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घरेलू हिंसा पीड़ित महिलाओं को आवास सुरक्षा पाने के लिए केस खत्म होने का इंतजार करने की जरूरत नहीं : हाईकोर्ट

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने सोमवार को कहा कि घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को रहने के लिए अंतरिम सुरक्षा पाने के लिए मुकदमे के खत्म होने का इंतजार करने की जरूरत नहीं है।

घरेलू हिंसा पीड़ित महिलाओं को आवास सुरक्षा पाने के लिए केस खत्म होने का इंतजार करने की जरूरत नहीं : हाईकोर्ट
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने सोमवार को कहा कि घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को रहने के लिए अंतरिम सुरक्षा पाने के लिए मुकदमे के खत्म होने का इंतजार करने की जरूरत नहीं है।

जस्टिस संजय धर ने कहा कि घरेलू हिंसा कानून के तहत पीड़ित महिला को रहने की जगह के लिए अंतरिम सुरक्षा पाने के लिए ट्रायल खत्म होने का इंतजार करने की जरूरत नहीं है क्योंकि ऐसी राहत का मकसद रहने की जगह और सुरक्षा की तत्काल जरूरत को पूरा करना है।

जस्टिस धर एक महिला की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें कुपवाड़ा के प्रिंसिपल सेशंस जज के आदेश को चुनौती दी गई थी। इस आदेश ने ट्रायल कोर्ट के उस निर्देश को रद्द कर दिया था जिसमें महिला के पति को उसे साझा घर में सुरक्षित रहने की जगह देने के लिए कहा गया था।

हाईकोर्ट ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 23 के दायरे की जांच की। यह धारा मजिस्ट्रेट को अधिनियम की धारा 12 के तहत शुरू की गई कार्यवाही के दौरान अंतरिम राहत (जिसमें रहने की जगह का अंतरिम आदेश भी शामिल है) देने का अधिकार देती है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हालांकि धारा 19 के तहत रहने की जगह का अंतिम आदेश धारा 12 के तहत आवेदन पर अंतिम निर्णय लेते समय पारित किया जा सकता है लेकिन रहने की जगह का अंतरिम आदेश कार्यवाही के शुरुआती चरण में भी दिया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि अंतरिम राहत के लिए पूरे ट्रायल की जरूरत नहीं है, मजिस्ट्रेट को रहने की जगह की अंतरिम सुरक्षा देने से पहले पूरा ट्रायल करने की जरूरत नहीं है। इसके बजाय, मजिस्ट्रेट को कोर्ट के सामने पेश की गई सामग्री के आधार पर यह संतुष्ट होना होगा कि आवेदन प्रथम दृष्टया घरेलू हिंसा की घटना या ऐसी हिंसा की संभावना को दर्शाता है।

जस्टिस धर ने घरेलू हिंसा कानून के सुरक्षात्मक उद्देश्य पर जोर दिया और कहा कि रहने की जगह की सुरक्षा एक तत्काल राहत है, जिसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कानूनी कार्यवाही के दौरान पीड़ित महिला बिना छत या सुरक्षा के न रहे।

हाई कोर्ट ने माना कि कुपवाड़ा के प्रिंसिपल सेशंस जज का यह नजरिया कि रहने की जगह की राहत केवल ट्रायल खत्म होने के बाद ही दी जा सकती है, डीवी एक्ट की धारा 23 और घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को तत्काल सुरक्षा प्रदान करने के इसके विधायी उद्देश्य के अनुरूप नहीं था।

इसके अनुसार, हाईकोर्ट ने सेशंस कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और उस कानूनी स्थिति को बहाल कर दिया कि घरेलू हिंसा कानून के तहत मुख्य कार्यवाही पर अंतिम निर्णय होने से पहले रहने की जगह की अंतरिम सुरक्षा दी जा सकती है।

यह फैसला इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि डीवी एक्ट के तहत सुरक्षात्मक राहत का मकसद तत्काल और निवारक होना है न कि लंबे ट्रायल के पूरा होने पर निर्भर होना। जम्मू-कश्मीर में घरेलू हिंसा एक गंभीर और कम रिपोर्ट की जाने वाली समस्या बनी हुई है। इसके पीछे पितृसत्तात्मक सामाजिक रीति-रिवाज, आर्थिक तंगी और दशकों से चल रहा क्षेत्रीय संघर्ष जैसे कारण हैं।

सरकारी स्वास्थ्य सर्वेक्षण, जैसे कि 'नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे', बताते हैं कि इस इलाके में लगभग 10 से 11 प्रतिशत विवाहित महिलाओं को अपने पति से शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है। हालांकि, स्थानीय कार्यकर्ताओं का कहना है कि सामाजिक बदनामी के डर के कारण असल आंकड़े इससे कहीं ज्यादा हो सकते हैं।



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