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पश्चिम एशिया में तनाव से रूस-चीन को कैसे मिल रहा फायदा? रिपोर्ट में बताई गई यह वजह
निवेश बैंक जेफरिज की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार इस संकट ने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक समीकरणों को बदलना शुरू कर दिया है और इसके सबसे बड़े लाभार्थियों के रूप में रूस और चीन उभर सकते हैं।

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी सैन्य संघर्ष का असर अब वैश्विक ऊर्जा और वित्तीय बाजारों पर साफ दिखाई देने लगा है। निवेश बैंक जेफरिज की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार इस संकट ने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक समीकरणों को बदलना शुरू कर दिया है और इसके सबसे बड़े लाभार्थियों के रूप में रूस और चीन उभर सकते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने तेल की कीमतों को ऊपर धकेल दिया है, जिससे ऊर्जा निर्यातक देशों की स्थिति मजबूत हो रही है, जबकि कई अन्य देशों के लिए यह नई चुनौतियां पैदा कर रहा है।
तनाव से तेल की कीमतों में तेज उछाल
रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है। इसके चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है। विश्लेषकों का कहना है कि क्षेत्रीय तनाव की वजह से ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने का डर बना हुआ है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। इस स्थिति का सबसे अधिक फायदा उन देशों को हो सकता है जो बड़े पैमाने पर तेल और गैस का निर्यात करते हैं।
रूस की ऊर्जा आय में बढ़ोतरी की संभावना
जेफरिज की रिपोर्ट में कहा गया है कि तेल की बढ़ती कीमतों का सबसे बड़ा फायदा रूस को मिल सकता है। रूस पहले से ही दुनिया के प्रमुख ऊर्जा निर्यातकों में से एक है और तेल के दाम बढ़ने से उसकी ऊर्जा आय में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मौजूदा संकट लंबा चलता है, तो रूस की वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिति और मजबूत हो सकती है। इससे उसे आर्थिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर फायदा मिल सकता है।
भारत के लिए रूसी तेल फिर अहम
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस भू-राजनीतिक स्थिति ने भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों के लिए भी नई परिस्थितियां पैदा कर दी हैं। तेल की बढ़ती कीमतों के बीच रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत की चिंताएं कुछ हद तक कम हो सकती हैं। रूस से मिलने वाला अपेक्षाकृत सस्ता कच्चा तेल भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा हालात में रूस की ऊर्जा आपूर्ति फिर से वैश्विक बाजार में एक अहम विकल्प बनती दिखाई दे रही है।
चीन को स्थिर घरेलू बाजार का फायदा
रिपोर्ट के मुताबिक, इस संकट का अप्रत्यक्ष लाभ चीन को भी मिल सकता है। चीन की अर्थव्यवस्था फिलहाल अपेक्षाकृत स्थिर घरेलू बाजार के सहारे आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है। जेफरिज का कहना है कि चीन की सरकार शेयर बाजार को धीरे-धीरे मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। इसका उद्देश्य यह है कि गिरते हुए रियल एस्टेट सेक्टर की जगह शेयर बाजार को चीनी परिवारों के लिए संपत्ति सृजन का प्रमुख माध्यम बनाया जा सके। विश्लेषकों के अनुसार शंघाई शेयर बाजार में दिखाई दे रही धीमी लेकिन स्थिर तेजी को सरकार की दीर्घकालिक नीति का हिस्सा माना जा रहा है।
ऊर्जा मार्गों में व्यवधान से बढ़ सकती है वैश्विक चिंता
हालांकि रिपोर्ट ने इस बात की चेतावनी भी दी है कि अगर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति मार्गों में व्यवधान लंबे समय तक जारी रहता है, तो इसका असर पूरी दुनिया की आपूर्ति शृंखलाओं पर पड़ सकता है। विशेष रूप से हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर चिंता जताई गई है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा परिवहन रास्तों में से एक है। अगर यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है या बंद हो जाता है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा संकट पैदा हो सकता है।
ऊर्जा संकट के बीच अमेरिका का कदम
इसी बीच अमेरिका ने ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने के लिए एक महत्वपूर्ण फैसला लिया है। रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका अगले सप्ताह से अपने सामरिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserve) से लगभग 172 मिलियन बैरल तेल जारी करने की योजना बना रहा है। हालांकि रिपोर्ट में इस कदम को लेकर कुछ सवाल भी उठाए गए हैं। विश्लेषकों का कहना है कि इससे अमेरिका की ऊर्जा रणनीति में दूरदर्शिता की कमी भी दिखाई देती है, क्योंकि पहले भंडार को पर्याप्त स्तर तक भरने की कोशिश नहीं की गई थी। फिलहाल अमेरिका के सामरिक तेल भंडार में लगभग 415 मिलियन बैरल तेल मौजूद है। यह इसकी अधिकतम क्षमता 714 मिलियन बैरल का करीब 58 प्रतिशत ही है। तुलना करें तो जुलाई 2020 में यह भंडार लगभग 656 मिलियन बैरल तक पहुंच गया था।
ट्रंप के लिए राजनीतिक जोखिम
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए राजनीतिक जोखिम पैदा कर सकता है। कुछ विश्लेषक इस स्थिति को संभावित “सुएज मोमेंट” से जोड़कर देख रहे हैं। यह शब्द 1956 के सुएज संकट से लिया गया है, जब ब्रिटेन और फ्रांस की वैश्विक शक्ति और प्रभाव में गिरावट दिखाई दी थी। “सुएज मोमेंट” का अर्थ ऐसे ऐतिहासिक मोड़ से है जब किसी बड़ी शक्ति की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और प्रभाव अचानक कमजोर पड़ते हुए नजर आने लगते हैं।
बदलते वैश्विक समीकरण
विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष केवल सैन्य या राजनीतिक संकट नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक आर्थिक व्यवस्था पर भी गहराई से पड़ रहा है। ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव, व्यापार मार्गों पर खतरा और बड़े देशों के रणनीतिक फैसले आने वाले समय में वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि यह संकट कब और किस दिशा में खत्म होता है।
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