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नेतृत्व की असली परीक्षा अल्पसंख्यकों और पड़ोसी देशों से रिश्तों में होती है: पीडीपी

जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के प्रवक्ता सैयद तजामुल ने प्रधानमंत्री मोदी के 4399 दिन के कार्यकाल को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी।

नेतृत्व की असली परीक्षा अल्पसंख्यकों और पड़ोसी देशों से रिश्तों में होती है: पीडीपी
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के प्रवक्ता सैयद तजामुल ने प्रधानमंत्री मोदी के 4399 दिन के कार्यकाल को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि किसी भी देश के प्रधानमंत्री या नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा इस बात से होती है कि वह अपने देश के भीतर राजनीतिक संरचना को किस तरह मजबूत करता है, अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार रखता है और प्रशासनिक व्यवस्था का उपयोग किस प्रकार करता है। इसके साथ ही चुनावी प्रक्रिया, लोकतांत्रिक संस्थाएं और उनके परिणाम भी किसी नेतृत्व की कार्यशैली को परिभाषित करते हैं।

ताजमुल ने कहा कि उपमहाद्वीप में ऐतिहासिक रूप से यह परंपरा रही है कि यहां जो भी नेतृत्व आता है, उसका कार्यकाल लंबी अवधि तक चलता है। उन्होंने कहा कि चाहे भारत हो या उसके पड़ोसी देश, राजनीतिक नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वह अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को किस तरह संभालता है और क्षेत्रीय स्थिरता में किस स्तर तक योगदान देता है।

सैयद ताजमुल ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने कार्यकाल के दौरान कई स्तरों पर रिकॉर्ड बनाए हैं, जिन्हें इतिहास में दर्ज किया जाएगा। उन्होंने कहा कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्रियों जैसे जवाहरलाल नेहरू और अटल बिहारी वाजपेयी के योगदान भी देश के राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं और प्रत्येक नेता का अपना अलग प्रभाव और योगदान रहा है।

उन्होंने आगे कहा कि वर्तमान समय में सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत का नेतृत्व मुस्लिम समुदाय के साथ किस तरह के संबंध रखता है, न केवल देश के भीतर बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी, विशेषकर पश्चिम एशिया और उपमहाद्वीप के संदर्भ में। उन्होंने कहा कि किसी भी प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता इस बात पर भी निर्भर करती है कि वह देश के सभी समुदायों को साथ लेकर चलने में कितना सफल होता है।

ताजमुल ने कहा कि विकास हर सरकार का प्रमुख लक्ष्य होता है, चाहे वह जीडीपी वृद्धि हो, आर्थिक नीतियां हों या अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों जैसे वर्ल्ड बैंक और आरबीआई के साथ तालमेल। लेकिन किसी भी सरकार की असली परीक्षा यह होती है कि वह देश के विभिन्न समुदायों को किस हद तक समान रूप से साथ लेकर चलती है और एक 'पिता तुल्य' भूमिका निभाते हुए सभी नागरिकों की आवश्यकताओं को कैसे संतुलित करती है।


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