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राष्ट्रीय शिक्षा नीति की सोच अच्छी, लेकिन जमीनी अमल अभी बहुत धीमा : सुकृति सूरी

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 को समावेशी शिक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताते हुए दृष्टिबाधित छात्रा सुकृति सूरी ने कहा कि नीति की सोच और उद्देश्य सकारात्मक हैं, लेकिन इसका प्रभाव तभी दिखाई देगा, जब इसे जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू किया जाएगा

राष्ट्रीय शिक्षा नीति की सोच अच्छी, लेकिन जमीनी अमल अभी बहुत धीमा : सुकृति सूरी
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जम्मू। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 को समावेशी शिक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताते हुए दृष्टिबाधित छात्रा सुकृति सूरी ने कहा कि नीति की सोच और उद्देश्य सकारात्मक हैं, लेकिन इसका प्रभाव तभी दिखाई देगा, जब इसे जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू किया जाएगा। उन्होंने दिव्यांग छात्रों के लिए सुलभ शिक्षण संसाधनों, सहायक तकनीकों, प्रशिक्षित शिक्षकों, निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली और मजबूत शिकायत निवारण तंत्र की आवश्यकता पर जोर दिया।

सुकृति सूरी ने कहा कि 2020 में जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति जारी हुई थी, तब उन्हें शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलावों की उम्मीद थी। हालांकि, बदलाव की प्रक्रिया काफी धीमी रही है। सरकार की ओर से कई डिजिटल ऐप और तकनीकी संसाधन विकसित किए जा रहे हैं, लेकिन इनका लाभ सभी सरकारी और निजी स्कूलों तक समान रूप से नहीं पहुंच पा रहा है। कई स्कूलों में स्मार्ट बोर्ड और आवश्यक डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, जिससे नई शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहा।

उन्होंने कहा कि एनईपी में प्रैक्टिकल आधारित शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया है, जो एक अच्छी पहल है। लेकिन, इसके लिए जिस तरह के बुनियादी ढांचे और संसाधनों की आवश्यकता है, वे अभी पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं। केवल पाठ्यक्रम का बोझ कम करने या छात्रों पर तनाव घटाने से उद्देश्य पूरा नहीं होगा, बल्कि व्यावहारिक शिक्षा के अनुरूप स्कूलों को भी तैयार करना होगा। स्कूल स्तर पर छात्रों को कम तनाव देने और पाठ्यक्रम को सरल बनाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन कॉलेज में प्रवेश के लिए कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (सीयूईटी) जैसी परीक्षाओं का स्वरूप पूरी तरह अलग है। ऐसे में छात्र अचानक बदल चुकी परीक्षा प्रणाली के लिए तैयार नहीं होते और इससे मानसिक दबाव बढ़ जाता है।

उन्होंने कहा कि केवल मल्टीपल चॉइस प्रश्नों (एमसीक्यू) के आधार पर छात्रों का मूल्यांकन करना पूरी तरह उचित नहीं है। इस प्रकार की परीक्षा किसी छात्र की विषय की गहराई से समझ और विश्लेषण क्षमता का सही आकलन नहीं कर पाती। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रतियोगी परीक्षाओं में वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के साथ कुछ वर्णनात्मक या विश्लेषणात्मक प्रश्न भी शामिल किए जाने चाहिए। इसके साथ ही, स्कूल और कॉलेज में छात्रों के शैक्षणिक प्रदर्शन को भी प्रवेश प्रक्रिया में महत्व मिलना चाहिए।

सुकृति ने एनईपी के उस प्रावधान की सराहना की, जिसमें छात्रों को विभिन्न विषयों के संयोजन चुनने की स्वतंत्रता देने की बात कही गई है। उन्होंने कहा कि यदि कोई छात्र भौतिकी के साथ इतिहास पढ़ना चाहता है तो उसे ऐसा अवसर मिलना चाहिए, लेकिन अभी तक यह व्यवस्था व्यवहारिक रूप से अधिकांश संस्थानों में लागू होती दिखाई नहीं देती। इस दिशा में गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है। विशेषकर सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को चुनाव ड्यूटी और अन्य प्रशासनिक कार्यों में लगातार लगाया जाता है, जिससे स्कूलों की पढ़ाई प्रभावित होती है। ऐसे कार्यों के लिए अलग से कर्मचारियों की नियुक्ति की जानी चाहिए ताकि रोजगार के अवसर भी बढ़ें और शिक्षकों का पूरा ध्यान शिक्षा पर केंद्रित रहे।

उन्होंने मांग की कि दिव्यांग छात्रों से जुड़े मामलों के लिए एक समर्पित शिकायत निवारण पोर्टल बनाया जाए, जहां शिकायतों का समयबद्ध समाधान सुनिश्चित हो। नीति स्तर पर कई अच्छी बातें मौजूद हैं, लेकिन सबसे बड़ी आवश्यकता उनके प्रभावी क्रियान्वयन की है। उन्होंने सरकार से अपील की कि नीति लागू करने के दौरान शिक्षा विशेषज्ञों और दिव्यांगजनों के साथ काम करने वाले विशेषज्ञों की राय को प्राथमिकता दी जाए।

पेपर लीक मामलों पर सुकृति सूरी ने कहा कि ऐसी घटनाएं छात्रों के मनोबल और पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में छात्र वर्षों तक मानसिक, शारीरिक और आर्थिक संघर्ष करते हैं। ऐसे में यदि पेपर लीक हो जाती है या उसमें गड़बड़ी की आशंका सामने आती है तो छात्रों का सिस्टम पर भरोसा कमजोर पड़ जाता है।


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