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ट्रंप ने दी नई धमकी-रूस से तेल खरीदा तो 100 प्रतिशत टैरिफ लगाएंगे

अमेरिकी सांसदों ने ऐसा विधेयक पेश करने का प्रस्ताव दिया है, जिसके तहत रूस से तेल खरीदने वाले कुछ देशों पर 100 प्रतिशत तक आयात शुल्क (टैरिफ) लगाया जा सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा है कि इसे लागू करने का यही उचित समय है।

ट्रंप ने दी नई धमकी-रूस से तेल खरीदा तो 100 प्रतिशत टैरिफ लगाएंगे
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वॉशिंगटन/नई दिल्ली: Oil imports from Russia: रूस से कच्चे तेल का आयात जारी रखने वाले देशों पर अमेरिका एक बार फिर सख्त रुख अपनाने की तैयारी में है। अमेरिकी सांसदों ने ऐसा विधेयक पेश करने का प्रस्ताव दिया है, जिसके तहत रूस से तेल खरीदने वाले कुछ देशों पर 100 प्रतिशत तक आयात शुल्क (टैरिफ) लगाया जा सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा है कि इसे लागू करने का यही उचित समय है। इस कदम का असर भारत-अमेरिका के बीच जारी व्यापार समझौता वार्ता पर भी पड़ सकता है।

किन देशों को किया गया है प्रस्ताव में शामिल

अमेरिकी सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि प्रस्तावित बिल का उद्देश्य रूस के ऊर्जा निर्यात पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है। उनके अनुसार, इस बार प्रस्ताव केवल उन प्रमुख देशों पर केंद्रित है जो बड़ी मात्रा में रूसी कच्चे तेल का आयात कर रहे हैं। प्रस्तावित सूची में भारत, चीन, हंगरी, स्लोवाकिया और अजरबैजान शामिल हैं। बिल में इन देशों के आयातित उत्पादों पर अधिकतम 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान रखा गया है। हालांकि, रूस से प्राकृतिक गैस खरीदने वाले कुछ यूरोपीय देशों को इसमें छूट देने की बात कही गई है, क्योंकि उनकी निर्भरता अपेक्षाकृत कम है और वे वैकल्पिक स्रोतों की ओर बढ़ रहे हैं।

ट्रंप के समर्थन से बढ़ी चर्चा

राष्ट्रपति ट्रंप के सार्वजनिक समर्थन के बाद इस प्रस्ताव पर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है। अमेरिकी सांसदों का कहना है कि रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए यह एक प्रभावी कदम हो सकता है। रिपोर्टों के अनुसार, इस विधेयक को अमेरिकी संसद में अगस्त से पहले पेश किए जाने की संभावना है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि प्रस्ताव मौजूदा स्वरूप में पारित होगा या संसदीय प्रक्रिया के दौरान इसमें बदलाव किए जाएंगे।

व्यापार समझौते पर पड़ सकता है असर

विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रस्ताव भारत और अमेरिका के बीच चल रही द्विपक्षीय व्यापार वार्ता को और जटिल बना सकता है। दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर बातचीत जारी है, लेकिन कुछ प्रमुख व्यापारिक विषयों पर अभी भी सहमति नहीं बन सकी है। कूटनीतिक हलकों में यह भी माना जा रहा है कि अमेरिका इस तरह के बयानों के जरिए भारत पर व्यापार समझौते को लेकर दबाव बनाने की रणनीति अपना सकता है। हालांकि, इस संबंध में किसी भी पक्ष ने आधिकारिक रूप से ऐसी मंशा की पुष्टि नहीं की है।

भारत की ओर से नहीं आई आधिकारिक प्रतिक्रिया

प्रस्तावित बिल पर भारत सरकार की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालांकि, विदेश नीति से जुड़े कई विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के आधार पर तेल आयात संबंधी निर्णय लेता है। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने इस घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अमेरिका का यह रुख दोनों देशों के संबंधों के लिहाज से सकारात्मक संकेत नहीं देता। उनका कहना है कि भारत को अलग-थलग करने की कोशिश जैसी धारणा बनना द्विपक्षीय संबंधों के लिए उचित नहीं होगा।

पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे प्रस्ताव

यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की बात की हो। पिछले वर्ष भी अमेरिकी संसद में एक प्रस्ताव लाया गया था, जिसमें रूस से तेल आयात करने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का सुझाव दिया गया था। हालांकि, उस प्रस्ताव को पर्याप्त समर्थन नहीं मिल पाया और वह आगे नहीं बढ़ सका। रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन पहले भी रूस से ऊर्जा आयात को लेकर भारत सहित कई देशों को चेतावनी देता रहा है। इसके अलावा अमेरिका ने हाल ही में श्रम मानकों और अन्य व्यापारिक कारणों का हवाला देते हुए कई देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने के प्रस्ताव भी पेश किए हैं।

भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा अहम

भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है और अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विभिन्न देशों से तेल खरीदता है। रूस पिछले कुछ वर्षों में भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अपने आयात संबंधी फैसले मुख्य रूप से कीमत, उपलब्धता और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर करता है। अब निगाहें अमेरिकी संसद में प्रस्तावित विधेयक की प्रगति और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता पर टिकी हैं। यदि यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो दोनों देशों के आर्थिक और रणनीतिक संबंधों पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, अंतिम स्थिति अमेरिकी विधायी प्रक्रिया और दोनों देशों के बीच होने वाली आगामी कूटनीतिक बातचीत पर निर्भर करेगी।


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