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US सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ट्रंप के ‘आपातकालीन टैरिफ’ रद्द, 6-3 बहुमत से निर्णय

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को मध्यावधि चुनावों से पहले बड़ा झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उनके द्वारा राष्ट्रीय आपातकालीन शक्तियों के तहत लगाए गए व्यापक टैरिफ को खारिज कर दिया है। 6-3 के बहुमत से दिए गए फैसले में अदालत ने कहा कि 1977 के अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम (IEEPA) के तहत राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने का अधिकार प्राप्त नहीं है।

US सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ट्रंप के ‘आपातकालीन टैरिफ’ रद्द, 6-3 बहुमत से निर्णय
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वॉशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को मध्यावधि चुनावों से पहले बड़ा झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उनके द्वारा राष्ट्रीय आपातकालीन शक्तियों के तहत लगाए गए व्यापक टैरिफ को खारिज कर दिया है। 6-3 के बहुमत से दिए गए फैसले में अदालत ने कहा कि 1977 के अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम (IEEPA) के तहत राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने का अधिकार प्राप्त नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि टैक्स और टैरिफ लगाने की मूल संवैधानिक शक्ति कांग्रेस (संसद) के पास है, न कि राष्ट्रपति के पास। हालांकि कोर्ट ने यह नहीं बताया कि अब तक वसूले जा चुके लगभग 175 अरब डॉलर के टैरिफ का क्या होगा। माना जा रहा है कि इस प्रश्न पर निचली अदालतों में आगे सुनवाई होगी। फैसले के बाद अमेरिकी और वैश्विक बाजारों में तेजी देखी गई, जबकि डॉलर में गिरावट दर्ज की गई। राष्ट्रपति ट्रंप ने इस निर्णय को “शर्मनाक” बताया है।

क्या था मामला?

ट्रंप प्रशासन ने 1977 के IEEPA कानून के तहत कई देशों पर टैरिफ लगाए थे। इस कानून के अनुसार, राष्ट्रपति को आपातकाल की स्थिति में आयात और आर्थिक लेन-देन को नियंत्रित करने का अधिकार है। ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि “आयात का नियमन” करने की शक्ति में टैरिफ लगाने का अधिकार निहित है। हालांकि इस कदम को कई बिजनेस समूहों और 12 अमेरिकी राज्यों (अधिकांश डेमोक्रेट-शासित) ने अदालत में चुनौती दी। उनका कहना था कि कानून में “टैरिफ” शब्द का उल्लेख नहीं है और राष्ट्रपति ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई की है। निचली अदालत ने पहले ही इस कदम को असंवैधानिक बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने उसी फैसले को बरकरार रखा।

बहुमत का तर्क: ‘मेजर क्वेश्चन’ सिद्धांत लागू

मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि राष्ट्रपति का यह कदम “मेजर क्वेश्चन” सिद्धांत का उल्लंघन है। इस सिद्धांत के अनुसार, व्यापक आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव वाले फैसलों के लिए स्पष्ट रूप से कांग्रेस की स्वीकृति आवश्यक होती है। रॉबर्ट्स ने लिखा, “जब कांग्रेस टैरिफ लगाने का अधिकार देती है, तो वह इसे स्पष्ट शब्दों और ठोस शर्तों के साथ देती है। यहां ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।” अदालत ने कहा कि IEEPA का इस्तेमाल इस तरह के व्यापक टैरिफ लगाने के लिए नहीं किया जा सकता। अमेरिकी संविधान के तहत कर और टैरिफ लगाने की शक्ति कांग्रेस को प्राप्त है।

असहमति और दिलचस्प स्थिति

तीन कंजरवेटिव जज क्लेरेंस थॉमस, सैमुअल अलिटो और ब्रेट कैवना ने बहुमत से असहमति जताई। दिलचस्प बात यह रही कि ट्रंप द्वारा अपने पहले कार्यकाल में नियुक्त किए गए जज नील गोरसच और एमी कोनी बैरेट बहुमत के साथ खड़े रहे। जस्टिस कैवना ने अपने असहमति नोट में कहा कि राष्ट्रपति ने संभवतः “गलत कानूनी विकल्प” चुना। उनके अनुसार, अन्य कानूनों के तहत टैरिफ लागू किए जा सकते थे, लेकिन IEEPA पर निर्भर रहना उचित नहीं था। बाद में ट्रंप ने कैवना की सराहना करते हुए कहा, “मुझे उन पर बहुत गर्व है।”

175 अरब डॉलर का क्या होगा?

कोर्ट ने अब तक वसूले गए टैरिफ की वापसी पर कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिया। पेन-व्हार्टन बजट मॉडल के अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि IEEPA के तहत लगभग 175 अरब डॉलर से अधिक की वसूली की गई है। छोटे व्यवसायों के एक समूह ‘वी पे द टैरिफ्स’ ने तुरंत रिफंड की मांग की है। समूह के कार्यकारी निदेशक डैन एंथनी ने कहा, “कानूनी जीत का तब तक कोई मतलब नहीं है जब तक भुगतान किए गए टैरिफ लौटाए नहीं जाते। प्रशासन को तेज और स्वचालित रिफंड प्रक्रिया बनानी चाहिए।” ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि इतनी बड़ी राशि लौटाने से अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है।

भारत पर टैरिफ का भी जिक्र

असहमति जताने वाले जज ब्रेट कैवना ने अपने नोट में भारत पर लगाए गए 25 प्रतिशत टैरिफ का उल्लेख किया। उन्होंने लिखा कि राष्ट्रपति ने रूस-यूक्रेन संघर्ष के संदर्भ में संवेदनशील वार्ताओं के दौरान IEEPA अधिकारों का इस्तेमाल किया। कैवना के अनुसार, 6 अगस्त 2025 को भारत द्वारा रूसी तेल खरीद के चलते टैरिफ लगाया गया था, जिसे 6 फरवरी 2026 को कम कर दिया गया क्योंकि भारत ने कथित तौर पर रूसी तेल खरीद बंद करने का वादा किया था। सरकार का दावा है कि इन टैरिफ से विदेशी बाजार अमेरिकी कंपनियों के लिए अधिक खुले और कई व्यापार समझौतों में मदद मिली।

किन टैरिफ पर नहीं पड़ेगा असर?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का उन टैरिफ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा जिन्हें 1962 के ट्रेड एक्सपेंशन एक्ट की धारा-232 के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर लगाया गया था। इनमें स्टील, एल्युमीनियम, लकड़ी और ऑटोमोबाइल उद्योग पर लगाए गए टैरिफ शामिल हैं। ये टैरिफ अलग कानूनी प्रावधानों के तहत लागू किए गए थे और फिलहाल प्रभावी रहेंगे।

कांग्रेस की मंजूरी बिना टैरिफ कब संभव?

राष्ट्रपति के पास कुछ सीमित परिस्थितियों में कांग्रेस की मंजूरी के बिना टैरिफ लगाने का अधिकार होता है, लेकिन वे समयबद्ध और सीमित दायरे में होते हैं। उदाहरण के लिए, एक कानून के तहत अधिकतम 150 दिनों के लिए 15 प्रतिशत तक टैरिफ बढ़ाया जा सकता है। राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर टैरिफ लगाने के लिए वाणिज्य विभाग की जांच आवश्यक होती है और यह विशिष्ट उद्योगों तक सीमित रहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ट्रंप प्रशासन अन्य कानूनी विकल्पों की तलाश कर सकता है, लेकिन व्यापक और अनिश्चितकालीन टैरिफ लगाना अब कठिन होगा।

बाजारों की प्रतिक्रिया

फैसले के बाद अमेरिकी और वैश्विक शेयर बाजारों में तेजी दर्ज की गई। निवेशकों ने इसे व्यापारिक अनिश्चितता में कमी के संकेत के रूप में देखा। वहीं डॉलर के मूल्य में गिरावट आई, जिससे निर्यातकों को संभावित लाभ हो सकता है। हालांकि कुछ उद्योग समूहों ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन नए कानूनी रास्तों से फिर टैरिफ लागू करने की कोशिश करता है तो अनिश्चितता बनी रह सकती है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया

डेमोक्रेटिक नेताओं और उद्योग संगठनों ने फैसले का स्वागत किया है। कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूसम ने प्रशासन से टैरिफ रिफंड जारी करने की अपील की। सीनेट डेमोक्रेटिक लीडर चक शूमर ने इसे “हर अमेरिकी उपभोक्ता के वॉलेट की जीत” बताया। वहीं ट्रंप ने फैसले को राजनीतिक बताया और कहा कि यह प्रशासन की व्यापार नीति को कमजोर करने का प्रयास है।

शक्तियों की सीमाओं पर स्पष्ट संदेश

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला अमेरिकी संविधान में शक्तियों के संतुलन की पुनः पुष्टि करता है। अदालत ने साफ किया कि व्यापक आर्थिक नीतियां लागू करने के लिए कार्यपालिका को कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी चाहिए। यह निर्णय न केवल ट्रंप प्रशासन के लिए कानूनी चुनौती है, बल्कि भविष्य के राष्ट्रपतियों के लिए भी एक मार्गदर्शक सिद्धांत स्थापित करता है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन आगे क्या कदम उठाता है और क्या छोटे व्यवसायों को भुगतान किए गए टैरिफ का रिफंड मिलेगा।

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