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ईरान जंग में सऊदीअरब के पीछे क्यों पड़ा है अमेरिका, क्राउन प्रिंस को लगातार नीचा दिखा रहा ट्रंप प्रशासन

एक रिपोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम में सऊदी अरब की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने हाल ही में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बातचीत के दौरान ईरान पर हमले जारी रखने की अपील की थी।

ईरान जंग में सऊदीअरब के पीछे क्यों पड़ा है अमेरिका, क्राउन प्रिंस को लगातार नीचा दिखा रहा ट्रंप प्रशासन
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वॉशिंगटन/रियाद: पश्चिम एशिया में जारी ईरान संघर्ष को एक महीना पूरा हो चुका है। 28 फरवरी से अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर लगातार हमले किए जाने के बीच अब इस जंग के भू-राजनीतिक आयाम और गहरे होते नजर आ रहे हैं। इसी बीच, न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम में सऊदी अरब की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने हाल ही में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बातचीत के दौरान ईरान पर हमले जारी रखने की अपील की थी। बताया गया है कि उन्होंने ईरान के ऊर्जा बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने और जरूरत पड़ने पर जमीनी कार्रवाई पर भी विचार करने का सुझाव दिया।

अमेरिका का ‘दोहरा रवैया’ चर्चा में

इस खुलासे के बाद अमेरिका के रुख को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। एक ओर ट्रंप सार्वजनिक तौर पर MBS को “योद्धा” बताते हुए उनकी सराहना करते हैं, वहीं दूसरी ओर ऐसी रिपोर्ट्स सामने आने से सऊदी अरब को सफाई देनी पड़ रही है। विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की स्थिति सऊदी नेतृत्व को असहज बनाती है। अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से आई जानकारी ने यह भी संकेत दिया कि वाशिंगटन के भीतर ही सऊदी भूमिका को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण मौजूद हैं। यह घटनाक्रम अमेरिका-सऊदी संबंधों में जटिलता को दर्शाता है, जहां सहयोग और रणनीतिक दबाव दोनों साथ-साथ चलते दिख रहे हैं।

सऊदी अरब की रणनीतिक चिंताएं

विशेषज्ञों के अनुसार, सऊदी अरब की प्राथमिक चिंता क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को लेकर है। अगर अमेरिका या उसके सहयोगी इस संघर्ष में पीछे हटते हैं, तो सऊदी अरब को ईरान का सामना अपेक्षाकृत अकेले करना पड़ सकता है। ईरान और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से प्रतिस्पर्धा रही है, जो यमन, सीरिया, इराक और लेबनान जैसे देशों में अलग-अलग रूपों में दिखाई देती रही है। ऐसे में रियाद के लिए यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि ईरान की सैन्य और आर्थिक क्षमता सीमित रहे।

ट्रंप की रणनीति और कूटनीतिक संकेत

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन सऊदी अरब की इस स्थिति को समझता है और उसी के अनुरूप अपने बयान और रणनीति तय करता है। एक तरफ सार्वजनिक मंचों पर सऊदी नेतृत्व के प्रति समर्थन दिखाया जाता है, तो दूसरी ओर कूटनीतिक दबाव बनाए रखने के संकेत भी दिए जाते हैं। इस संतुलन के जरिए अमेरिका क्षेत्र में अपने प्रभाव को बनाए रखना चाहता है, जबकि सहयोगी देशों पर भी रणनीतिक नियंत्रण बनाए रखता है।

‘विजन 2030’ पर मंडराता खतरा

सऊदी अरब के लिए यह संघर्ष केवल सुरक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी बेहद अहम है। देश का महत्वाकांक्षी ‘विजन 2030’ प्रोजेक्ट, जिसका उद्देश्य अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से हटाकर विविध बनाना है, इस तनाव से प्रभावित हो सकता है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो विदेशी निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ सकता है। इसके अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में अस्थिरता का असर सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कुवैत जैसे तेल निर्यातक देशों के व्यापार पर भी पड़ रहा है।

ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक असर

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। यहां किसी भी प्रकार की बाधा वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित कर सकती है। इस कारण न केवल क्षेत्रीय देश, बल्कि वैश्विक बाजार भी इस संघर्ष पर नजर बनाए हुए हैं। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति की अनिश्चितता ने अंतरराष्ट्रीय चिंता को बढ़ा दिया है।

संतुलन साधने की चुनौती

सऊदी अरब के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाए रखने की है। एक ओर वह ईरान के प्रभाव को सीमित करना चाहता है, वहीं दूसरी ओर वह खुली जंग के जोखिम से भी बचना चाहता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यही कारण है कि सऊदी नेतृत्व कूटनीतिक और सैन्य दोनों स्तरों पर सक्रिय भूमिका निभा रहा है, लेकिन खुलकर सामने आने से भी बच रहा है।

जटिल होते जा रहे क्षेत्रीय समीकरण

ईरान संघर्ष के एक महीने बाद यह स्पष्ट है कि यह केवल सैन्य टकराव नहीं, बल्कि एक व्यापक भू-राजनीतिक संघर्ष बन चुका है। सऊदी अरब, अमेरिका और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के बीच बदलते समीकरण इस संकट को और जटिल बना रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या कूटनीतिक प्रयास इस तनाव को कम कर पाते हैं या फिर यह संघर्ष और गहराता है, जिसका असर न केवल पश्चिम एशिया बल्कि पूरे विश्व पर पड़ सकता है।

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