनेट के गठन और डीके शिवकुमार के शपथ ग्रहण के बाद कर्नाटक कांग्रेस का यह आंतरिक असंतोष पूरी तरह शांत हो पाता है या नहीं।


