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झारखंड में बेकाबू हाथी का आतंक, एक सप्ताह में 22 की मौत; पकड़ने के लिए उतारे गए 8 IFS और 100 से अधिक वनकर्मी
झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में झुंड से बिछड़ा एक हाथी बीते एक सप्ताह से लगातार उत्पात मचा रहा है। अब तक 22 लोगों की जान ले चुका यह हाथी स्थानीय लोगों के लिए दहशत का पर्याय बन गया है।

चाईबासा (पश्चिमी सिंहभूम)। झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में झुंड से बिछड़ा एक हाथी बीते एक सप्ताह से लगातार उत्पात मचा रहा है। अब तक 22 लोगों की जान ले चुका यह हाथी स्थानीय लोगों के लिए दहशत का पर्याय बन गया है। तमाम प्रयासों के बावजूद शनिवार रात तक वन विभाग हाथी को काबू में करने में सफल नहीं हो सका। हाथी बचाव दल को बार-बार चकमा दे रहा है, जिससे रेस्क्यू अभियान जटिल होता जा रहा है।
सीमा पार कर फिर लौट आया हाथी
शुक्रवार शाम को यह सूचना मिलने पर कि हाथी झारखंड की सीमा से बाहर निकल गया है, वन विभाग की टीम ने कुछ राहत की सांस ली थी। लेकिन यह राहत अल्पकालिक साबित हुई। देर रात वही हाथी झारखंड-ओडिशा सीमा से सटे बेनीसागर के जंगल में दोबारा लौट आया। यही वह इलाका है, जहां हाल के दिनों में हाथी ने दो ग्रामीणों और उसे खदेड़ने आई पश्चिम बंगाल की टीम के एक सदस्य की जान ले ली थी।
हाथी की अप्रत्याशित गतिविधियों और बार-बार दिशा बदलने से बचाव दल की रणनीति बार-बार विफल हो रही है। वन विभाग के अनुसार, हाथी लगातार अपने मूवमेंट का पैटर्न बदल रहा है, जिससे उसे ट्रैक करना और सुरक्षित तरीके से बेहोश करना बेहद कठिन हो गया है।
भारी बल तैनात, लेकिन चुनौती बरकरार
हाथी पर काबू पाने के लिए व्यापक स्तर पर बल तैनात किया गया है। वर्तमान में आठ भारतीय वन सेवा (आईएफएस) अधिकारी और 100 से अधिक वनकर्मी प्रभावित क्षेत्र में कैंप कर रहे हैं। इसके अलावा 60 सदस्यीय क्विक रिस्पांस टीम (क्यूआरटी) और 40 फॉरेस्ट गार्ड लगातार निगरानी में जुटे हैं। हाथी को बेहोश करने के लिए तीन ट्रैंक्विलाइज गन के साथ 12 विशेषज्ञों की टीम तैनात की गई है।
इसके बावजूद अभियान को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है। अधिकारियों का कहना है कि हाथी का रात में आक्रामक होना सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि अंधेरे में उसकी गतिविधियों पर नजर रखना और लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना कठिन हो जाता है।
ग्रामीणों की भीड़ बन रही बड़ी बाधा
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) संजीव कुमार ने बताया कि हाथी के रेस्क्यू में भारी भीड़ सबसे बड़ी बाधा बनकर सामने आ रही है। उन्होंने कहा कि इलाके में धारा 144 लागू होने के बावजूद बड़ी संख्या में ग्रामीण घटनास्थल के आसपास जमा हो जा रहे हैं, जिससे ऑपरेशन में जोखिम बढ़ रहा है। पीसीसीएफ के अनुसार, हाथी रात में हमला कर रहा है और ऐसे में भीड़ की मौजूदगी किसी भी वक्त बड़े हादसे को न्योता दे सकती है। उन्होंने यह भी बताया कि यह इलाका नक्सल प्रभावित रहा है, इसलिए सुरक्षा के इस पहलू को ध्यान में रखते हुए वन विभाग को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ रही है।
नक्सल प्रभावित क्षेत्र में अतिरिक्त सतर्कता
नक्सल पृष्ठभूमि वाले इस इलाके में रात के समय ऑपरेशन चलाना अपने आप में चुनौतीपूर्ण है। वन विभाग की टीमें न केवल हाथी की गतिविधियों पर नजर रख रही हैं, बल्कि सुरक्षा एजेंसियों के साथ समन्वय बनाकर भी काम कर रही हैं। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी तरह की चूक जानलेवा साबित हो सकती है।
लोगों से घरों में रहने की अपील
एहतियात के तौर पर वन विभाग ने बेनीसागर, तिलोकुटी और आसपास के गांवों के लोगों से घरों से बाहर न निकलने की अपील की है। ग्रामीणों को विशेष रूप से रात के समय खेतों और जंगल की ओर जाने से मना किया गया है। प्रशासन का कहना है कि लोगों की सतर्कता ही इस समय सबसे बड़ा बचाव है।
भविष्य की तैयारी पर मंथन
पश्चिम बंगाल और ओडिशा की टीमों के सहयोग को लेकर पूछे गए सवाल पर पीसीसीएफ संजीव कुमार ने कहा कि इस तरह की आकस्मिक घटनाओं में राज्यों के बीच सहयोग पहले से होता रहा है और आगे भी रहेगा। साथ ही उन्होंने संकेत दिए कि झारखंड में स्थायी विशेषज्ञ हाथी रेस्क्यू टीम और अलग हाथी रेस्क्यू सेंटर स्थापित करने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
फिलहाल, पूरे इलाके में तनाव का माहौल बना हुआ है और ग्रामीणों की नजरें वन विभाग की कार्रवाई पर टिकी हैं। हाथी पर काबू पाने तक प्रशासन और स्थानीय लोगों की चिंता कम होने के आसार नहीं दिख रहे हैं।
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